संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
DevanagariHindipublished750 पृष्ठ
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श्रीहरिः
संक्षिप्त योगवासिष्ठाङ्ककी विषय-सूची
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १—महर्षि वसिष्ठजीको नमस्कार<br>(सुतीक्ष्ण, नि० प्र० उ० २१६ । २६) | १ | ३—जीवन्मुक्तके स्वरूपपर विचार, जगत्के मिथ्यात्व तथा द्विविध वासनाका निरूपण तथा भगवान् श्रीरामकी तीर्थ-यात्राका वर्णन | २३ |
| २—भगवान् श्रीरामको नमस्कार<br>(वसिष्ठ, नि० प्र० पू० २ । ६०) | १ | ४—तीर्थ-यात्रासे लौटे हुए श्रीरामकी दिनचर्या एवं पिताके घरमें निवास, राजा दशरथके यहाँ विश्वामित्रका आगमन और राजाद्वारा उनका सत्कार | २५ |
| ३—योगवासिष्ठमें भगवान् श्रीरामके स्वरूप तथा माहात्म्यका प्रतिपादन | २ | ५—विश्वामित्रका अपने यज्ञकी रक्षाके लिये श्रीरामको माँगना और राजा दशरथका उन्हें देनेमें अपनी असमर्थता दिखाना | २८ |
| ४—कल्याण ('शिव') | ३ | ६—विश्वामित्रका रोष, वसिष्ठजीका राजा दशरथको समझाना, राजा दशरथका श्रीरामको बुलानेके लिये द्वारपालको भेजना तथा श्रीरामके सेवकोंका महाराजसे श्रीरामकी वैराग्यपूर्ण स्थितिका वर्णन करना | ३० |
| ५—एकश्लोकी योगवासिष्ठ (तत्त्वचिन्तक स्वामीजी श्रीअनिरुद्धाचार्यजी वेंकटाचार्यजी महाराज) | ४ | ७—विश्वामित्र आदिकी प्रेरणासे राजा दशरथका श्रीरामको सभामें बुलाकर उनका मस्तक सूँघना और मुनिके पूछनेपर श्रीरामका अपने विचार-मूलक वैराग्यका कारण बताना | ३३ |
| ६—वासिष्ठ-बोध-सार [ कविता ] (पाण्डेय श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री 'राम') | ४ | ८—धन-सम्पत्ति तथा आयुकी निस्सारता एवं दुःखरूपताका वर्णन | ३६ |
| ७—योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता<br>(पण्डित श्रीजानकीनाथजी शर्मा) | ५ | ९—अहंकार और चित्तके दोष | ३८ |
| ८—योगवासिष्ठकी आजके आत्मशान्ति, विश्व-शान्तिके इच्छुक विश्वको चुनौती तथा इस क्षणका ज्ञान-बन्धुत्व एवं शमाभास<br>(श्रीरामनिवासजी शर्मा) | ९ | १०—तृष्णाकी निन्दा | ४० |
| ९—भगवान् वसिष्ठकी जय (श्रीसूरजचंदजी सत्यप्रेमी 'डाँगीजी') | १० | ११—शरीर-निन्दा | ४३ |
| १०—योगवासिष्ठका साध्य-साधन | ११ | १२—बाल्यावस्थाके दोष | ४६ |
| ११—योगवासिष्ठका दुरुपयोग नहीं होना चाहिये<br>(भक्त श्रीरामशरणदासजी) | १५ | १३—युवावस्थाके दोष | ४७ |
| १२—श्रीगुरुवर-वसिष्ठ-स्तवन [ कविता ]<br>(पं० श्रीरामनारायणजी त्रिपाठी 'मित्र' शास्त्री) | १६ | १४—स्त्री-शरीरकी रमणीयताका निराकरण | ४९ |
| वैराग्य-प्रकरण | १५—वृद्धावस्थाकी दुःखरूपता | ५० | |
| १—सुतीक्ष्ण और अगस्ति, कारुण्य और अग्निवेश्य, सुरुचि तथा देवदूत और अरिष्टनेमि एवं वाल्मीकिके संवादका उल्लेख करते हुए भगवान्के श्रीरामावतारमें ऋषियोंके शापको कारण बताना | १७ | १६—कालके स्वरूपका विवेचन | ५१ |
| २—इस शास्त्रके अधिकारीका निरूपण, रामायणके अनुशीलनकी महिमा, भरद्वाजको ब्रह्माजीका वरदान तथा ब्रह्माजीकी आज्ञासे वाल्मीकिका भरद्वाजको संसार-दुःखसे छुटकारा पानेके निमित्त उपदेश देनेके लिये प्रवृत्त होना | २१ | १७—कालका प्रभाव और मानव-जीवनकी अनित्यता | ५३ |
| १८—सांसारिक वस्तुओंकी निस्सारता, क्षणभङ्गुरता और दुःखरूपताका तथा सत्पुरुषोंकी दुर्लभताका प्रतिपादन | ५५ |