भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 15

( ६ )

उठनेसे नगर और अन्तःपुरमें उत्सव, लीलोपाख्यानके प्रयोजनका विस्तारसे कथन ... १६७३९—मनकी परमात्मरूपता, ब्रह्मकी विविध शक्ति, सबकी ब्रह्मरूपता, मनके संकल्पसे ही सृष्टि-विस्तार तथा वासना एवं मनके नाशसे ही श्रेयकी प्राप्तिका प्रतिपादन ... १९६
२७—सृष्टिकी असत्यता तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन ... १७५४०—जगत्‌की चित्तरूपता, वासनायुक्त मनके दोष, मनका महान् वैभव तथा उसे वशमें करनेका उपाय ... १९८
२८—जगत्‌की असत्ता या भ्रमरूपताका प्रतिपादन तथा नियति और पौरुषका विवेचन ... १७७४१—चित्तरूपी रोगकी चिकित्साके उपाय तथा मनोनिग्रहसे लाभ ... २०१
२९—ब्रह्मकी सर्वरूपता तथा उसमें भेदका अभाव, परमात्मासे जीवकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका विवेचन, परमात्मासे ही मनकी उत्पत्ति, मनका भ्रम ही जगत् है—इसका प्रतिपादन तथा जीव-चित्त आदिकी एकता ... १७८४२—मनोनाशके उपायभूत वासना-त्यागका उपदेश, अविद्या-वासनाके दोष तथा इसके विनाशके उपायकी जिज्ञासा ... २०२
३०—चित्तका विलास ही द्वैत है, त्याग और ज्ञानसे ही अज्ञानसहित मनका क्षय होता है—इसका प्रतिपादन तथा भोक्ता जीवके स्वरूपका वर्णन १७९४३—अविद्याके विनाशके हेतुभूत आत्मदर्शनका, विशुद्ध परमात्मस्वरूपका तथा असंकल्पसे वासनाक्षयका प्रतिपादन ... २०४
३१—परमार्थसत्ताका विवेचन, बीजमें वृक्षकी भाँति परमात्मामें जगत्‌की त्रैकालिक स्थितिका निरूपण तथा ब्रह्मसे पृथक्‌ उसकी सत्ता नहीं है—इसका प्रतिपादन ... १८२४४—अविद्याकी बन्धनकारितापर आश्चर्य; चेष्टा देहमें नहीं, देहीमें है—इसका प्रतिपादन तथा अज्ञानकी सात भूमिकाओंका वर्णन ... २०६
३२—जगत्‌की ब्रह्मसे पृथक् सत्ताका खण्डन, भेदकी व्यावहारिक­ता तथा चित्तकी ही दृश्यरूपताका प्रतिपादन ... १८५४५—ज्ञानकी सात भूमिकाओंका विशद विवेचन २०७
३३—यह दृश्य-प्रपञ्च मनका विलासमात्र है, इसका ब्रह्माजीके द्वारा अपने अनुभवके अनुसार प्रतिपादन ... १८६४६—मायिक रूपका निराकरण करके सन्मात्रत्वका प्रदर्शन, अविद्याके स्वरूपका निरूपण, संक्षेपमें ज्ञानभूमिका एवं जीवात्माके वास्तविक स्वरूपका वर्णन ... २१५
३४—स्थूल-शरीरकी निन्दा, मनोमय शरीरकी विशेषता, उसे सत्कर्ममें लगानेकी प्रेरणा, ब्रह्मा और उनके द्वारा निर्मित जगत्‌की मनोमयता, जीवका स्वरूप और उसकी विविध सांसारिक गति तथा सृष्टिके दोष एवं मिथ्यात्वका उपदेश ... १८८स्थिति-प्रकरण<br><br>१—चित्तरूपसे जगत्‌का वर्णन, जगत्‌की स्थितिका खण्डन करके पूर्णानन्दस्वरूप सन्मात्रकी स्थितिका कथन, मनको ही जगत्‌का कारण बताकर उसके नाश होनेपर जगत्‌की शून्यताका कथन २१८
३५—जीवोंकी चौदह श्रेणियों तथा परब्रह्म परमात्मासे ही उत्पन्न होनेके कारण सबकी ब्रह्मरूपता ... १९०२—स्वरूपकी विस्मृतिसे ही भेद्भ्रमकी अनुभूति, चित्तशुद्धि एवं जाग्रत् आदि अवस्थाओंके शोधनसे ही भ्रम-निवारणपूर्वक आत्मबोधकी प्राप्ति तथा वैराग्यमूलक विवेकसे ही मोक्षलाभका वर्णन ... २२०
३६—कर्ता और कर्मकी सहोत्पत्ति एवं अभिन्नता तथा चित्त और कर्मकी एकताका प्रतिपादन ... १९२३—उपासनाओंके अनुसार फलकी प्राप्ति तथा जाग्रत्-स्वप्न अवस्थाओंका वर्णन, मनको सत्य आत्मामें लगानेका आदेश, मनको भावनाके अनुसार रूप और फलकी प्राप्ति तथा भावनाके त्यागसे विचारद्वारा ब्रह्मभावकी प्राप्तिका प्रतिपादन ... २२२
३७—मनका स्वरूप तथा उसकी विभिन्न संज्ञाओंपर विचार ... १९३
३८—मनके द्वारा जगत्‌के विस्तार तथा अज्ञानीके उपदेशके लिये कल्पित त्रिविध आकाशका निरूपण एवं मनको परमात्मचिन्तनमें लगानेकी आवश्यकता ... १९५