भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 16
( ७ )
४-दृढ़ बोध होनेपर सम्पूर्ण दोषोंके विनाश, अन्तःकरणकी शुद्धि और विशुद्ध आत्मतत्त्वके साक्षात्कारकी महिमाका प्रतिपादन ... २२४१६-विरक्त एवं विवेकयुक्त ज्ञानी तथा भोगासक्त मूढ़की स्थितिमें अन्तर; जगत्‌को मिथ्या मानकर उसमें आस्था न रखने, देहाभिमानको छोड़ने और अपने विशुद्ध स्वरूप (परमात्मपद) में स्थित होनेका उपदेश ... ... २४३
५-शरीररूपी नगरीके सम्राट् ज्ञानीके रागरहित स्थितिका वर्णन ... २२५१७-वासना, अभिमान और एषणाका त्याग करके परमात्मपदमें प्रतिष्ठित होनेकी प्रेरणा तथा तत्त्वज्ञानी महात्माकी महत्तम स्थितिका वर्णन २४४
६-मन और इन्द्रियोंकी प्रबलता तथा उनको जीतनेसे लाभ, अत्यन्त अज्ञानी और ज्ञानीके लिये उपदेशकी व्यर्थता तथा जगत् और ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन ... ... २२६१८-परमात्मभावमें स्थित हुए कचके द्वारा सर्वात्मत्वका बोध करानेवाली गाथाओंका गान, भोगोंसे वैराग्यका उपदेश तथा सबकी परमात्मामें स्थितिका कथन ... ... २४६
७-शास्त्रचिन्तन, शास्त्रीय सदाचारके सेवन तथा शास्त्रविपरीत आचारके त्यागसे लाभ ... २२८१९-राजस-सात्त्विकी कर्मोपासनासे भूतलपर उत्पन्न हुए पुरुषोंकी स्थितिका वर्णन, जगत्‌की अनित्यता एवं परमात्माकी सर्वव्यापकताकी भावनाके लिये उपदेश, श्रीरामके आदर्श गुणोंको अपनाने एवं पौरुष-प्रयत्न करनेसे जीवन्मुक्त पदकी प्राप्तिका कथन ... २४७
८-शास्त्रीय शुभ उद्योगकी सफलताका प्रतिपादन, अहङ्कारकी बन्धकता और उसके त्यागसे मोक्षकी प्राप्तिका वर्णन ... २२९<br>उपशम-प्रकरण
९-सर्वत्र और सभी रूपोंमें चेतन आत्माकी ही स्थितिका वर्णन ... ... २३२१-श्रीवसिष्ठजीका मध्याह्नकालमें प्रवचन समाप्त करके सबको विदा देनेके पश्चात् अपने आश्रममें जाना और दैनिक कर्मके अनुष्ठानमें तत्पर होना ... ... २४९
१०-ज्ञानी और अज्ञानीका अन्तर, वासनाके कारण ही कर्तृत्वका प्रतिपादन, तत्त्वज्ञानीके अकर्तापन एवं बन्धनाभावका निरूपण ... २३३२-श्रीराम आदि राजकुमारोंकी तात्कालिक दिनचर्या, वसिष्ठजी तथा अन्य सभासदोंका पुनः सभामें प्रवेश, राजा दशरथद्वारा मुनिके उपदेशकी प्रशंसा तथा श्रीरामकी उनसे पुनः उपदेश देनेके लिये प्रार्थना ... २५०
११-सर्वशक्तिमान् ब्रह्मसे ही सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और लय होनेसे सबकी परब्रह्मरूपताका प्रतिपादन; अत्यन्त मूढ़को नहीं, विवेकी जिज्ञासुको ही 'सर्वं ब्रह्म' का उपदेश देनेकी आवश्यकता तथा बाजीगरके दिखाये हुए खेलकी भाँति मायामय जगत्‌के मिथ्यात्वका वर्णन ... ... २३४३-संसाररूपा मायाका मिथ्यात्व, साधनाका क्रम, आत्माके अज्ञानसे दुःख और ज्ञानसे ही सुखका कथन, आत्माकी निर्लेपता और जगत्‌की असत्ताका प्रतिपादन ... ... २५३
१२-दृश्यकी असत्ता और सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन, मायाके दोष तथा आत्मज्ञानसे ही उसका निवारण ... .. २३६४-कर्तव्य-बुद्धिसे अनासक्त एवं सम रहकर कर्म करनेकी प्रेरणा, सकाम कर्मोंकी दुर्गति और आत्मज्ञानीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन तथा राजा जनकके द्वारा सिद्धगीताका श्रवण ... २५५
१३-चेतनतत्त्वका ही क्षेत्रज्ञ, अहङ्कार आदिके रूपमें विस्तार तथा अविद्याके कारण जीवोंके कर्मानुसार नाना योनियोंमें जन्मोंका वर्णन ... २३७५-सिद्धोंके उपदेशको सुनकर राजा जनकका एकान्तमें स्थित हो संसारकी नश्वरता एवं
१४-परमात्मनिष्ठ ज्ञानीकी दृष्टिमें संसारका मिथ्यात्व, मनोमय होनेके कारण जगत्‌की असत्ता तथा ज्ञानीकी दृष्टिमें सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन २३८
१५-सांसारिक वस्तुओंसे वैराग्य एवं जीवन्मुक्त महात्माओंके उत्तम गुणोंका उपदेश, बारम्बार होनेवाले ब्रह्मा, ब्रह्माण्ड एवं विविध भूतोंकी सृष्टिपरम्परा तथा ब्रह्ममें उसके अत्यन्ताभावका कथन ... २४१
संक्षिप्त योगवासिष्ठ · पृष्ठ 16, कुल 750 में से · BharatKosha