संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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Read in contextकन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है। १३५
देना भी तो हमारी क्रियाओंके अधीन है। अतएव हमारा काम है कि हम विद्वानोंकी बतलाई उन क्रियाओंको देखे कि जिनका उपदेश धर्मशास्त्र, वैद्यक और अनेक रीतियोंसे किया गया है, और जिसको हमने केवल भाग्य के भरोसे भुला दिया है। किसी समयमें हम इस विषयके मर्मज्ञ और हमारी स्त्रियाँ इन गुप्त भेदोंकी पण्डिता थीं, परन्तु आज इन बातोंका पता नहीं है। केवल भाग्यकी ही महिमा दिखलाई पड़ती है। इस विषयमें प्रकृतिके अनेक भेद हैं और उनमें नये और पुराने अनेक मत हैं, जिनके अनुसार कन्या और पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है।
१. वेदका मत।
१. वीर्य बलवान होनेसे पुत्र और रज बलवान होनेसे कन्या उत्पन्न होती है। (गर्भोपनिषद्)
२. धर्मशास्त्रका मत।
१. रजस्वला होनेके दिनसे ६-८-१०-१२-१४ और १६वीं रातमें गर्भाधान करतेसे पुत्र और ५-७-६-१-१३ और १५ वीं रातके गर्भाधानसे कन्या उत्पन्न होती है।
(मनु० अ० ३ श्लोक० ४८)
२. पिताका वीर्य अधिक होनेसे पुत्र और माताका रज अधिक होनेसे कन्या होती है। यदि रज और वीर्य बराबर हों, तो नपुंसक या दो सन्तान होती हैं। यदि वीर्य क्षीण या कम हो तो गर्भ ही नहीं रहता।
(मनु० अ० ३ श्लोक० ४९)
३. गर्भाधानके समय रज बलवान होनेसे कन्या और वीर्य बली होनेसे पुत्र उत्पन्न होता है। (वा० प्र० अ० १३)