संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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Read in contextगर्भचतुर्तिके रोग ।
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हो जाती है । बढ़ती हुई दशा में कै बराबर हुआ करती है । कभी कभी बेहोशी भी आ जाया करती है । उस समय रोग कठिन पड़ जाता है जब कि कै बार बार होती है और खून आने लगता है । ऐसी दशा कुछ काल तक रहनेसे मृत्यु अवश्य हो जाती है ।
३. फेफड़ेके रोगोंका होना । ऐसे समयमें यह रोग खास तौर से होता है । कारण इसका यह है कि ज्यों ज्यों गर्भ बढ़ता है त्यों त्यों फेफड़ेपर दबाव पहुँचता है । इससे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं ।
१. स्वाँसका कष्टसे निकलना । इस रोगमें स्वाँस उखड़ जाती है और दम घुटने लगता है ।
२. मामूली खाँसी । प्रायः सूखी खाँसी आती है ।
३. कूकरखाँसी । यह खाँसी खास तरहकी होती है । इसमें कुत्तोंकी तरह खाँसी आती है, इसीलिये इसको कूकर खाँसी कहते हैं । यह तुरन्त अच्छी नहीं होती, इसमें धीरे धीरे आराम होता है ।
४. अतिसार । यह रोग कुपचसे होता है । जब अन्न नहीं पचता तब अग्नि मन्द पड़ जाती है । इस कारण दस्त आने लगते हैं । कभी यह रोग इतना बढ़ता है, कि गर्भ गिर जाता है ।
५. हिचकी । यों तो दस पाँच बार हिचकी आ जाना दूसरी बात है, परन्तु यह हिचकी एक खास तरहकी होती है । ऐसी हिचकी सोनेके समयको छोड़कर दिनरात आया करती है । इसको वैद्य लोग हिका कहते हैं । इसका कारण कुपच है । इससे गर्भको बहुत बड़ा थक्का पहुँ-