संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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सन्तति-शास्त्र ।
नहाना अत्यंत बुरा है, परन्तु जाति और समाज में प्रायः कुछ दिन नहाने का रिवाज है। सरदीके दिनोंमें इसी नहानेकी बदौलत कितनी ही स्त्रियां कालके मुखमें पहुँचती हैं। अतएव इस दिनतक नहाने, चलने, उठने, बैठने इत्यादिसे बहुत बड़ी हानि पहुँचती है। अतएव देसी देशओंमें स्त्रियाँको सावधानी से काम लेना चाहिये।
(६०) जन्म लेनेपर बच्चेको दूध
कब पिलाना चाहिये ?
इस विषयमें अनेक रवाज और विचार हैं। सब अपने रवाज और विचारोंको उत्तम समझते हैं। कोई तुरन्त कोई कुछ देर में दूध पिलाना पसन्द करती हैं। कोई आठ आठ घण्टेतक खबर ही नहीं लेतीं। अनेक श्रुतुभवशील विद्वानोंकी राय है कि प्रसूताके साफ़ होने और चारपाई पर लेटनेके पीछे तुरन्त बच्चेको स्तनोंमें लगा देना चाहिये। परन्तु यह याद रहे कि तीन घण्टेसे अधिक इस काममें न लगें जब बच्चा स्तनोंसे लगेगा तो उसे दूध पीनेसे की वान्त पड़ेगी। स्तनोंमें जल्दी लगानेका कारण यह है कि बच्चेको यह बतलानेकी जरूरत है कि उसका आहार स्तनोंमें है। बच्चेके पेटमें जो गन्दी भरी रहती है वह दूध पीनेपर साफ़ हो जाती है। पहले पहलका दूध बच्चेके लिये उद्योगका काम करता है।
वैद्यकका मत है कि स्त्रियाँमें दूध पुत्रके छूने, देखने और स्पर्श करने तथा बालकके स्तन पकड़नेसे चीर्थकी तरह उत्तरता है। इसमें मुख्य हेतु माताका स्नेह है। (आ० वा० प्र० ९)
जिन स्त्रियाँके पहले पहल बच्चा होता है उनका तीसरे दिन अच्छी तरह दूध उतरने लगता है, परन्तु जो कई बच्चोंकी