संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
Page 14 of 302
Read in context( ५ )
से अनेक तुच्छ भाव प्रगट होते हैं। किसी कविने सच कहा है कि बालक और-बालिकाओं ही से देश, जाति, समाज और घर का भविष्य मालूम होता है। जिनमें रजवीर्यका महत्त्व और उसके शुद्धाशुद्धकी पहचान, रजोधर्म और संयोग शक्तिका अनुमान; रजस्वला रजस्वाता और सहावासमें स्त्री पुरुषोंकी अनेक असावधानियाँ तथा सारभूत कर्तव्योंका ज्ञान, गर्भ न रहनेके अनेक कारणों तथा गर्भाधान रीति, कन्या और पुत्र या मनचाही सन्तान उत्पन्न करनेकी क्रियाश्रोका ज्ञान, सन्तान पर माता पिताकी मनःशक्ति, प्रेम अहार, आचरण, चेष्टा, व्यवहार, हर्ष, शोक, चिन्ता, दूषित रज-वीर्य और इच्छाके प्रभावोंका परिज्ञान, गर्भावस्था और प्रसव-कालकी अनेक क्रियाओं और असावधानियों, गर्भवतीके सारभूत कर्तव्यों, गर्भस्वाव और गर्भपातके कारणों, गर्भमें शरीर रचना तथा माता पिताके रजवीर्यसे अंग प्रत्यंगकी उत्पत्ति और उत्तम दीर्घजीवी संतान उत्पन्न करनेका ज्ञान, जिन स्त्री पुरुषों में नहीं हैं उनसे भविष्यमें उन्नतिकी इच्छा करना दुर्दाशा मात्र है।
जिस समय स्त्री और पुरुषोंकी मार्मिक शिक्षाका सूर्य भारतमें अपने पूर्ण प्रकाशसे जगमग रहा था, उस समय कन्याएँ अपने गार्हस्थ्य जीवनकी पंडिता और पुत्र इसके मर्मज्ञ होते थे। इनके हृदयमें गार्हस्थ्य जीवनेके लिये रजोधर्म और संयोग-शक्तिका भाव पूर्ण रीतिसे भरा रहता था। वह आज-कलकी भांति रजवती होते ही स्त्रियोंको गर्भधारण करने योग्य