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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages

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( ६ )

वेन्द्रजीको सोनेका भुग सच्चा मान लेना पड़ा । इसका अर्थ यह नहीं कि दरिद्र मनुष्य अपने अभ्युदय-का यत्नही न करे । अवश्य करना चाहिये, क्योंकि संसार में उसीका जन्म पाना सफल है कि जिसने अपने देश और समाजकी उन्नति की हो । यों तो सब ही जन्म लेते और मरते हैं । जिस जातिके लोगोंमें जातिबल, जातीय-जीवन और जातीय प्रेम नहीं है वह जाति संसारमें चिरकालतक नहीं जी सकती; क्योंकि जातिका जीवन मरण लोगोंके हाथमें है और जातिके लोगोंका अभ्युदय जातीय जीवनके साथमें होता है । अतएव दरिद्र मनुष्यको भी अपने जीते जी देश और समाजकी उन्नतिको न भूलना चाहिये ।

अबसे पहले डेढ़ सौ वर्षका समय कि जबसे हमारी विद्या और शिक्षाका पुनरुत्थान हुआ है, उससे आठ सौ वर्ष पूर्वके समयको हम अच्छा नहीं कहेंगे । उस समय में जो जो अत्याचार हमारी कन्याओं और स्त्रियोंपर हुए हैं कि जिनसे विवश होकर हमको स्त्रियोंकी शिक्षाका कष्ट विरोधी बनना पड़ा, परदा और बाल-विवाहकी प्रथा जारी करनी पड़ी, उसी समयमें स्त्री शिक्षा पर उठे हुए कुठारने ऐसा नाश किया कि जिसके कारण हमारे बच्चों, हमारी कन्याओं और बहूओंमें गार्हस्थ्य जीवनके महत्वको समझनेकी शक्ति ही नहीं रह गयी । अब सौ सौ हाथ मारते और पूर्ण बल लगानेपर भी हम इतने योग्य नहीं हैं कि जितने पतनके समयमें थे । हमारे ऋषि महर्षिके ही हवन कुंडकी विभूति ले कर चाहे संसार