संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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Read in contextबिना रजस्वला हुए भी गर्भ स्थित हो जाता है। १३३
देना चाहिये। परन्तु यह विचार रहे कि जो समय प्रायः आठ बजेसे ग्यारह बजे तक का मिलता है इसमें भोजन करनेके नीन घण्टे वाद संयोग किया जाय। जो जो बातें निषिद्ध मानी गई हैं, उनको छोड़कर रात्रिमें ६ बजेसे ११ बजे तकका समय संयोगके लिये उत्तम है।
(२६) बिना रजस्वला हुए भी गर्भ स्थित हो जाता है।
लोग यह कहा करते हैं कि बिना रजस्वला हुए भी गर्भ रहता है, यह बात असम्भव नहीं है। ईश्वर सब कुछ कर सकता है। उसकी माया बड़ी विचित्र है कि जिसको समझने वाला अकेला वही है। इस विषयमें आचार्योंका मत यों है।
१. वैयकका मत।
१. रजस्वला न होनेपर भी ऋतुकाल अर्थात् गर्भ स्थितिका समय कभी कभी हो जाता है। (सु० श० अ० २ श्ल० ५)
१. ऐसा ऋतुकाल स्त्रियोंको ऐसे समयमें होता है जब कि बालक दूध पीता हो और छोड़ दे या दूध पीते हुए बालककी मृत्यु हो जाय या बालक गोदमें हो और बहुत दिनोंसे पतिकी इच्छा हो। यदि ऐसे समयपर संयोग हो जाय तो गर्भ रह जाता है। इसको इनामका गर्भ कहते हैं। (श० क०)
३. इस प्रकारसे जो स्त्री ऋतुमती होती है उसका मुख पुष्ट और प्रसन्न होता है। शरीर, मुख, और मस्तिष्क गल-गलाये हुए से होते हैं। स्त्रीको पुरुषकी इच्छा होती है, मीठी, प्यारी बातें करती है; कुक्षि, नेत्र और बाल ढीले हो जाते हैं; हाथ, छाती, कमर, नाभि, जानु और जाँघें