संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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सन्तति शास्त्र ।
महीनीसे वृक्षमें डोलनेकी शक्ति आनेतक कै होनेका समय विद्वानोंने माना है। यदि इससे अधिक दिनतक कै होती रहे, तो उसे कुपक्ष और निर्बलता का कारण समझना चाहिये। पैंसी दशामें अनेक उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं।
| (१) पेटमें पेटन। | (२) हाथ-पाँवमें जलन और भड़कन। |
|---|---|
| (३) सीढ़में दर्द। | (४) जाँघोंमें दर्द। |
| (५) सूच्छों आ जाना। | (६) स्तनमें दर्द। |
| (७) नींद न आना। | (८) बेचैनी। |
| (९) कज्ज रहना। | (१०) पक्वाशय (मेढे) में दर्द। |
| (११) आमाशयमें दर्द। | (१२) हृदयका कड़कना। |
| (१३) ऊपरके श्वासका चलन। | (१४) पैरोंमें भक्तभक्ताहट और सूजन। |
| (१५) प्यास लगना। | (१६) गलेका सूख जाना। |
| (१७) गलेमें छोटे छोटे दाने | (१८) जीभमें दाने पड़ जाना। |
| पड़ जाना। | |
| (१९) कैंमें रुधिरका आना। | (२०) ज्वरका होना। |
पैंसी दशामें पित्त बढ़ जाता है। कैंमें पित्तका लसदार बह्वा पानी ही विशेष आता है। थोड़े दिनोंतक कै होकर बन्द हो जाना अच्छा है। वह जानेपर दशा बिगड़ जाती है। परिणाम यह होता है कि या तो गर्भ गिर जाता है या स्त्री ही मर जाती है। गर्भ गिर जानेपर ये उपद्रव शान्त हो जाते हैं। प्रायः देखा गया है कि किसी किसी स्त्रीके वृक्षा पैदा होनेतक कै होती रहती है। कभी प्रातःकाल मचली प्रारम्भ होकर दोपहरको बन्द हो जाती है। कभी दोपहरसे प्रारम्भ होकर गणितक रहती है। इसी बीचमें एक दो बार या कई बार कै