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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

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सन्तति-शास्त्र ।

बीता चाँड़ा उदर पड़ा, जो मुलायम कपड़ेका हो, बांधन चाहिये।

खियाँ गर्भावस्थामें अपने विचारोंको ठीक नहीं रखतीं। अनेक बुरे विचारोंसे पाला पड़ता है। याद रहे कि जैसे विचार गर्भावस्थामें माताके होते हैं उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है।

रहन-सहनके लिये तो पूछना ही क्या। ऐसे समयमें निश्चय करके असावधानी की जाती है। नीचे ऊपर चढ़ना उतरना, दौड़ना कूदना, परिश्रम और नाचना। यह सब वर्जित है। इससे गर्भपात होनेका भय रहता है। शोक, चिन्ता, भय और क्रोध इतसे बच्चेके मस्तक और स्नायुओंपर धक्का पहुँचता है और दिमाग नियल पड़ जाता है। यह भी न होना चाहिये कि गर्भवती दिन रात पड़ी हो रहे, इससे अनेक प्रकारके शब्दों बुरे विचार उत्पन्न होते हैं। ग्लानि रहती है और पाचन शक्ति बिगड़ जाती है। इसलिये कुछ थोड़ा चलना फिरना आनन्दक है। गर्भवतीका रात्रिमें दस घंटोंसे कम न सोना चाहिये। प्रायः खियाँ चित्त होकर कम सोती हैं। ढेरतक करवट लेकर सोना हानि पहुँचाता है। इससे बच्चा एक और झुक जाता है। थोड़ी देर करवटसे सोना हानि नहीं करता। बाकी समयमें आरामके साथ चित्त होकर सोना चाहिये। सोनेका कमरा साफ़ और ओढने-बिछौने मुलायम होने चाहिये। गर्भवतीको रोगोंकी सेवामें न रहना चाहिये, क्योंकि रोगी निरोग मनुष्य की प्राणशक्ति खोचता है और अपनी रोगशक्तिको दूसरेके शरीरमें प्रवेग करता है। इसलिये गर्भवती और बच्चा दोनोंके रोगी हो जानेका भय रहता है। शरीरमें मस्तक एक काम करनेवाली चीज़ है, परन्तु खियाँ इसकी कुछ भी परवाह नहीं करतीं। मस्तक और दूसरी इन्द्रियोंका बहुत बड़ा सम्बन्ध है।