सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextहिंदी सांख्य दर्शन कारणगुणात्मकत्वात्कार्यस्याव्यक्तमपिसिद्धम्॥१४॥ (क) सत्व आदि गुण अविवेकित्व, विषयत्व और अचेतनत्व धर्म वाले हैं। क्यों कि ये सब त्रिगुण हैं। जो २ त्रिगुण वस्तु देखी जाती है, वह २ सब अविवेकि आदि ही है, इस के अतिरिक्त यह भी है कि जहां आत्मा या पुरुष में अविवेकित्व आदि धर्म नहीं है, वहां यह तीनों गुण भी नहीं हैं। (ख) यदि कहा जावे कि अव्यक्त हो, तो उससे उत्पन्न होने वाले इन तीनों गुणों में अविवेकित्व आदि सिद्ध हो सकता है, किन्तु अभी अव्यक्त ही सिद्ध नहीं हुआ है ? इस पर कहा जा सका है, कि कार्य को कारण गुणात्मक होने से अव्यक्त भी सिद्ध होता है। अर्थात् महत् आदि सब कार्य गुण वाले हैं, और कार्य में गुणों की अनुवृत्ति (आगम) कारण से ही होती है। जैसे नील वस्त्र में उस के कारण नील सन्तुओं से ही नील रूप की अनुवृत्ति होती है, अतः महत् आदि कार्यों में गुणों की अनुवृत्ति के अर्थ उनका कोई कारण होना चाहिये। इस रीति से उन का कारण सिद्ध होता है, तथा वही अव्यक्त है ॥ १४ ॥ अव्यक्त से व्यक्त की उत्पत्ति। माना भी जावे कि इस रीति से अव्यक्त सिद्ध हो गया, तथापि आपत्ति हो सकती है कि जिस प्रकार न्याय वैशेषिक के आचार्यों ने व्यक्त से व्यक्त की उत्पत्ति मानी उसी प्रकार यहां भी मानना चाहिये। अर्थात् गौतम और कणाद मुनि मानते हैं कि परमाणु व्यक्त हैं, उन्ही से द्वयणुक, उससे त्र्यणुक इत्यादि क्रम से महापृथिवी पर्यन्त सब जगत् उत्पन्न हो जाता है, तथा पृथिवी आदि में उन के कारणों के गुणों की