संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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सन्तति-शास्त्र ।1
२. ऐसे आहार-विहारसे कि जिससे पित्त और वायु विगड़ जाय।
ऐसी दशामे अनेक लक्षण होते हैं।
१. मूत्रमें जलन और बद्व।
२. मसानेमें दर्द और खाजका आना।
३. पीप या पीपदार पानी आना।
४. मूत्रके साथ गरम रक्त निकलना।
५. पेशाबकी रंगतका कुछ लाल होना।
इस रोगमें खीको बड़ा दुःख होता है। खाज जब अधिक होती है, तब रोगको बढ़ता हुआ समझना चाहिये।
३. मसानेका दर्द—इसके कई कारण हैं।
१ मसानेमें अनेक प्रकारके रोग, सूजन, खुजली, घाव, पथरी, फूसियाँ और मूत्र-विकारसे।
इसमें निम्न लक्षण होते हैं।
१. प्यास लगना और मसानेमें जलन होना।
२ पेशाबकी रंगत पीली होना और रुक रुक कर आना। कभी कभीतो पेशा दर्द होता है कि खीको चैन नहीं पड़ता।
४. मसानेमें रक्तका जम जाना—इसके कई कारण हैं।
१. पेशाबकी नलीमें चोट लगनेसे।
२ पेशाबमें खून आनेसे।
३ मसानेपर चोट लगनेसे।
इसमें अनेक लक्षण होते हैं।
१. पीड़ा, बेहोशी, बेचैनी, नाडीका मन्द पड जाना, धुमनी,
जी मचलाना, उठने बैठनेमें दर्द और कुपचका होना।
यह बहुत बुरा रोग है। इससे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।