संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
Page 248 of 302
Read in contextमनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ?
२२७
२. जिस पदार्थके खानेसे शरीरके जिस अंगको हानि पहुँचती है गर्भमें बच्चेका वही अंग विकृत हो जाता है। ( श० क० )
३. जिस पदार्थके खानेसे जिस अंगकी पुष्टि होती है गर्भमें बालकका वह अंग उत्तम रीतिसे विकसित होता है। ( श० क० )
यही कारण है कि बच्चे माता पिता, मामा और नौकरों इत्यादिकी आकृतिके होते हैं। इसमें माताका विचार रजस्वला समयका दर्शन तथा गर्भाधान समयका चिन्तवन कारण है। स्त्री के हृदयमें एक ऐसी दैवीशक्ति है कि जिससे चिन्तवन किये हुए मनुष्यकी आकृतिकी सन्तान उत्पन्न होती है। जिस प्रकार तसवीर खिचते समयमें हँसने रोनेवालेकी उसी विकारके अनुसार तसवीर खिंच जाती है, इसी प्रकार माताके हृदयपर पड़े हुए स्त्री पुरुषके आकारके अनुसार सन्तान होती है। इस विषयमें माता-पिताका मिला हुआ रज-वीर्य भी कम असर नहीं रखता। जिस अंगके बननेका सामान रजवीर्यमें कम होता है, वह अंग बेदंगा और निस्तेज होता है। जिस अंगके बननेका अंश प्रबल होता है वह अंग पूरी रीतिसे प्रफुल्लित रहता है। इसी प्रकार गर्भावस्थामें माताके खाए हुए भोजनका कुछ कम प्रभाव नहीं पड़ता। जिस पदार्थके खानेसे जिन्न अंगकी पुष्टि होती है उसके खानेसे वह अंग गर्भमें उत्तम बन जाता है और जिसके खानेसे जिस अंगको हानि होती है वह ठेढ़ा और बदस्वरत हो जाता है।
अतएव इस विषयमें रजोधर्म और गर्भाधान समयका चिन्तवन और ध्यान तथा गर्भावस्थामें माताका भोजन मुख्य