BharatKosha
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages

Page 155 of 302

Read in context
Page 155

१३४

सन्तति-शास्त्र ।

फड़कने लगती हैं। हर्ष और आनन्दमें स्त्री मग्न हो जाती है। जब ऐसे लक्षण हों, तो बिना रजस्वला हुए भी स्त्रीको अतुमती समझना चाहिये।

(सु० शा० अ० ६ श्लो० ६ व०)

२. जब कि रजस्वला होनेको दो चार दिन बाकी हों और पुरुषकी प्रबल इच्छा हो तो ऐसे समयमें भी पुरुष-संयोगसे गर्भ रह जाता है। (रति शास्त्र)

इस प्रकार बिना रजवती हुए भी स्त्रियाँ गर्भवती हो जाती हैं।

(२७) कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके आधीन है।

हम लोगोंमें बहुतसे लोग ऐसे हैं कि कर्तव्यको न समझ कर अपनी सारी बातें भाग्यपर ही छोड़ देते हैं। हम कोई बात ऐसी नहीं देखते जो कर्तव्यके आधीन न हो। कुछ पढ़े लिये लोग प्रकृति (कुदरत) को प्रधान मानकर उसीके भरोसे रहते हैं। ऐसे लोगोंका कहना है कि प्रकृति आप ही आप कार्य कर लेती है; परन्तु इसके साथ ही साथ यह भी जानना पड़ेगा कि प्रकृतिके गुप्त भेदोंका पता लगा कर उसको सहायता देना हमारा परम कर्तव्य है। यह बात तो सब जानते हैं कि संयोग करनेपर पुत्र या कन्या होती है। इसी अन्य-विश्वासपर रहते हुए प्रकृतिके गुप्त भेदोंका पता नहीं लगता। इन बातोंके न जाननेसे देशकी जो हानि हो रही है, वह विचार-सूत्रसे कहीं बाहर है। यही कारण है कि कहीं लड़के ही लड़के और कहीं लड़कियाँ ही लड़कियाँ दिखाई पड़ती हैं। लोग इसको ईश्वरकी देन समझते हैं। हाँ, यह देन अवश्य है; परन्तु ईश्वर देता कैसे है? घर आकर तो दे नहीं जाता? उसका