सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context(६) हिन्दी सांख्य दर्शन शक्तस्य शक्यकरणात्,कारणभावाच्च सत्कार्यम् ।९। (क) असत् (जो पहिले से नहीं है) कार्य को कोई कर नहीं सकता, इस से कार्य अपनी उत्पत्ति से पहिले भी सत् होता है। (ख) कार्य और कारण के सम्बन्ध से कार्य होता है, और असत् कार्य का कारण के साथ सम्बन्ध हो नहीं सकता, अतः कार्य अपनी उत्पत्ति से पहिले भी विद्यमान है। (ग) सब कार्यों का सब स्थानों में सम्भव नहीं, अर्थात् यदि बिना हुआ भी कार्य उत्पन्न हो, तो उसे सब स्थानों में होना चाहिये, किन्तु ऐसा संभव नहीं, अतः कार्य अपनी उत्पत्ति से पहिले भी सत् है (घ) शक्त या शक्तिमान् कारण शक्य को बनाता है, और शक्त कारण का अविद्यमान कार्य शक्य नहीं हो सकता। क्योंकि कार्य को देखकर ही कारण की शक्ति होती है, अतः कार्य अपनी ०-० । (ङ) और कार्य कारण भाव से भी कार्य सत् है, अर्थात् कारण का कारणत्व कार्य की कार्यता से ही निरूपित होता है, और असत् कार्य से कारणत्व कल्पित नहीं हो सकता, अतः कार्य ०--० । व्यक्त और अव्यक्त का साधर्म्य और वैधर्म्य। हेतुमदनित्यमव्यापिसक्रियमनेकमाश्रितंलिङ्गम् । सावयवं परतन्त्रं व्यक्तं, विपरीतमव्यक्तम् ॥ १०॥ व्यक्त (महत् आदि) के धर्म। हेतुमान् (सकारण)। अनित्य । अव्यापकं । क्रियावान् । अनेक (नाना) । आश्रि-