संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
by महर्षि वाल्मीकि
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Read in context४२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
विनिपात और उत्पात ( अधःपतन और उपद्रव ) ही फल हैं ।
मुने ! चिन्ता ( तृष्णा ) चञ्चल मोरनीके समान है। मोरनी वर्षाकी बूँदें पड़नेपर बारंबार नृत्य करती है, शरद्-ऋतुका प्रकाश आ जानेपर शान्त हो जाती है और दुर्गम-स्थानोंमें भी पैर रखती है, इसी तरह तृष्णा भी कुहरेके समान मोहके आवरणमें स्फुरित होती है—नाच उठती है, विवेकका प्रकाश छा जानेपर शान्त हो जाती है और असाध्य वस्तुओंमें भी पाँव रख देती है। केवल वर्षा कालमें इतराकर बहनेवाली छोटी नदी और तृष्णामें बहुत कुछ समानता है। वह नदी वर्षाके अतिरिक्त समयमें चिरकालतक जलशून्य पड़ी रहती है। वर्षा-ऋतुमें भी बीच-बीचमें जब वृष्टि रुक जाती है, वह जलसे खाली हो जाती है; परंतु पानी बरसनेपर उसमें क्षणभरमें बाढ़ आ जाती है और जलकी बहुत-सी उत्ताल तरङ्गों उठने लगती हैं। इसी प्रकार तृष्णा भी चिरकालतक फलशून्य ही रहती है, कभी-कभी सफल होनेपर भी बीच-बीचमें फलशून्य हो जाती है। जड पदार्थोंमें ही इसे अधिक आनन्द मिलता है और क्षणभरमें ही यह उल्लसित हो उठती है। चारेके लोभसे चञ्चल हुई चिड़िया जैसे फलशून्य खड़े हुए वृक्षको छोड़कर दूसरे-दूसरे फलयुक्त वृक्षपर चली जाती है, उसी प्रकार तृष्णा भी विवेकी एवं विरक्त पुरुषको छोड़कर विषयासक्त पुरुषके पास चली जाती है।
तृष्णा और चञ्चल बँदरिया दोनोंका स्वभाव एक-जैसा है। वे अलङ्घ्यस्थानमें भी पैर रख देती हैं, तृप्त हो जानेपर भी नये-नये फलकी इच्छा करती हैं और विषयरूप एक स्थानपर अधिक कालतक नहीं ठहरतीं। तृष्णा हृदयरूपी कमलमें निवास करनेवाली भ्रमरी है। यह क्षणभरमें पातालको चली जाती है, फिर दूसरे ही क्षण आकाशकी सैर करने लगती है और क्षण-भरमें ही दिगन्तरूपी निकुञ्जमें मँडराती दिखायी देती है। संसारमें जितने दोष हैं, उन सबमें एकमात्र तृष्णा ही ऐसी है, जो दीर्घकालतक दुःख देती रहती है। वह अन्तःपुरमें रहनेवाले मनुष्यको भी भीषण संकटमें डाल देती है। तृष्णारूपिणी मेघमाला मोहरूपी नीहार-पुञ्जसे घनीभूत होकर परम ज्ञानरूपी सूर्यके प्रकाशको ढँक देती है और जगत्को केवल जडता ( जल अथवा अज्ञान ) ही प्रदान करती है। तृष्णा सांसारिक व्यवहारमें फँसे हुए समस्त प्राणियोंको बाँधनेके लिये एक मजबूत रस्सीके समान है। उसने सबके मनको बाँध रक्खा है। इन्द्र-धनुष जिन लक्षणों अथवा धर्मोंसे युक्त दिखायी देता है; वे ही तृष्णाके भी लक्षण अथवा धर्म हैं। वह इन्द्र-धनुषकी ही भाँति बहुरंगी, गुणहीन, विशाल, मलिन ( मेघ अथवा अशुद्ध अन्तःकरणवाले प्राणीके ) आधारपर स्थित, शून्यरूप और शून्यमें ही पैर रखनेवाली है। तृष्णा गुणरूपी हरी-भरी खेतीको नष्ट करनेके लिये वज्रपातके समान है। आपत्तियोंको बढ़ानेके लिये उस शरद्-ऋतुके तुल्य है, जिसके आनेपर धान आदिकी खेती पकी हुई बालोंसे सम्पन्न हो जाती है। तत्त्व-ज्ञानरूपी कमलोंका विध्वंस करनेके लिये ओलेके सदृश और अज्ञानरूपी अन्धकारकी वृद्धिके लिये वह हेमन्तकी लंबी रातके समान है।
तृष्णा इस संसाररूपी नाटककी नटी है, प्रवृत्तिरूप नीडमें निवास करनेवाली पक्षिणी है, मनोरथ-रूपी महान् वनमें विचरनेवाली हरिणी है और कामरूपी संगीतको उद्बुद्ध करनेवाली वीणा है। वह व्यवहाररूपी समुद्रकी लहर है। मोहरूपी मतवाले गजराजको बाँधे रखनेके लिये साँकल है, सृष्टिरूपी वटवृक्षकी सुन्दर वरोह है और दुःखरूपी कुमुदोंको विकसित करनेवाली चाँदनी है। इतना ही नहीं, तृष्णा जरा-मृत्युरूप दुःखमय रत्नोंका संग्रह करनेके लिये एकमात्र रत्न-पेटिका है तथा आधि-व्याधिरूप विलासोंका नित्य विस्तार करनेवाली मदमत्त विलासिनी है। तृष्णाको व्योमवीथी ( आकाश )
१. इन्द्र-धनुषके पक्षमें गुणका अर्थ प्रत्यञ्चा है।