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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished750 pages

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उत्पत्ति प्रकरण ] * ब्रह्माकी मनोरूपता और उसके संकल्परूपमय जगत्‌की असत्ताका प्रतिपादन * ९७


निवारण नहीं हो सकता; क्योंकि जो असत् वस्तु है, उसका अस्तित्व नहीं है और जो सत् वस्तु है, उसका कभी अभाव नहीं होता। चित्-स्वरूप आत्माका जिसे बोध नहीं है, वह द्रष्टा जहाँ कहीं भी रहता है, वहीं उसकी दृष्टिके समक्ष इस दृश्य जगत्‌का वैभव प्रकट हो जाता है। इस दृश्य-प्रपञ्चके रहते हुए निर्विकल्प समाधि कैसे हो सकती है ? निर्विकल्प समाधि होनेपर ही चेतनता और तुरीय पदकी उपपत्ति होती है। जैसे सुषुप्ति (प्रगाढ निद्रा) के पश्चात् यह सारा सांसारिक दुःख अनुभवमें आने लगता है, उसी प्रकार समाधिसे उठनेपर यह सम्पूर्ण दुःखमय जगत् जैसेका तैसा प्रतीत होने लगता है। इस मनोरूप दृश्यके रहते हुए कोई समाधिके लिये कितना ही प्रयत्नशील क्यों न हो, क्या उसे दृश्य प्राप्त नहीं होता ? (अवश्य होता है); क्योंकि जहाँ-जहाँ इसकी चित्तवृत्ति जाती है, वहाँ-वहाँ उससे सम्बन्ध रखनेवाले जगत्रूपी भ्रमका निवारण नहीं किया जा सकता। जैसे कमलगट्टेके भीतर कमलिनीका वह बीज विद्यमान है, जिसमें उसका मृणालमय रूप छिपा हुआ है, उसी प्रकार अज्ञानी द्रष्टामें वह बुद्धि रहती है, जिसमें दृश्य जगत् अन्तर्हित होता है। जैसे पदार्थोंमें रस, तिल आदिमें तेल और फूलोंमें सुगंध रहती है, उसी प्रकार उपद्रष्टामें दृश्य बुद्धि रहती ही है। कपूर या कस्तूरी आदि जहाँ कहीं भी हों, उनकी सुगंध प्रकट हो ही जाती है, उसी प्रकार द्रष्टा कहीं भी हो, उसके उदरमें दृश्य जगत्‌का प्रादुर्भाव होता ही है। जैसे तुम्हारे हृदयमें स्थित मनो-राज्य-बुद्धि अपने अनुभवसे ही देखी गयी है और जैसे हृदयस्थित स्वप्न एव संकल्प तुम्हारे द्वारा अनुभवसे ही देखे जाते हैं, उसी प्रकार यह दृश्य जगत् तुम्हारे हृदयमें ही स्थित है और अपने अनुभवसे ही दृष्टिगोचर होता है। (सर्ग १)


ब्रह्माकी मनोरूपता और उसके संकल्परूपमय जगत्‌की असत्ता तथा ज्ञाताके कैवल्यकी ही मोक्षरूपताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! मन्वन्तर आरम्भ होनेपर जब सम्पूर्ण प्राणियोंको अपना ग्रास बनानेवाली मृत्यु प्रजाका संहार करती हुई सबल हो उठी, तब उसने स्वयं ही ब्रह्माजीपर आक्रमण करनेका उद्योग आरम्भ किया। उस समय धर्मराज यमने उसे शीघ्र ही इस प्रकार शिक्षा दी—'मृत्यो ! ब्रह्मा परम (चिन्मय) व्योमरूप हैं। उनकी आकृति पृथ्वी आदि पाँचों भूतोंसे रहित है। वे मनोमय और संकल्परूप हैं। भला, उनपर कैसे आक्रमण किया जा सकता है ? जो चेतन आकाशके समान चमत्कारपूर्ण और चिन्मय आकाशके समान अनुभवरूप हैं, वे ब्रह्मा चिन्मय आकाश ही हैं। उनमें कार्य-कारण-भाव नहीं है। जैसे आकाशमें इन्द्रनील मणिसे बने हुए तथा औंधे रक्खे हुए महान् कड़ाहका-सा आकार पृथ्वी आदिसे रहित प्रतीत होता है और जैसे संकल्पनिर्मित पुरुष भी पृथ्वी आदिसे रहित ही ज्ञात होता है, उसी प्रकार स्वयम्भू ब्रह्मा भी पृथ्वी, जल आदि तत्त्वोंसे रहित ही भासित होते हैं। केवल (अद्वितीय) परमात्मामें न दृश्य है और न द्रष्टा ही है। यह स्वयं चिन्मात्रस्वरूप ही हैं, तथापि 'स्वयम्भू' नामसे प्रकाशित होता हैं। आदि, मध्य और अन्तसे रहित चिदाकाशरूप अद्वितीय ब्रह्म ही अपने संकल्पके कारण स्वयम्भू ब्रह्माके नामसे पुरुष अथवा देहधारी-सा भासित होता है।'

श्रीराम ! जिसका पूर्वजन्मोंमें उपार्जित कर्मोंसे युक्त पूर्व-शरीर रहा है, उसीको इस जन्ममें संसार-स्थितिकी कारणभूत स्मृतिका होना सम्भव है। जब ब्रह्माका कोई प्राक्तन कर्म है ही नहीं, तब उन्हें पूर्व-जन्मकी स्मृतिका उदय कहाँसे और कैसे होगा ?

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