BharatKosha
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages

Page 17 of 302

Read in context
Page 17

( ८ )

है। श्रविषासे प्रस्न माताएँ उन विदुषी माताओंकी समता नहीं कर सकतीं, क्योंकि कहाँ देश और समाजकी उन्नतिका विचार, कहाँ विलास-प्रियताका संचार। आज इन स्त्रियोंकी अधोगति क्यों है? इसके उत्तरमें यही कहना मुनासिब है कि स्त्री-शिक्षाके न होनेसे इनके हृदयोंमें सन्तान-सुधार और उत्तम सन्तान उत्पन्न करनेके किराकूपी जितने रत्न थे वे सब खो गए हैं। इधर पुरुषोंकी भी पेसी ही दशा हुई है। अब मूल ही नहीं तो शाखा कैसे हो सकती है? जहाँ स्त्रियाँ पेसी हों गई हैं वहाँके पुरुषोंका कहना ही क्या है! इस स्त्री-शिक्षाके अभावका परिणाम यह हुआ है कि स्त्री पुरुष दोनों सन्तान सम्बन्धी विषयों से अनभिज्ञ हो गए, केवल स्वयं मनुष्य होने और मनुष्य जाति उत्पन्न करनेकी डाँग वाकी रह गयी है। तो क्या उन्नतिके साथ श्रवणति लगी हुई है? दृष्टिद्रष्टो धन-वानको दृष्टि होना आवश्यक है। इसी प्रकार सूर्य भगवान को भी पूर्व दिशामें नीचेसे उठ कर दीपहरके समय ऊँचे चढ़ कर सार्यकाल में नीचे उतर कर अस्त हो जाना पड़ता है। अपने हृदयको इसी प्रकार संतोष देते हुए यदि एक दृष्टि धनवान होनेकी आशा करे और यलमें लगे तो क्या कुछ अनुचित है? कभी नहीं। दैवके मरोसे भाग्य-भगवानके जगमोहन में पड़े रहना कितना अनुचित है? इसमें सन्देह नहीं कि विपत्तिके समय बुद्धि अवश्य विपरीति हो जाती है। महाराज रामचन्द्र भी झनसे नहीं चले। जानकी-हरणके पहले श्रीराव-

संतति शास्त्र · Page 17 of 302 · BharatKosha