संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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Read in contextवच्चकेकी पैदाइशके समयका कर्तव्य ।
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है। इससे बड़ी हानि होती है। कभी कभी राख श्वाँस द्वारा पेट, नाक और मस्तकमें पहुँच जाती है। इसलिये गरम पानी-से नहलाना उत्तम है। जब वच्चा साफ हो जाय और यदि जाड़ेके दिन हो तो फलालैनमे और गरमीके दिनोंमें साफ कपडेंमें लपेट कर पलंगपर सुला देना चाहिये।
वच्चा उत्पन्न होनेके बाद स्त्रीको कठिन पीड़ा होती है। प्रायः देखा गया है कि अनजान दाई प्रसूता को खड़ी भी करती है, इस कारण कि स्त्रुत गिर जावे। ऐसा न करना चाहिये। दाइयाँ गर्भाशयके अन्दर भी हाथ डाल देती हैं। इससे मर्मस्थान बिगड़ जाता है। वच्चा पैदा होनेके साथ या उससे थोड़ी देर बाद आमर गिरती है। यदि न गिरे तो गिरानेकी कोशिश करनी चाहिये; परन्तु पकड़ कर न खींचा जावे, इससे रक्त ज्यादा गिरता है। पैदा होनेके समयसे लेकर जब तक आमर न गिरे पेट दबाये रहना चाहिये। इससे गर्भाशय सिकुड़ जाता है और आमर जल्दी निकल आती है। ऐसे समयमें वच्चका रोना जरूरी है। जब वच्चा कष्ट के साथ होता है तब वह घबड़ा जाता है। प्रायः थाली बजानेका रिवाज है इसका कारण यही है कि बाजेसे बच्चा रोचे। बच्चेका रोना इस बातको बतलाता है कि वह निरोग है। यदि बच्चा न रोवे तो उसे थपथपाना चाहिये। बच्चा पैदा हो जानेपर प्रसूताको कुछ बेहोशी सी आ जाती है और चेत होनेपर कठिन दर्द होता है। ऐसे दर्द से आमर निकल आती है। यदि न निकले तो पेड़ धीरे धीरे मसलना उत्तम है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि आमर का जरा सा भी टुकड़ा गर्भाशयमें न रहने पावे। वही स्त्रियाँ प्रसव के रोगोंमें अधिक फँसती हैं कि जिनके पेटमें आमरका टुकड़ा रह जाता है। ऐसी दशामें जब