संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
DevanagariHindipublished750 पृष्ठ
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( ८ )
| आत्माके विवेक-विज्ञानको सूचित करनेवाले अपने आन्तरिक उद्गार एवं निश्चयको प्रकट करना ··· २५७ | होकर उन्हें सारभूत सिद्धान्तका उपदेश देकर चला जाना ··· २७६ |
| ६—राजा जनकद्वारा संसारकी स्थितिपर विचार और उनका अपने चित्तको समझाना ··· २५९ | १७—राजा बलिको शुक्राचार्यके दिये हुए उपदेशपर विचार करते-करते समाधिस्थ हो जाना, दानवोंके स्मरण करनेसे आये हुए दैत्यगुरुका बलिकी सिद्धावस्थाको बताकर उनकी चिन्ता दूर करना २७८ |
| ७—राजा जनककी जीवन्मुक्तरूपसे स्थिति तथा विशुद्ध विचार एवं प्रज्ञाके अद्भुत माहात्म्यका वर्णन ··· २६१ | १८—समाधिसे जगे हुए बलिको विचारपूर्वक सम-भावसे स्थित होना, श्रीहरिका उन्हें त्रिलोकीके राज्यसे हटाकर पातालका ही राजा बनाना; उस अवस्थामें भी उनकी समतापूर्ण स्थिति तथा श्रीरामके चिन्मय स्वरूपका वर्णन ··· २८१ |
| ८—चित्तकी शान्तिके उपायोंका युक्तियोंद्वारा वर्णन ··· २६३ | १९—प्रह्लादका उपाख्यान—भगवान् नृसिंहकी क्रोधाग्नि-से हिरण्यकशिपु आदि दैत्योंका संहार तथा प्रह्लादका विचारद्वारा अपने आपको भगवान् विष्णुसे अभिन्न अनुभव करना ··· २८३ |
| ९—अनधिकारीको दिये गये उपदेशकी व्यर्थता, मनको जीतने या शान्त करनेकी प्रेरणा तथा तत्त्वबोधसे ही मनके उपशामका कथन; तृष्णाके दोष, वासनाक्षय और जीवन्मुक्तके स्वरूपका वर्णन ··· २६५ | २०—प्रह्लादके द्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्य पूजा, उसके प्रभावसे समस्त दैत्योंको वैष्णव हुआ देख विस्मयमें पड़े हुए देवताओंका भगवान्से इसके विषयमें पूछना, भगवान्का देवताओंको सान्त्वना दे अदृश्य हो प्रह्लादके देवपूजा-गृहमें प्रकट होना और प्रह्लादद्वारा उनकी स्तुति ··· २८५ |
| १०—जीवन्मुक्तिकी प्राप्ति करानेवाले विभिन्न प्रकारके निश्चयों तथा सब कुछ ब्रह्म ही है, इस पारमार्थिक स्थितिका वर्णन ··· २६६ | २१—प्रह्लादको भगवान्द्वारा वर-प्राप्ति, प्रह्लादका आत्मचिन्तन करते हुए परमात्माका साक्षात्कार करना और उनका स्तवन करते हुए समाधिस्थ हो जाना, तत्पश्चात् पातालकी अराजकताका वर्णन और भगवान् विष्णुका प्रह्लादको समाधि-से विरत करनेका विचार ··· २८८ |
| ११—महापुरुषोंके स्वभावका वर्णन तथा अनासक्त भावसे संसारमें विचरनेका उपदेश ··· २६७ | २२—भगवान् विष्णुका पातालमें जाना और शङ्ख-ध्वनिसे प्रह्लादको प्रबुद्ध करके उन्हें तत्त्वज्ञानका उपदेश देना, प्रह्लादद्वारा भगवान्का पूजन, भगवान्का प्रह्लादको दैत्यराज्यपर अभिषिक्त करके कर्तव्यका उपदेश देकर क्षीरसागरको लौट जाना, आख्यानका उत्तम फल, जीवन्मुक्तोंके व्युत्थानका हेतु और पुरुषार्थकी शक्तिका कथन २९४ |
| १२—पिता-माताके शोकसे व्याकुल हुए अपने भाई पावनको पुण्यका समझाना—जगत् और उसके सम्बन्धकी असत्यताका प्रतिपादन ··· २६९ | २३—मायाचक्रका निरूपण, चित्तनिरोधकी प्रशंसा, भगवत्प्राप्तिकी महिमा, मनकी सर्प और विषवृक्षसे तुलना, उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन ··· २९८ |
| १३—पुण्यका पावनको उपदेश—अनेक जन्मोंमें प्राप्त हुए असंख्य सम्बन्धियोंकी ओरसे ममता हटाकर उन्हें आत्मस्वरूप परमात्मासे ही संतोष प्राप्त करनेका आदेश, पुण्य और पावनको निर्वाण-पदकी प्राप्ति, तृष्णा और विषय-चिन्तनके त्यागसे मनके क्षीण हो जानेपर परमपदकी प्राप्तिका कथन ··· २७० | |
| १४—राजा बलिके अन्तःकरणमें वैराग्य एवं विचारका उदय तथा उनका अपने पितासे पहलेके पूछे हुए प्रश्नोंका स्मरण करना ··· २७२ | |
| १५—विरोचनका बलिको भोगोंसे वैराग्य तथा विचार-पूर्वक परमात्मासाक्षात्कारके लिये उपदेश ··· २७४ | |
| १६—बलिको पिताके दिये हुए ज्ञानोपदेशके स्मरणसे संतोष तथा पहलेकी अज्ञानमयी स्थितिको याद करके खेद प्रकट करते हुए शुक्राचार्यका चिन्तन करना; शुक्राचार्यका आना और बलिसे पूजित |