संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
Page 220 of 302
Read in contextगर्भवतीके रोग ।
१६६
थोड़ा सा भी बहुत होता है। अतएव ऐसे समयमें तुरन्त उपचार करना आवश्यक है। ऐसी अवस्थामें अनेक प्रकारके रोग होते हैं।
१. जो मचलाणा। यह स्वभावसे होता है। यह कोई ऐसा विशेष रोग नहीं है। आप ही आप अच्छा भी हो जाता है। इस का एक कारण पित्त भी है। जब पित्तके विकारसे जी मचलाता है तो इसे एक रोग समझना चाहिये। इसके अनेक कारण हैं।
१. पित्त बढ़ानेवाले पदार्थोंका खाना।
२. पित्तकी अधिकता होना। (जन्मसे ही)
३. जब कि गर्भ माता या पिताके ऐसे दूषित रज-वीर्यसे स्थापित हो कि जो पित्तसे दूषित हुआ हो।
ऐसी दशामें अधिक दिनोंतक जी मचलाता है और कभी कभी चकरसा भी आ जाता है। यों तो कुछ दिनोंतक हर एक स्त्रीका जी मचलाता ही है।
२ वमन (कै) का होना। यों तो कै उस समय समयतक होती है जबतक कि बच्चा पेटमें डोलता नहीं है, परन्तु ऐसे समयमें कै नित्य नहीं होती, कभी कभी हो जाती है। उसकाई अवश्य प्रायः नित्य आ जाया करती है। इसके अनेक कारण हैं।
१. गर्भवतीकी इन्द्रियाँ और अवयवोंके गर्भावस्थामें अधिक काम करनेसे।
२. बालकके बोभका दबाव अवयवों, धमनी और स्नायु-तन्तुओंपर पड़नेसे।
ऐसी दशामें मामूली कै होती है, परन्तु जब कै इससे आगे बढ़ती है तब उसको रोग समझना चाहिये। दूसरे