संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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चार्य और याज्ञवल्क्य जहाँके भाष्यकार, परशुराम, लक्ष्मण, उन्मजेय, श्रंगद श्रुर्जुन और भीम इत्यादि जहाँके रणवीर थे उसी समय भारत में गार्हस्थ्य धर्मकी महिमाने सर्वसाधारण चित्तोंको प्रफुल्लित कर अपनेको सर्वमान्य बना लिया था । घर घरमें स्त्री शिक्षाके फोहरासंस्नान की हुई कन्याएँ अपने भविष्य जीवनके हरियाले मैदान में गार्हस्थ्य जीवनकी मय्योदा-कों रखती हुई उत्तम और सुयोग्य सन्तान उत्पन्न कर देश और समाजका गौरव बढ़ाती थीं । आज भी उन्हींकी सन्तान-के नामपर भारत विक रहा है ।
इतना उन्नतिशील होकर भी क्या हुआ ? श्रवणतियों भी इस बूढ़े भारतसे पीछा छुड़ाना कठिन पड़ रहा है । ठीक है, हम इस बातको प्रत्यक्षमें देखते हैं कि जिस कूर्पका चोन बन्द हो जाता है, उसमें पानी नहीं रहता । ठीक यही उशा इस बूढ़े भारतकी हुई है । घर घरमें बहता हुआ स्त्री-शिक्षाका प्रबल गीत कि जिसपर हमारा सर्वस्व निर्भर था, आज बन्द टिख-लाई देता है । इसीके न होनेसे चारों ओर श्रध्दकारसा प्रतीत होता है । आकाश-मार्गोंको अविधारूपी वादलोंसे घेर लिया है । पाप-कर्मोंकी भयंकर वर्णने भारतके एक एक कोनेको भर दिया है । विरोध-द्वेष, वैर-भाव और नास्तिकता इत्यादि की फसलें स्त्री, पुरुष, बालक और बालिकाओंके हृदयरूपी खेतोंमें नैयार हो रही हैं । बालक बालिकाओंके श्रंगोंसे विला-सप्रियताके चिन्ह विवाहके पूर्व ही दिखताई पड़ते हैं। विचारों