संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
by महर्षि वाल्मीकि
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Read in contextवैराग्य-प्रकरण ] * धन-सम्पत्ति तथा आयुकी निस्सारता एवं दुःखरूपताका वर्णन * ३७
वायुके वेगसे बर्फकी भाँति धन-सम्पत्तिके द्वारा कठोर एवं दुःसह नहीं बना दिये जाते। जैसे मुट्ठीभर धूल मणियोंको मलिन कर देती है, उसी प्रकार धन-सम्पत्तिने बड़े-बड़े विद्वान्, शूरवीर, कृतज्ञ, सुन्दर और कोमल-स्वभाववाले पुरुषोंको भी मलिन ( कलङ्कित ) कर दिया है। भगवन् ! धन-सम्पत्ति सुख देनेके लिये नहीं, दुःख देनेके लिये ही बढ़ती है; जैसे विषकी बेल सुरक्षित रक्खी जाय तो वह मौत ही देती है, उसी प्रकार धन-सम्पत्तिकी रक्षा करनेपर भी वह विनाशका ही कारण होती है।
जो धन-सम्पत्तिसे युक्त होकर भी जनताकी निन्दाका पात्र न हो, शूरवीर होकर भी अपने ही मुँहसे अपनी बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा न करता हो तथा स्वामी होकर भी समस्त सेवकों अथवा प्रजा-जनोंपर समान दृष्टि रखना हो—ये तीन तरहके पुरुष संसारमें दुर्लभ हैं। यह धन-सम्पत्ति दुःखरूपी सर्पोंके रहनेके लिये विषम ( भयंकर ) और गहन ( दुर्गम ) गुफा है तथा महान् मोहरूपी गजराजोंके निवासके लिये विन्ध्याचलकी विशाल तटभूमि है। अर्थात् यह महान् दुःख देनेवाली और महान् मोहसे आवृत करनेवाली है। सत्कर्मरूपी कमलोंको संकुचित करनेके लिये यह रात्रिके समान है। दुःखरूपी कुमुदोंके विकासके लिये चाँदनीका काम करनेवाली है तथा उत्तम दृष्टि ( श्रेष्ठ बुद्धि ) रूपी दीपकको बुझानेके लिये वायुके तुल्य है। धन-सम्पत्ति भय और भ्रान्तिरूपी बादलोंकी उत्पत्ति तथा वृद्धि करनेवाली है, विषादरूपी विषको बढ़ानेवाली है, विकल्प ( संशय ) रूपी खेतीकी उपजके लिये क्यारीके समान है तथा खेद या कष्ट प्रदान करनेके लिये भयंकर सर्पिणीके तुल्य है। वैराग्यरूपी लताओंको नष्ट करनेके लिये ओलेके समान है। काम आदि मनोविकाररूपी उल्लुओंको सबल बनानेके लिये अँधेरी रात्रिके तुल्य है। विवेकरूपी चन्द्रमाको ग्रस लेनेके लिये राहुकी दाढ़^१ है और सौजन्यरूपी कमलको संकुचित कर देनेके लिये चन्द्रमाकी चाँदनी है। इतना ही नहीं, यह इन्द्र-धनुषके समान क्षणस्थायी विविध रंगों ( रागों ) के कारण मनोहर जान पड़ती है तथा बिजलीके समान चपल तथा उत्पन्न होते ही नष्ट हो जानेवाली है। प्रायः जड़ ही इसके आश्रय हैं। यह एक रूपसे कहीं क्षणभर भी नहीं ठहरती। पानीकी लहर और दीपककी लौके समान चञ्चल है तथा जिन्हें जानना अत्यन्त कठिन है, ऐसी असङ्ख्य दुर्दशाओंकी प्राप्ति करानेवाली है। यह धन-सम्पत्ति मनोरम होनेके कारण चित्त-वृत्तिको अपनी ओर खींच लेती है। प्रायः अनर्थकारी कर्मोंसे इसकी प्राप्ति होती है और प्राप्त होकर भी यह क्षणभरमें नष्ट हो जानेवाली है।
मुने ! जीवकी आयु पत्तेके सिरेपर लटकते हुए जल-बिन्दुके समान अस्थिर है। वह उन्मत्तके समान असमयमें ही इस कुत्सित शरीरको छोड़कर चल देती है। जिनका चित्त विषयरूपी विषधर सर्पोंके संसर्गसे सर्वथा जर्जर हो गया है और जिनमें प्रौढ़ आत्म-विवेकका अभाव है, उन लोगोंकी आयु उन्हें क्लेश देनेवाली ही है। जो जानने योग्य वस्तु ( परब्रह्म परमात्मा ) को जान चुके हैं और उस अपरिच्छिन्न ब्रह्मपदमें प्रतिष्ठित हैं, ऐसे महापुरुषोंकी आयु लाभ-हानि एवं सुख-दुःखमें चित्तको समानभावसे सुस्थिर रखनेवाली होनेके कारण सुखदायिनी है। महर्षे ! हमलोग नपे-तुले आकारवाले शरीरमें ही 'यह आत्मा है' ऐसा निश्चय किये बैठे हैं। अतः संसाररूपी मेघमें बिजलीके समान चमककर विलुप्त हो जानेवाली इस क्षणभङ्गुर आयुमें हम सुखी नहीं हैं। शरद्ऋतुके छिटफुट बादल, तैलरहित दीपक तथा जलकी तरङ्गके समान चञ्चल आयु गयी हुई ही देखी जाती है। तरङ्गको, जल आदिमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाको, विद्युत्-पुञ्जको और आकाशकमलको हाथसे पकड़नेका तो मैं विश्वास रख सकता हूँ; परंतु इस अस्थिर आयुपर मेरा कोई भरोसा
१. यहाँ जड़के दो अर्थ हैं—जल और मूर्ख। बिजलीका आश्रय जल होता है और धन-सम्पत्तिका आश्रय मूर्ख।