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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages

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नन्दिनि-शाल ।

सी सूरतोंमें जब कि यह कहा जाता है कि इनमें कुछ भी भेद नहीं है तथापि कुछ न कुछ अन्तर अवश्य होता है। इनके अनेक कारण हैं।

१. वैचक्यका भत।

२. रजोदर्शनके समयमें मानाके हृदयपर जिस सूत्र गललके स्त्री पुरुषका ध्यान आ जाता है या आनन्दके समयमें जैसे पुरुषका दर्शन हो और उसका ध्यान बना रहे उसी रूपको सन्तान होगी है। (रतिशास्त्र)

इसी कारण रजोदर्शन समयमें एकान्तवासका विधान कहा गया है।

२. गर्भाधान समयमें जिस जीवमें स्त्रीका चित्त होगा अर्थात् जिस जीवका ध्यान आ जावेगा उसीके अनुसार सन्तान होगी। (च० श० अ० २ श्ल० २८)

इसी प्रकार भोज वैद्य और अन्य विद्वानोंने भी कहा है। इसके अनेक उदाहरण इसी पुस्तकमें 'मनोवेल' के विषयमें लिखे गये हैं।

३. माता-पिताके मिले हुए रज-चीर्थमें गरीरके जिस अंग प्रत्यंगके बनानेवाला अंग निर्बल होता है तो गरीरका वह अंग उत्तम नहीं होता अथवा जब अंग प्रत्यंग बनानेका अंग नहीं होता तो अंग ही नहीं बनता।

(श० ६०)

४. गर्भावस्थामें माताका भोजन ठीक न होनेसे भी सन्तान की मित्र मिश्र आकृति होती है। इसके कई भेद हैं।

१. जिस अंगके जिस प्रकारका भोजन उपयोगी होता है उसके कम होने अथवा न होनेपर अधूरा अंग रह जाता है। (श० ६०)

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