संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
by महर्षि वाल्मीकि
प्रारंभिक पृष्ठ (भूमिका एवं विषय-सूची)
॥ श्रीहरिः ॥
574
संक्षिप्त
योगवासिष्ठ
गीताप्रेस, गोरखपुर
GITA PRESS, GORAKHPUR
कल्याण
[चित्र: चार मोक्ष-द्वार — विचार, शम, सन्तोष, साधुसङ्ग]
| वर्ष ३५ | संक्षिप्त योगवासिष्ठ-अङ्क | संख्या १ |
|---|
दुर्गति-नाशिनि दुर्गा जय जय, काल-विनाशिनि काली जय जय।
उमा रमा ब्रह्माणी जय जय, राधा सीता रुक्मणि जय जय॥
साम्ब सदाशिव, साम्ब सदाशिव, साम्ब सदाशिव, जय शंकर।
हर हर शंकर दुखहर सुखकर अघ-तम-हर हर हर शंकर॥
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥
जय-जय दुर्गा, जय मा तारा। जय गणेश, जय शुभ-आगारा॥
जयति शिवा-शिव जानकि-राम। गौरी-शंकर सीता-राम॥
जय रघुनन्दन जय सिया-राम। व्रज-गोपी-प्रिय राधेश्याम॥
रघुपति राघव राजा राम। पतितपावन सीताराम॥
सं० २०५० द्वितीय संस्करण ५,०००
मूल्य—पैंसठ रुपये
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जय पावक रवि चन्द्र जयति जय। सत्-चित्-आनँद भूमा जय जय॥
जय जय विश्वरूप हरि जय। जय हर अखिलात्मन् जय जय॥
जय विराट जय जगतपते। गौरीपति जय रमापते॥
सम्पादक—हनुमानप्रसाद पोद्दार, चिम्मनलाल गोस्वामी, एम्० ए०, शास्त्री
केशोराम अग्रवालद्वारा गोविन्दभवन-कार्यालयके लिये गीताप्रेस, गोरखपुरसे मुद्रित तथा प्रकाशित
॥ श्रीहरिः ॥
संक्षिप्त
योगवासिष्ठाङ्क
श्रीराम तीर्थयात्राके लिये पिता दशरथसे आज्ञा माँग रहे हैं (वैराग्य-प्रकरण, सर्ग ३) (पृष्ठ-संख्या १)
दशरथकी सभामें दिव्य महर्षियोंका अवतरण (वैराग्य-प्रकरण, सर्ग ३३) (पृष्ठ-सङ्ख्या १६)
लीलापर देवी सरस्वतीकी कृपा (उत्पत्ति-प्रकरण, सर्ग १५) (पृष्ठ-संख्या ९६)
ब्रह्माजी और बालक वसिष्ठमें बातचीत (मुमुक्षु-प्रकरण, सर्ग १०) (पृष्ठ-सङ्ख्या १४४)
ब्रह्माका राजहंसोंपर दस ब्रह्माओंको देखना (उत्पत्ति-प्रकरण, सर्ग ८५) (पृष्ठ-संख्या ३०४)
प्रह्लादके द्वारा भगवान् विष्णुकी पूजा (उपशम-प्रकरण, सर्ग ३२) (पृष्ठ-संख्या ३८४)
(इस पृष्ठ पर केवल चित्र/रेखाचित्र (Illustration) है, कोई देवनागरी या संस्कृत पाठ नहीं है।)
श्रीहरिः
संक्षिप्त योगवासिष्ठाङ्ककी विषय-सूची
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १—महर्षि वसिष्ठजीको नमस्कार<br>(सुतीक्ष्ण, नि० प्र० उ० २१६ । २६) | १ | ३—जीवन्मुक्तके स्वरूपपर विचार, जगत्के मिथ्यात्व तथा द्विविध वासनाका निरूपण तथा भगवान् श्रीरामकी तीर्थ-यात्राका वर्णन | २३ |
| २—भगवान् श्रीरामको नमस्कार<br>(वसिष्ठ, नि० प्र० पू० २ । ६०) | १ | ४—तीर्थ-यात्रासे लौटे हुए श्रीरामकी दिनचर्या एवं पिताके घरमें निवास, राजा दशरथके यहाँ विश्वामित्रका आगमन और राजाद्वारा उनका सत्कार | २५ |
| ३—योगवासिष्ठमें भगवान् श्रीरामके स्वरूप तथा माहात्म्यका प्रतिपादन | २ | ५—विश्वामित्रका अपने यज्ञकी रक्षाके लिये श्रीरामको माँगना और राजा दशरथका उन्हें देनेमें अपनी असमर्थता दिखाना | २८ |
| ४—कल्याण ('शिव') | ३ | ६—विश्वामित्रका रोष, वसिष्ठजीका राजा दशरथको समझाना, राजा दशरथका श्रीरामको बुलानेके लिये द्वारपालको भेजना तथा श्रीरामके सेवकोंका महाराजसे श्रीरामकी वैराग्यपूर्ण स्थितिका वर्णन करना | ३० |
| ५—एकश्लोकी योगवासिष्ठ (तत्त्वचिन्तक स्वामीजी श्रीअनिरुद्धाचार्यजी वेंकटाचार्यजी महाराज) | ४ | ७—विश्वामित्र आदिकी प्रेरणासे राजा दशरथका श्रीरामको सभामें बुलाकर उनका मस्तक सूँघना और मुनिके पूछनेपर श्रीरामका अपने विचार-मूलक वैराग्यका कारण बताना | ३३ |
| ६—वासिष्ठ-बोध-सार [ कविता ] (पाण्डेय श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री 'राम') | ४ | ८—धन-सम्पत्ति तथा आयुकी निस्सारता एवं दुःखरूपताका वर्णन | ३६ |
| ७—योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता<br>(पण्डित श्रीजानकीनाथजी शर्मा) | ५ | ९—अहंकार और चित्तके दोष | ३८ |
| ८—योगवासिष्ठकी आजके आत्मशान्ति, विश्व-शान्तिके इच्छुक विश्वको चुनौती तथा इस क्षणका ज्ञान-बन्धुत्व एवं शमाभास<br>(श्रीरामनिवासजी शर्मा) | ९ | १०—तृष्णाकी निन्दा | ४० |
| ९—भगवान् वसिष्ठकी जय (श्रीसूरजचंदजी सत्यप्रेमी 'डाँगीजी') | १० | ११—शरीर-निन्दा | ४३ |
| १०—योगवासिष्ठका साध्य-साधन | ११ | १२—बाल्यावस्थाके दोष | ४६ |
| ११—योगवासिष्ठका दुरुपयोग नहीं होना चाहिये<br>(भक्त श्रीरामशरणदासजी) | १५ | १३—युवावस्थाके दोष | ४७ |
| १२—श्रीगुरुवर-वसिष्ठ-स्तवन [ कविता ]<br>(पं० श्रीरामनारायणजी त्रिपाठी 'मित्र' शास्त्री) | १६ | १४—स्त्री-शरीरकी रमणीयताका निराकरण | ४९ |
| वैराग्य-प्रकरण | १५—वृद्धावस्थाकी दुःखरूपता | ५० | |
| १—सुतीक्ष्ण और अगस्ति, कारुण्य और अग्निवेश्य, सुरुचि तथा देवदूत और अरिष्टनेमि एवं वाल्मीकिके संवादका उल्लेख करते हुए भगवान्के श्रीरामावतारमें ऋषियोंके शापको कारण बताना | १७ | १६—कालके स्वरूपका विवेचन | ५१ |
| २—इस शास्त्रके अधिकारीका निरूपण, रामायणके अनुशीलनकी महिमा, भरद्वाजको ब्रह्माजीका वरदान तथा ब्रह्माजीकी आज्ञासे वाल्मीकिका भरद्वाजको संसार-दुःखसे छुटकारा पानेके निमित्त उपदेश देनेके लिये प्रवृत्त होना | २१ | १७—कालका प्रभाव और मानव-जीवनकी अनित्यता | ५३ |
| १८—सांसारिक वस्तुओंकी निस्सारता, क्षणभङ्गुरता और दुःखरूपताका तथा सत्पुरुषोंकी दुर्लभताका प्रतिपादन | ५५ |
( ४ )
१९—जागतिक पदार्थोंकी परिवर्तनशीलता एवं अस्थिरताका वर्णन ... ५८ २०—श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना ... ५९ २१—श्रीरामचन्द्रजीका भाषण सुनकर सबका आश्चर्य-चकित होना, आकाशसे फूलोंकी वर्षा, सिद्ध पुरुषोंके उद्गार, राजसभामें सिद्धों और महर्षियोंका आगमन तथा उन सबके द्वारा श्रीरामके वचनोंकी प्रशंसा ... ६२
मुमुक्षु-व्यवहार-प्रकरण
१—विश्वामित्रजीका श्रीरामको तत्त्वज्ञानसम्पन्न बताते हुए उनके सामने शुकदेवजीका दृष्टान्त उपस्थित करना, शुकदेवजीका तत्त्वज्ञान प्राप्त करके परमात्मामें लीन होना ... ६५ २—विश्वामित्रजीका वसिष्ठजीसे श्रीरामको उपदेश करनेके लिये अनुरोध करना और वसिष्ठजीका उसे स्वीकार कर लेना ... ६८ ३—जगत्की भ्रमरूपता एवं मिथ्यात्वका निरूपण, सदेह और विदेह मुक्तिकी समानता तथा शास्त्र-नियन्त्रित पौरुषकी महत्ताका वर्णन ... ६९ ४—शास्त्रके अनुसार सत्कर्म करनेकी प्रेरणा, पुरुषार्थसे भिन्न प्रारब्धवादका खण्डन तथा पौरुषकी प्रधानताका प्रतिपादन ... ७१ ५—ऐहिक पुरुषार्थकी श्रेष्ठता और दैववादका निराकरण ... ७३ ६—विविध युक्तियोंद्वारा दैवकी दुर्बलता और पुरुषार्थकी प्रधानताका समर्थन ... ७४ ७—पुरुषार्थकी प्रबलता बताते हुए दैवके स्वरूपका विवेचन तथा शुभ वासनासे युक्त होकर सत्कर्म करनेकी प्रेरणा ... ७६ ८—श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन, ज्ञानप्राप्तिका विस्तार, श्रीरामजीके वैराग्यकी प्रशंसा, वक्ता और प्रश्नकर्ताके लक्षण आदिका विशेषरूपसे वर्णन ... ७७ ९—संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता, ज्ञानका उत्तम माहात्म्य, श्रीराममें प्रश्नकर्ताके गुणोंकी अधिकताका वर्णन, जीवन्मुक्तिरूप फलके हेतुभूत वैराग्य आदि गुणोंका तथा शमका विशेषरूपसे निरूपण ... ८२ १०—विचार, संतोष और सत्समागमका विशेष-रूपसे वर्णन तथा चारों गुणोंमेंसे एक ही गुणके सेवनसे सद्गतिका कथन ... ८७ ११—प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन, ग्रन्थकी प्रशंसा, शान्ति, ब्रह्म, द्रष्टा और दृश्यका विवेचन, परस्पर सहायक प्रज्ञा और सदाचारका वर्णन ... ९०
उत्पत्ति-प्रकरण
१—दृश्य जगत्के मिथ्यात्वका निरूपण, दृश्य ही बन्धन है और उसका निवारण होनेसे ही मोक्ष होता है, इसका प्रतिपादन तथा द्रष्टाके हृदयमें ही दृश्यकी स्थितिका कथन ... ९६ २—द्रष्टाकी मनोरूपता और उसके संकल्परूपमय जगत्की असत्ता तथा ज्ञाताके कैवल्यकी ही मोक्षरूपताका प्रतिपादन ... ९७ ३—मनके स्वरूपका विवेचन, मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत्की असत्ताका निरूपण तथा महाप्रलय-कालमें समस्त जगत्को अपनेमें लीन करके एकमात्र परमात्मा ही शेष रहते हैं और वे ही सबके मूल हैं, इसका प्रतिपादन ... ९९ ४—ज्ञानसे ही परासिद्धि या परमात्मप्राप्तिका प्रतिपादन तथा ज्ञानके उपायोंमें सत्सङ्ग एवं सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायकी प्रशंसा ... १०२ ५—परमात्माके ज्ञानकी महिमा, उसके स्वरूपका विवेचन, दृश्य जगत्के अत्यन्ताभाव एवं ब्रह्मरूपताका निरूपण तथा आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये योगवासिष्ठ ही सर्वोत्तम शास्त्र है—इसका प्रतिपादन ... १०३ ६—जीवन्मुक्तिका लक्षण, जगत्की असत्ता तथा ब्रह्मसे उसकी अभिन्नताका प्रतिपादन, परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका वर्णन ... १०५ ७—जगत्की ब्रह्मसे अभिन्नता, परमार्थ-तत्त्वका लक्षण, महाप्रलयकालमें जगत्के अधिष्ठानका विचार तथा जगत्की ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन ... १०७
( ५ )
| ८—ब्रह्ममें जगत्का अध्यारोप, जीव एवं जगत्के रूपमें ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन ... १०९ | वहाँ युद्धका आयोजन देखना; शूरके लक्षण तथा दिग्माहवकी परिभाषा ... १३७ |
| ९—भेदके निराकरणपूर्वक एकमात्र ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन तथा जगत्की पृथक् सत्ताका खण्डन ... १११ | २०—लीला और सरस्वतीका आकाशमें विमानपर स्थित हो युद्धका दृश्य देखना ... १३९ |
| १०—जगत्के अत्यन्ताभावका प्रतिपादन, मण्डपोपाख्यानका आरम्भ, राजा पद्म तथा रानी लीलाका परस्पर अनुराग, लीलाका सरस्वतीकी आराधना करके वर पाना और रणभूमिमे पतिके मारे जानेसे अत्यन्त व्याकुल होना ... ११४ | २१—युद्धका वर्णन तथा उभयपक्षको सहायता देनेवाले विभिन्न जनपदों और स्थानोंका उल्लेख ... १४१ |
| ११—सरस्वतीकी आज्ञासे पतिके शवको फूलोंकी ढेरीमें रखकर समाधिस्थित हुई लीलाका पतिके वासनामय स्वरूप एवं राजवैभवको देखना तथा समाधिसे उठकर पुनः राजसभामें सभासदोंका दर्शन करना ... ११८ | २२—युद्धका उपसंहार, राजा विदूरथके शयनागारमें गवाक्षरन्ध्रसे लीला और सरस्वतीका प्रवेश तथा सूक्ष्म चिन्मय शरीरकी सर्वत्र गमनशक्तिका प्रतिपादन ... १४३ |
| १२—लीलाका सरस्वतीसे कृत्रिम और अकृत्रिम सृष्टिके विषयमें पूछना और सरस्वतीका इस विषयको समझानेके लिये लीलाके जीवनसे मिलते-जुलते एक ब्राह्मण-दम्पतिके जीवनका वृत्तान्त सुनाना ... १२१ | २३—राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश और राजाद्वारा उनका पूजन, मन्त्रीद्वारा राजाका जन्मवृत्तान्त-वर्णन, राजा विदूरथ और सरस्वती देवीकी बातचीत, वसिष्ठजीद्वारा अज्ञानावस्थामें जगत् और स्वप्नकी सत्यताका वर्णन, सरस्वतीद्वारा विदूरथको वर-प्रदान, नगरपर शत्रु का आक्रमण और नगरकी दुरावस्थाका कथन, भयभीत हुई राजमहिषीद्वारा राज्ञीकी शरणमें आना, लीलाको दूसरे वररूप राजा पद्मकी प्राप्ति ... १४६ |
| १३—लीला और सरस्वतीका संवाद-जगत्की असत्ता एव अजातवादकी स्थापना ... १२४ | २४—राजा विदूरथका विशाल सेनाके साथ युद्धके लिये प्रयाण, युद्धारम्भ, लीलाके पूछनेपर सरस्वतीद्वारा राजा सिन्धुके विजयी होनेमें हेतु-कथन, विदूरथ और राजा सिन्धुके दिव्यास्त्रोंद्वारा किये गये युद्धका सविस्तर वर्णन, राजा विदूरथकी पराजय और देशपर राजा सिन्धुके अधिकारका कथन १५१ |
| १४—लीला और सरस्वतीका संवाद—सब कुछ चिन्मात्र ब्रह्म ही है, इसका प्रतिपादन ... १२६ | २५—राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासनारूपताका वर्णन, लीलाके गमनमार्ग और स्वामी पद्मकी प्राप्तिका कथन, पदार्थोंकी नियति, मरणक्रम, भोग और कर्म, गुण एवं आचारके अनुसार आयुके मानका वर्णन, आदि-सृष्टि से लेकर जीवकी विचित्र गतियों तथा ईश्वरकी स्थितिका निरूपण ... १५५ |
| १५—वासनाओंके क्षयका उपाय और ब्रह्मचिन्तनके अभ्यासका निरूपण ... १२९ | २६—राजा विदूरथका वासनामय यमपुरीमें गमन-लीला और सरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन और पूर्व-शरीरकी प्राप्तिका वर्णन, लीलाके शरीरकी असत्यताका कथन, समाधिमें स्थित लीलाके शरीरका विनाश, लीलाके साथ वार्तालाप और राजा पद्मके पुनरुज्जीवनका कथन, गन्ध... |
| १६—सरस्वती और लीलाका ज्ञानदेहके द्वारा आकाशमें गमन और उसका वर्णन ... १३० | |
| १७—लीलाका भूतलमें प्रवेश और उसके द्वारा अपने पूर्वजन्मके स्वजनोंके दर्शन, ज्येष्ठशर्माको माताके रूपमें लीलाका दर्शन न होनेका कारण ... १३१ | |
| १८—लीलाकी सत्य-सङ्कल्पता, उसे अपने अनेक जन्मोंकी स्मृति, लीला और सरस्वतीका आकाशमें भ्रमण तथा परम व्योम—परमात्माकी अनादि-अनन्त सत्ताका प्रतिपादन ... १३३ | |
| १९—लीलाद्वारा ब्रह्माण्डोंका निरीक्षण, दोनों देवियोंका भारतवर्षमें लीलाके पतिके राज्यमें जाना और |
( ६ )
| उठनेसे नगर और अन्तःपुरमें उत्सव, लीलोपाख्यानके प्रयोजनका विस्तारसे कथन ... १६७ | ३९—मनकी परमात्मरूपता, ब्रह्मकी विविध शक्ति, सबकी ब्रह्मरूपता, मनके संकल्पसे ही सृष्टि-विस्तार तथा वासना एवं मनके नाशसे ही श्रेयकी प्राप्तिका प्रतिपादन ... १९६ |
| २७—सृष्टिकी असत्यता तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन ... १७५ | ४०—जगत्की चित्तरूपता, वासनायुक्त मनके दोष, मनका महान् वैभव तथा उसे वशमें करनेका उपाय ... १९८ |
| २८—जगत्की असत्ता या भ्रमरूपताका प्रतिपादन तथा नियति और पौरुषका विवेचन ... १७७ | ४१—चित्तरूपी रोगकी चिकित्साके उपाय तथा मनोनिग्रहसे लाभ ... २०१ |
| २९—ब्रह्मकी सर्वरूपता तथा उसमें भेदका अभाव, परमात्मासे जीवकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका विवेचन, परमात्मासे ही मनकी उत्पत्ति, मनका भ्रम ही जगत् है—इसका प्रतिपादन तथा जीव-चित्त आदिकी एकता ... १७८ | ४२—मनोनाशके उपायभूत वासना-त्यागका उपदेश, अविद्या-वासनाके दोष तथा इसके विनाशके उपायकी जिज्ञासा ... २०२ |
| ३०—चित्तका विलास ही द्वैत है, त्याग और ज्ञानसे ही अज्ञानसहित मनका क्षय होता है—इसका प्रतिपादन तथा भोक्ता जीवके स्वरूपका वर्णन १७९ | ४३—अविद्याके विनाशके हेतुभूत आत्मदर्शनका, विशुद्ध परमात्मस्वरूपका तथा असंकल्पसे वासनाक्षयका प्रतिपादन ... २०४ |
| ३१—परमार्थसत्ताका विवेचन, बीजमें वृक्षकी भाँति परमात्मामें जगत्की त्रैकालिक स्थितिका निरूपण तथा ब्रह्मसे पृथक् उसकी सत्ता नहीं है—इसका प्रतिपादन ... १८२ | ४४—अविद्याकी बन्धनकारितापर आश्चर्य; चेष्टा देहमें नहीं, देहीमें है—इसका प्रतिपादन तथा अज्ञानकी सात भूमिकाओंका वर्णन ... २०६ |
| ३२—जगत्की ब्रह्मसे पृथक् सत्ताका खण्डन, भेदकी व्यावहारिकता तथा चित्तकी ही दृश्यरूपताका प्रतिपादन ... १८५ | ४५—ज्ञानकी सात भूमिकाओंका विशद विवेचन २०७ |
| ३३—यह दृश्य-प्रपञ्च मनका विलासमात्र है, इसका ब्रह्माजीके द्वारा अपने अनुभवके अनुसार प्रतिपादन ... १८६ | ४६—मायिक रूपका निराकरण करके सन्मात्रत्वका प्रदर्शन, अविद्याके स्वरूपका निरूपण, संक्षेपमें ज्ञानभूमिका एवं जीवात्माके वास्तविक स्वरूपका वर्णन ... २१५ |
| ३४—स्थूल-शरीरकी निन्दा, मनोमय शरीरकी विशेषता, उसे सत्कर्ममें लगानेकी प्रेरणा, ब्रह्मा और उनके द्वारा निर्मित जगत्की मनोमयता, जीवका स्वरूप और उसकी विविध सांसारिक गति तथा सृष्टिके दोष एवं मिथ्यात्वका उपदेश ... १८८ | स्थिति-प्रकरण<br><br>१—चित्तरूपसे जगत्का वर्णन, जगत्की स्थितिका खण्डन करके पूर्णानन्दस्वरूप सन्मात्रकी स्थितिका कथन, मनको ही जगत्का कारण बताकर उसके नाश होनेपर जगत्की शून्यताका कथन २१८ |
| ३५—जीवोंकी चौदह श्रेणियों तथा परब्रह्म परमात्मासे ही उत्पन्न होनेके कारण सबकी ब्रह्मरूपता ... १९० | २—स्वरूपकी विस्मृतिसे ही भेद्भ्रमकी अनुभूति, चित्तशुद्धि एवं जाग्रत् आदि अवस्थाओंके शोधनसे ही भ्रम-निवारणपूर्वक आत्मबोधकी प्राप्ति तथा वैराग्यमूलक विवेकसे ही मोक्षलाभका वर्णन ... २२० |
| ३६—कर्ता और कर्मकी सहोत्पत्ति एवं अभिन्नता तथा चित्त और कर्मकी एकताका प्रतिपादन ... १९२ | ३—उपासनाओंके अनुसार फलकी प्राप्ति तथा जाग्रत्-स्वप्न अवस्थाओंका वर्णन, मनको सत्य आत्मामें लगानेका आदेश, मनको भावनाके अनुसार रूप और फलकी प्राप्ति तथा भावनाके त्यागसे विचारद्वारा ब्रह्मभावकी प्राप्तिका प्रतिपादन ... २२२ |
| ३७—मनका स्वरूप तथा उसकी विभिन्न संज्ञाओंपर विचार ... १९३ | |
| ३८—मनके द्वारा जगत्के विस्तार तथा अज्ञानीके उपदेशके लिये कल्पित त्रिविध आकाशका निरूपण एवं मनको परमात्मचिन्तनमें लगानेकी आवश्यकता ... १९५ |
सम्पूर्ण ग्रन्थ
| ( ७ ) | |
|---|---|
| ४-दृढ़ बोध होनेपर सम्पूर्ण दोषोंके विनाश, अन्तःकरणकी शुद्धि और विशुद्ध आत्मतत्त्वके साक्षात्कारकी महिमाका प्रतिपादन ... २२४ | १६-विरक्त एवं विवेकयुक्त ज्ञानी तथा भोगासक्त मूढ़की स्थितिमें अन्तर; जगत्को मिथ्या मानकर उसमें आस्था न रखने, देहाभिमानको छोड़ने और अपने विशुद्ध स्वरूप (परमात्मपद) में स्थित होनेका उपदेश ... ... २४३ |
| ५-शरीररूपी नगरीके सम्राट् ज्ञानीके रागरहित स्थितिका वर्णन ... २२५ | १७-वासना, अभिमान और एषणाका त्याग करके परमात्मपदमें प्रतिष्ठित होनेकी प्रेरणा तथा तत्त्वज्ञानी महात्माकी महत्तम स्थितिका वर्णन २४४ |
| ६-मन और इन्द्रियोंकी प्रबलता तथा उनको जीतनेसे लाभ, अत्यन्त अज्ञानी और ज्ञानीके लिये उपदेशकी व्यर्थता तथा जगत् और ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन ... ... २२६ | १८-परमात्मभावमें स्थित हुए कचके द्वारा सर्वात्मत्वका बोध करानेवाली गाथाओंका गान, भोगोंसे वैराग्यका उपदेश तथा सबकी परमात्मामें स्थितिका कथन ... ... २४६ |
| ७-शास्त्रचिन्तन, शास्त्रीय सदाचारके सेवन तथा शास्त्रविपरीत आचारके त्यागसे लाभ ... २२८ | १९-राजस-सात्त्विकी कर्मोपासनासे भूतलपर उत्पन्न हुए पुरुषोंकी स्थितिका वर्णन, जगत्की अनित्यता एवं परमात्माकी सर्वव्यापकताकी भावनाके लिये उपदेश, श्रीरामके आदर्श गुणोंको अपनाने एवं पौरुष-प्रयत्न करनेसे जीवन्मुक्त पदकी प्राप्तिका कथन ... २४७ |
| ८-शास्त्रीय शुभ उद्योगकी सफलताका प्रतिपादन, अहङ्कारकी बन्धकता और उसके त्यागसे मोक्षकी प्राप्तिका वर्णन ... २२९ | <br>उपशम-प्रकरण |
| ९-सर्वत्र और सभी रूपोंमें चेतन आत्माकी ही स्थितिका वर्णन ... ... २३२ | १-श्रीवसिष्ठजीका मध्याह्नकालमें प्रवचन समाप्त करके सबको विदा देनेके पश्चात् अपने आश्रममें जाना और दैनिक कर्मके अनुष्ठानमें तत्पर होना ... ... २४९ |
| १०-ज्ञानी और अज्ञानीका अन्तर, वासनाके कारण ही कर्तृत्वका प्रतिपादन, तत्त्वज्ञानीके अकर्तापन एवं बन्धनाभावका निरूपण ... २३३ | २-श्रीराम आदि राजकुमारोंकी तात्कालिक दिनचर्या, वसिष्ठजी तथा अन्य सभासदोंका पुनः सभामें प्रवेश, राजा दशरथद्वारा मुनिके उपदेशकी प्रशंसा तथा श्रीरामकी उनसे पुनः उपदेश देनेके लिये प्रार्थना ... २५० |
| ११-सर्वशक्तिमान् ब्रह्मसे ही सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और लय होनेसे सबकी परब्रह्मरूपताका प्रतिपादन; अत्यन्त मूढ़को नहीं, विवेकी जिज्ञासुको ही 'सर्वं ब्रह्म' का उपदेश देनेकी आवश्यकता तथा बाजीगरके दिखाये हुए खेलकी भाँति मायामय जगत्के मिथ्यात्वका वर्णन ... ... २३४ | ३-संसाररूपा मायाका मिथ्यात्व, साधनाका क्रम, आत्माके अज्ञानसे दुःख और ज्ञानसे ही सुखका कथन, आत्माकी निर्लेपता और जगत्की असत्ताका प्रतिपादन ... ... २५३ |
| १२-दृश्यकी असत्ता और सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन, मायाके दोष तथा आत्मज्ञानसे ही उसका निवारण ... .. २३६ | ४-कर्तव्य-बुद्धिसे अनासक्त एवं सम रहकर कर्म करनेकी प्रेरणा, सकाम कर्मोंकी दुर्गति और आत्मज्ञानीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन तथा राजा जनकके द्वारा सिद्धगीताका श्रवण ... २५५ |
| १३-चेतनतत्त्वका ही क्षेत्रज्ञ, अहङ्कार आदिके रूपमें विस्तार तथा अविद्याके कारण जीवोंके कर्मानुसार नाना योनियोंमें जन्मोंका वर्णन ... २३७ | ५-सिद्धोंके उपदेशको सुनकर राजा जनकका एकान्तमें स्थित हो संसारकी नश्वरता एवं |
| १४-परमात्मनिष्ठ ज्ञानीकी दृष्टिमें संसारका मिथ्यात्व, मनोमय होनेके कारण जगत्की असत्ता तथा ज्ञानीकी दृष्टिमें सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन २३८ | |
| १५-सांसारिक वस्तुओंसे वैराग्य एवं जीवन्मुक्त महात्माओंके उत्तम गुणोंका उपदेश, बारम्बार होनेवाले ब्रह्मा, ब्रह्माण्ड एवं विविध भूतोंकी सृष्टिपरम्परा तथा ब्रह्ममें उसके अत्यन्ताभावका कथन ... २४१ |
( ८ )
| आत्माके विवेक-विज्ञानको सूचित करनेवाले अपने आन्तरिक उद्गार एवं निश्चयको प्रकट करना ··· २५७ | होकर उन्हें सारभूत सिद्धान्तका उपदेश देकर चला जाना ··· २७६ |
| ६—राजा जनकद्वारा संसारकी स्थितिपर विचार और उनका अपने चित्तको समझाना ··· २५९ | १७—राजा बलिको शुक्राचार्यके दिये हुए उपदेशपर विचार करते-करते समाधिस्थ हो जाना, दानवोंके स्मरण करनेसे आये हुए दैत्यगुरुका बलिकी सिद्धावस्थाको बताकर उनकी चिन्ता दूर करना २७८ |
| ७—राजा जनककी जीवन्मुक्तरूपसे स्थिति तथा विशुद्ध विचार एवं प्रज्ञाके अद्भुत माहात्म्यका वर्णन ··· २६१ | १८—समाधिसे जगे हुए बलिको विचारपूर्वक सम-भावसे स्थित होना, श्रीहरिका उन्हें त्रिलोकीके राज्यसे हटाकर पातालका ही राजा बनाना; उस अवस्थामें भी उनकी समतापूर्ण स्थिति तथा श्रीरामके चिन्मय स्वरूपका वर्णन ··· २८१ |
| ८—चित्तकी शान्तिके उपायोंका युक्तियोंद्वारा वर्णन ··· २६३ | १९—प्रह्लादका उपाख्यान—भगवान् नृसिंहकी क्रोधाग्नि-से हिरण्यकशिपु आदि दैत्योंका संहार तथा प्रह्लादका विचारद्वारा अपने आपको भगवान् विष्णुसे अभिन्न अनुभव करना ··· २८३ |
| ९—अनधिकारीको दिये गये उपदेशकी व्यर्थता, मनको जीतने या शान्त करनेकी प्रेरणा तथा तत्त्वबोधसे ही मनके उपशामका कथन; तृष्णाके दोष, वासनाक्षय और जीवन्मुक्तके स्वरूपका वर्णन ··· २६५ | २०—प्रह्लादके द्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्य पूजा, उसके प्रभावसे समस्त दैत्योंको वैष्णव हुआ देख विस्मयमें पड़े हुए देवताओंका भगवान्से इसके विषयमें पूछना, भगवान्का देवताओंको सान्त्वना दे अदृश्य हो प्रह्लादके देवपूजा-गृहमें प्रकट होना और प्रह्लादद्वारा उनकी स्तुति ··· २८५ |
| १०—जीवन्मुक्तिकी प्राप्ति करानेवाले विभिन्न प्रकारके निश्चयों तथा सब कुछ ब्रह्म ही है, इस पारमार्थिक स्थितिका वर्णन ··· २६६ | २१—प्रह्लादको भगवान्द्वारा वर-प्राप्ति, प्रह्लादका आत्मचिन्तन करते हुए परमात्माका साक्षात्कार करना और उनका स्तवन करते हुए समाधिस्थ हो जाना, तत्पश्चात् पातालकी अराजकताका वर्णन और भगवान् विष्णुका प्रह्लादको समाधि-से विरत करनेका विचार ··· २८८ |
| ११—महापुरुषोंके स्वभावका वर्णन तथा अनासक्त भावसे संसारमें विचरनेका उपदेश ··· २६७ | २२—भगवान् विष्णुका पातालमें जाना और शङ्ख-ध्वनिसे प्रह्लादको प्रबुद्ध करके उन्हें तत्त्वज्ञानका उपदेश देना, प्रह्लादद्वारा भगवान्का पूजन, भगवान्का प्रह्लादको दैत्यराज्यपर अभिषिक्त करके कर्तव्यका उपदेश देकर क्षीरसागरको लौट जाना, आख्यानका उत्तम फल, जीवन्मुक्तोंके व्युत्थानका हेतु और पुरुषार्थकी शक्तिका कथन २९४ |
| १२—पिता-माताके शोकसे व्याकुल हुए अपने भाई पावनको पुण्यका समझाना—जगत् और उसके सम्बन्धकी असत्यताका प्रतिपादन ··· २६९ | २३—मायाचक्रका निरूपण, चित्तनिरोधकी प्रशंसा, भगवत्प्राप्तिकी महिमा, मनकी सर्प और विषवृक्षसे तुलना, उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन ··· २९८ |
| १३—पुण्यका पावनको उपदेश—अनेक जन्मोंमें प्राप्त हुए असंख्य सम्बन्धियोंकी ओरसे ममता हटाकर उन्हें आत्मस्वरूप परमात्मासे ही संतोष प्राप्त करनेका आदेश, पुण्य और पावनको निर्वाण-पदकी प्राप्ति, तृष्णा और विषय-चिन्तनके त्यागसे मनके क्षीण हो जानेपर परमपदकी प्राप्तिका कथन ··· २७० | |
| १४—राजा बलिके अन्तःकरणमें वैराग्य एवं विचारका उदय तथा उनका अपने पितासे पहलेके पूछे हुए प्रश्नोंका स्मरण करना ··· २७२ | |
| १५—विरोचनका बलिको भोगोंसे वैराग्य तथा विचार-पूर्वक परमात्मासाक्षात्कारके लिये उपदेश ··· २७४ | |
| १६—बलिको पिताके दिये हुए ज्ञानोपदेशके स्मरणसे संतोष तथा पहलेकी अज्ञानमयी स्थितिको याद करके खेद प्रकट करते हुए शुक्राचार्यका चिन्तन करना; शुक्राचार्यका आना और बलिसे पूजित |
( ९ )
| २४—महर्षि उद्दालककी साधना, तपस्या और परमात्मप्राप्तिका कथन, सत्ता-सामान्य, समाधि और समाहितके लक्षण ... ३०६ | विचरणका वर्णन; जीवन्मुक्त महात्माओंके गुण, लक्षण और महिमा ... ३३७ |
| २५—किरातराज सुरघुका वृत्तान्त—महर्षि माण्डव्यका सुरघुके महलमें पधारना और उपदेश देकर अपने आश्रमको लौट जाना, सुरघुके आत्म-विषयक चिन्तनका वर्णन तथा उसे परमपदकी प्राप्ति ... ३१० | ३६—चित्तके स्पन्दनसे होनेवाली जगत्की भ्रान्ति, चित्त और प्राण-स्पन्दनका स्वरूप तथा उसके निरोधरूप योगकी सिद्धिके अनेक उपाय ... ३३९ |
| २६—किरातराज सुरघु और राजर्षि पर्णाद ( परिघ ) का संवाद ... ३१४ | ३७—चित्तके उपशमके लिये ज्ञानयोगरूप उपाय एवं विवेक-विचारके द्वारा चित्तका विनाश होनेपर ब्रह्म-विचारसे परमात्माकी प्राप्ति ... ३४२ |
| २७—आत्माका संसार-दुःखसे उद्धार करनेके उपायों-का कथन तथा भास और विलास नामक तपस्वियोंके वृत्तान्तका आरम्भ ... ३१८ | ३८—वीतहव्य मुनिका एकाग्रताकी सिद्धिके लिये इन्द्रिय और मनको बोधित करना ... ३४४ |
| २८—भास और विलासकी परस्पर बातचीत और तत्त्वज्ञानद्वारा उन्हें मोक्षकी प्राप्ति; देह और आत्माका सम्बन्ध नहीं है तथा आसक्ति ही बन्धनका हेतु है—इसका निरूपण ... ३२१ | ३९—इन्द्रियों और मनके रहते समस्त दोषोंकी प्राप्ति तथा उनके शमनसे समस्त गुणोंकी और परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन ... ३४६ |
| २९—संसक्ति और असंसक्तिका लक्षण, आसक्तिके भेद उनके लक्षण और फलका वर्णन, आसक्तिके त्यागसे जीवात्मा कर्म-फलसे सम्बद्ध नहीं होता—इसका कथन ... ३२४ | ४०—वीतहव्य महामुनिकी समाधि और उससे जागना, छः रात्रितक पुनः समाधि, चिरकालतक जीवन्मुक्त स्थिति, उनके द्वारा दुःख-सुकृत आदिको नमस्कार और उनका परमात्मामें विलीन हो जाना ... ३४८ |
| ३०—असङ्ग सुखमें परम शान्तिको प्राप्त पुरुषके व्यवहार-कालमें भी दुखी न होनेका प्रतिपादन, ज्ञानीकी 'तुर्यावस्था' तथा देह और आत्माके अन्तरका वर्णन ... ३२७ | ४१—महामुनि वीतहव्यकी ॐकारकी अन्तिम मात्राका अवलम्बन करके परमात्मप्राप्तिरूप मुक्तावस्थाका तथा मुक्त होनेपर उनके शरीर प्राणों और सब धातुओंका अपने-अपने उपादान कारणमें विलीन होकर मूल-प्रकृतिमें लीन होनेका वर्णन ३५० |
| ३१—देहादिके संयोग-वियोगादिमें राग-द्वेष और हर्ष-शोकसे रहित शुद्ध आत्माके स्वरूपका विवेचन ३२९ | ४२—ज्ञानी महात्माओंके लिये आकाश-गमन आदि सिद्धियोंकी अनावश्यकताका कथन ... ३५१ |
| ३२—दो प्रकारके मुक्तिदायक अहंकारका और एक प्रकारके बन्धनकारक अहंकारका एवं परमात्माके स्वरूपका वर्णन ... ३३१ | ४३—जीवन्मुक्त और विदेह-मुक्त पुरुषोंके चित्तनाशका वर्णन ... ३५३ |
| ३३—मन, अहंकार, वासना और अविद्याके नाशसे मुक्ति तथा जीवन्मुक्त पुरुषके लक्षण और महिमाका प्रतिपादन ... ३३२ | ४४—शरीरका कारण मन है तथा मनके कारण प्राण-स्पन्द और वासना इनका कारण विषय, विषयका कारण जीवात्मा और जीवात्माका कारण परमात्मा है—इस तत्त्वका प्रतिपादन .. ३५४ |
| ३४—मनुष्य, असुर, देव आदि योनियोंमें होनेवाले हर्ष-शोकादिसे रहित जीवन्मुक्त महात्माओंका वर्णन ... ३३५ | ४५—तत्त्वज्ञान, वासनाक्षय और मनोनाशसे परमपदकी प्राप्ति तथा मनको वशमें करनेके उपायोंका वर्णन ... ३५७ |
| ३५—स्त्रीरूप तरङ्गसे युक्त संसाररूपी समुद्र, उससे तरनेके उपाय और तरनेके अनन्तर सुखपूर्वक | ४६—विचारकी प्रौढता, वैराग्य एवं सद्गुणोंसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति और जीवन्मुक्त महात्माओंकी स्थितिका वर्णन ... ३५९ |
| निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध<br>१—श्रीवसिष्ठजीके कहनेपर श्रोताओंका सभासे उठकर दैनिक क्रिया करना तथा सुने गये विषयोंका चिन्तन करना .. ३६२ |
( १० )
| २—श्रीरामचन्द्र आदिका महाराज वसिष्ठजीकी सभामें लाना तथा महर्षि वसिष्ठजीके द्वारा उपदेशका आरम्भ, चित्तके विनाशका और श्रीरामचन्द्रजीकी ब्रह्मरूपताका निरूपण \dots ३६३ | अभावका प्रतिपादन \dots \dots ३८५ |
| ३—ब्रह्मकी जगत्कारणता और ज्ञानद्वारा मायाके विनाशका तथा श्रीवसिष्ठजीके द्वारा श्रीरामकी महिमा एवं श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा अपने परमार्थ-स्वरूपका वर्णन \dots ३६५ | १३—प्राण-अपानकी गतिको तत्त्वतः जाननेसे मुक्ति ३८७ |
| ४—देह और आत्माके विवेकका एवं अज्ञानीको देहमें आत्मबुद्धि और विषयोंमें सुख-बुद्धि करनेसे दुःखकी प्राप्तिका प्रतिपादन \dots ३६६ | १४—पूरक, रेचक, कुम्भक प्राणायामका तत्त्व जानकर अभ्यास करनेसे मुक्ति और सर्वशक्तिमान् परमात्माकी उपासनाकी महिमा \dots ३८८ |
| ५—अज्ञानकी महिमा और विभूतियोंका सविस्तर वर्णन ३६८ | १५—भुशुण्डकी वास्तविक स्थितिका निरूपण, वसिष्ठजी-द्वारा भुशुण्डकी प्रशंसा, भुशुण्डद्वारा वसिष्ठजीका पूजन तथा आकाशमार्गसे वसिष्ठजीकी स्वलोकप्राप्ति ३९० |
| ६—अविद्याके कार्य संसाररूप विष-वृक्ष, त्रिधा एवं अविद्याके स्वरूप तथा उन दोनोंमें रहित परमार्थ-वस्तुका वर्णन \dots ३६९ | १६—शरीर और संसारकी अनिश्चितता तथा भ्रान्ति-रूपताका वर्णन \dots \dots ३९२ |
| ७—अविद्यामूलक स्थावरयोनिके जीवोंके स्वरूपका तथा विवेकपूर्वक विचारसे अविद्याके नाशका प्रतिपादन \dots ३७१ | १७—संसार-चक्रके अवरोधका उपाय, शरीरकी नश्वरता और आत्माकी अविनाशिता एव अहङ्काररूपी चित्तके त्यागका वर्णन तथा श्रीमहादेवजीके द्वारा श्रीवसिष्ठजीके प्रति निर्गुण-निराकार परमात्माकी पूजाका प्रतिपादन \dots ३९४ |
| ८—परमात्मा सर्वात्मक और सर्वातीत है—इसका प्रतिपादन एव महात्मा पुरुषोंके लक्षण तथा आत्मकल्याणके लिये परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान और प्राण निरोधरूप योगका वर्णन • ३७२ | १८—चेतन परमात्माकी सर्वात्मता \dots \dots ३९८ |
| ९—देव-सभामें वायसराज भुशुण्डका वृत्तान्त सुनकर महर्षि वसिष्ठका उसे देखनेके लिये मेरुगिरिपर जाना, मेरु-शिखर तथा 'चूत' नामक कल्पतरुका वर्णन, वसिष्ठजीका भुशुण्डसे मिलना भुशुण्डद्वारा उनका आतिथ्य-सत्कार, वसिष्ठजीका भुशुण्डसे उनका वृत्तान्त पूछना और उनके गुणोंका वर्णन करना \dots ३७५ | १९—शुद्धचेतन आत्मा और जीवात्माके स्वरूपका विवेचन \dots • ३९९ |
| १०—भुशुण्डका वसिष्ठजीसे अपने जन्मवृत्तान्तके प्रसङ्गमें महादेवजी तथा मातृकाओंका वर्णन करते हुए अपनी उत्पत्ति, ज्ञानप्राप्ति और उस घोंसलेमें आनेका वृत्तान्त कहना \dots ३७९ | २०—सङ्कल्प-त्यागसे द्वैतभावनाकी निवृत्ति और परम पदस्वरूप परमात्माकी प्राप्तिका प्रतिपादन \dots ४०० |
| ११—'तुम्हारी कितनी आयु है और तुम किन-किन वृत्तान्तोंका स्मरण करते हो ?' वसिष्ठजीद्वारा पूछे हुए इन प्रश्नोंका भुशुण्डद्वारा समाधान \dots ३८२ | २१—सबके परम कारण परम पूजनीय परमात्माका वर्णन • ४०२ |
| १२—जिसे मृत्यु नहीं मार सकती, उस निर्दोष महात्माकी स्थितिका, परमतत्त्वकी उपासनाका तथा तीनों लोकोंके पदार्थोंमें सुख-शान्तिके | २२—परमशिव परमात्माकी अनन्त शक्तियां • ४०३ |
| २३—सच्चिदानन्दघन परमदेव परमात्माके ध्यानरूप पूजनसे परमपदकी प्राप्ति \dots \dots ४०४ | |
| २४—शास्त्राभ्यास और गुरूपदेशकी सफलता, ब्रह्मके नामभेदोंका और स्वरूपका रहस्य एव दुःखनाशका उपाय • \dots ४०७ | |
| २५—समष्टि व्यष्ट्यात्मक जो संसार है, वह सब माया ही है—यह उपदेश देकर भगवान् श्रीशङ्करका अपने वासस्थानको जाना तथा श्रीवसिष्ठजी और श्रीरामजीके द्वारा अपनी-अपनी स्थितिका वर्णन \dots ४०८ | |
| २६—ज्ञानकी प्राप्तिके लिये वासना, आसक्ति और अज्ञानके नाशसे मनके विनाशका वर्णन \dots ४१० | |
| २७—शिलाके रूपमें ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन \dots ४११ | |
| २८—परमात्माके स्वरूपका और अविद्याके अत्यन्त अभावका निरूपण • \dots ४१३ |
( ११ )
| २९-जीवात्माका अपनी भावनासे लिङ्गदेहात्मक पुर्यष्टक बनकर अनेक रूप धारण करना ... ४१४ | गुरु त्रितलके साथ निवास, भगीरथको पुनः राज्यप्राप्ति और ब्रह्मा, रुद्र आदिकी आराधना करनेसे गङ्गाजीका भूतलपर अवतरण ४३५ |
| ३०-पुर्यष्टक बने हुए जीवात्माको तत्त्वज्ञानसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति होनेका कथन ... ४१५ | ४५-शिखिध्वज और चूडालाके आख्यानका आरम्भ, शिखिध्वजके गुणोंका तथा चूडालाके साथ विवाह और क्रीडाका वर्णन ... ४३७ |
| ३१-श्रीकृष्णार्जुन-आख्यानका आरम्भ—अर्जुनके प्रति भगवान् श्रीकृष्णद्वारा आत्माकी नित्यताका प्रतिपादन ... ४१७ | ४६-क्रमसे उन दोनोंकी वैराग्य एवं अध्यात्म-ज्ञानमें निष्ठा तथा चूडालाको यथार्थ ज्ञानसे परमात्माकी प्राप्ति ... ४३९ |
| ३२-कर्तृत्वाभिमानसे रहित पुरुषके कर्मोंसे लिप्त न होनेका निरूपण एवं सङ्गत्याग, ब्रह्मार्पण, ईश्वरार्पण, संन्यास, ज्ञान और योगकी परिभाषा ... ४१८ | ४७-चूडालाको अपूर्व शोभासम्पन्न देखकर राजा शिखिध्वजका प्रसन्न होना और उससे वार्तालाप करना ... ४४१ |
| ३३-श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति कर्म और ज्ञानके तत्त्व-रहस्यका प्रतिपादन ... ४२१ | ४८-राजा शिखिध्वजका चूडालाके वचनोंको अयुक्त बतलाना, चूडालाका एकान्तमें योगाभ्यास करना एवं श्रीरामचन्द्रजीके पूछने-पर श्रीवसिष्ठजीके द्वारा कुण्डलिनीशक्तिका तथा विभिन्न शरीरोंमें जीवात्माकी स्थितिका वर्णन ... ४४२ |
| ३४-श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति देहकी नश्वरता, आत्माकी अविनाशिता, मनुष्योंकी मरण-स्थिति और स्वर्ग-नरकादिकी प्राप्ति एवं जीवात्माके संसारभ्रमणमें कारणरूप वासनाके नाशसे मुक्तिका प्रतिपादन ... ४२२ | ४९-आधि और व्याधिके नाशका तथा सिद्धिका और सिद्धोंके दर्शनका उपाय ... ४४४ |
| ३५-श्रीमद्भगवान्के द्वारा अर्जुनके प्रति जीवन्मुक्त अवस्था और जगद्रूप चित्रका वर्णन एवं वासनारहित और ब्रह्मस्वरूप होकर स्थित रहनेका उपदेश तथा इस उपदेशको सुनकर तत्त्वज्ञानके द्वारा अर्जुनकी अविद्यासहित वासनाका और मोहका नाश हो जाना ... ४२४ | ५०-ज्ञानसाध्य वस्तु और योगियोंकी परकाय-प्रवेश-सिद्धिका वर्णन ... ४४७ |
| ३६-परमात्माकी नित्य सत्ता, जगत्की असत्ता एवं जीवन्मुक्त अवस्थाका निरूपण ... ४२६ | ५१-चूडालाकी सिद्धिका वैभव, गुरुपदेशकी सफलतामें किराटका आख्यान, शिखिध्वजका वैराग्य, चूडालाका उन्हें समझाना, राजा शिखिध्वजका आधी रातके समय राजमहलसे निकलकर चल देना और मन्दराचलके काननमें कुटिया बनाकर निवास करना ... ४४८ |
| ३७-परब्रह्म परमात्माके सत्ता-सामान्य स्वरूपका प्रतिपादन ... ४२७ | ५२-सोकर उठी हुई चूडालाके द्वारा राजाकी खोज, वनमें राजाके दर्शन और राजाके भविष्यका विचार करके चूडालाका लौटना, नगरमें आकर राज्य-शासन करना; तदनन्तर कुछ समय बाद राजाको ज्ञानोपदेश देनेके लिये ब्राह्मणकुमारके वेषमें उनके पास जाना, राजाद्वारा उसका सत्कार और परस्पर वार्तालाप-के प्रसङ्गमें कुम्भद्वारा कुम्भकी उत्पत्ति, बुद्धि और ब्रह्माजीके साथ उसके समागमका वर्णन ४५२ |
| ३८-संसारके मिथ्यात्वका दिग्दर्शन तथा मोहसे जीवके पतनका कथन ... ४२८ | ५३-राजा शिखिध्वजद्वारा कुम्भकी प्रशंसा, कुम्भका ब्रह्माजीके द्वारा किये हुए ज्ञान-और कर्मके |
| ३९-चार प्रकारका मौन और उनमेंसे जीवन्मुक्त ज्ञानीके सुषुप्त मौनकी श्रेष्ठता ... ४२९ | |
| ४०-सांख्ययोग और अष्टाङ्गयोगके द्वारा परमपदकी प्राप्ति ... ४२९ | |
| ४१-वेताल और राजाका संवाद ... ४३१ | |
| ४२-वेतालकृत छः प्रश्नोंका राजाद्वारा समाधान ... ४३२ | |
| ४३-भगीरथके गुण, उनका विवेकपूर्वक वैराग्य और अपने गुरु त्रितलके साथ संवाद ... ४३३ | |
| ४४-राजा भगीरथका सर्वस्वत्याग, भिक्षाटन और |