संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
DevanagariHindipublished750 पृष्ठ
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( १० )
| २—श्रीरामचन्द्र आदिका महाराज वसिष्ठजीकी सभामें लाना तथा महर्षि वसिष्ठजीके द्वारा उपदेशका आरम्भ, चित्तके विनाशका और श्रीरामचन्द्रजीकी ब्रह्मरूपताका निरूपण \dots ३६३ | अभावका प्रतिपादन \dots \dots ३८५ |
| ३—ब्रह्मकी जगत्कारणता और ज्ञानद्वारा मायाके विनाशका तथा श्रीवसिष्ठजीके द्वारा श्रीरामकी महिमा एवं श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा अपने परमार्थ-स्वरूपका वर्णन \dots ३६५ | १३—प्राण-अपानकी गतिको तत्त्वतः जाननेसे मुक्ति ३८७ |
| ४—देह और आत्माके विवेकका एवं अज्ञानीको देहमें आत्मबुद्धि और विषयोंमें सुख-बुद्धि करनेसे दुःखकी प्राप्तिका प्रतिपादन \dots ३६६ | १४—पूरक, रेचक, कुम्भक प्राणायामका तत्त्व जानकर अभ्यास करनेसे मुक्ति और सर्वशक्तिमान् परमात्माकी उपासनाकी महिमा \dots ३८८ |
| ५—अज्ञानकी महिमा और विभूतियोंका सविस्तर वर्णन ३६८ | १५—भुशुण्डकी वास्तविक स्थितिका निरूपण, वसिष्ठजी-द्वारा भुशुण्डकी प्रशंसा, भुशुण्डद्वारा वसिष्ठजीका पूजन तथा आकाशमार्गसे वसिष्ठजीकी स्वलोकप्राप्ति ३९० |
| ६—अविद्याके कार्य संसाररूप विष-वृक्ष, त्रिधा एवं अविद्याके स्वरूप तथा उन दोनोंमें रहित परमार्थ-वस्तुका वर्णन \dots ३६९ | १६—शरीर और संसारकी अनिश्चितता तथा भ्रान्ति-रूपताका वर्णन \dots \dots ३९२ |
| ७—अविद्यामूलक स्थावरयोनिके जीवोंके स्वरूपका तथा विवेकपूर्वक विचारसे अविद्याके नाशका प्रतिपादन \dots ३७१ | १७—संसार-चक्रके अवरोधका उपाय, शरीरकी नश्वरता और आत्माकी अविनाशिता एव अहङ्काररूपी चित्तके त्यागका वर्णन तथा श्रीमहादेवजीके द्वारा श्रीवसिष्ठजीके प्रति निर्गुण-निराकार परमात्माकी पूजाका प्रतिपादन \dots ३९४ |
| ८—परमात्मा सर्वात्मक और सर्वातीत है—इसका प्रतिपादन एव महात्मा पुरुषोंके लक्षण तथा आत्मकल्याणके लिये परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान और प्राण निरोधरूप योगका वर्णन • ३७२ | १८—चेतन परमात्माकी सर्वात्मता \dots \dots ३९८ |
| ९—देव-सभामें वायसराज भुशुण्डका वृत्तान्त सुनकर महर्षि वसिष्ठका उसे देखनेके लिये मेरुगिरिपर जाना, मेरु-शिखर तथा 'चूत' नामक कल्पतरुका वर्णन, वसिष्ठजीका भुशुण्डसे मिलना भुशुण्डद्वारा उनका आतिथ्य-सत्कार, वसिष्ठजीका भुशुण्डसे उनका वृत्तान्त पूछना और उनके गुणोंका वर्णन करना \dots ३७५ | १९—शुद्धचेतन आत्मा और जीवात्माके स्वरूपका विवेचन \dots • ३९९ |
| १०—भुशुण्डका वसिष्ठजीसे अपने जन्मवृत्तान्तके प्रसङ्गमें महादेवजी तथा मातृकाओंका वर्णन करते हुए अपनी उत्पत्ति, ज्ञानप्राप्ति और उस घोंसलेमें आनेका वृत्तान्त कहना \dots ३७९ | २०—सङ्कल्प-त्यागसे द्वैतभावनाकी निवृत्ति और परम पदस्वरूप परमात्माकी प्राप्तिका प्रतिपादन \dots ४०० |
| ११—'तुम्हारी कितनी आयु है और तुम किन-किन वृत्तान्तोंका स्मरण करते हो ?' वसिष्ठजीद्वारा पूछे हुए इन प्रश्नोंका भुशुण्डद्वारा समाधान \dots ३८२ | २१—सबके परम कारण परम पूजनीय परमात्माका वर्णन • ४०२ |
| १२—जिसे मृत्यु नहीं मार सकती, उस निर्दोष महात्माकी स्थितिका, परमतत्त्वकी उपासनाका तथा तीनों लोकोंके पदार्थोंमें सुख-शान्तिके | २२—परमशिव परमात्माकी अनन्त शक्तियां • ४०३ |
| २३—सच्चिदानन्दघन परमदेव परमात्माके ध्यानरूप पूजनसे परमपदकी प्राप्ति \dots \dots ४०४ | |
| २४—शास्त्राभ्यास और गुरूपदेशकी सफलता, ब्रह्मके नामभेदोंका और स्वरूपका रहस्य एव दुःखनाशका उपाय • \dots ४०७ | |
| २५—समष्टि व्यष्ट्यात्मक जो संसार है, वह सब माया ही है—यह उपदेश देकर भगवान् श्रीशङ्करका अपने वासस्थानको जाना तथा श्रीवसिष्ठजी और श्रीरामजीके द्वारा अपनी-अपनी स्थितिका वर्णन \dots ४०८ | |
| २६—ज्ञानकी प्राप्तिके लिये वासना, आसक्ति और अज्ञानके नाशसे मनके विनाशका वर्णन \dots ४१० | |
| २७—शिलाके रूपमें ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन \dots ४११ | |
| २८—परमात्माके स्वरूपका और अविद्याके अत्यन्त अभावका निरूपण • \dots ४१३ |