संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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सन्तति-शास्त्र ।
बच्चे धायके यहां पाले जाने उचित है। परन्तु पैदा होनेके साथ ही धायका दूध पिलाना ठीक नहीं। कमसे कम एक मास गाय या बकरीका दूध पिलाकर जब कि बच्चेकी पाचन-शक्ति ठीक हो जाय, तब धायका दूध पिलवाना चाहिये। सब से उत्तम तो यह है कि धायका दूध न पिलाया जाय। गाय और बकरी के दूधपर बच्चा अच्छी तरह पाला जा सकता है।
(६१) बच्चोंकी तौल ।
हमारे देशमें इस बातको अशुभ मानते हैं कि पैदा होते ही बच्चेको तौला जावे। परन्तु इसके अतिरिक्त और कोई रीति तौल जाननेकी नहीं है। तौलनेसे बच्चेके स्वास्थ्यका पता ठीक लग सकता है। जो बालक जितना हलका होगा उसको उतना ही रोगी समझना चाहिये। पैदा हुए बच्चेको तौल ३ सेरसे ५सेर तक जरूर होना चाहिये। कहीं कहीं इससे कुछ अधिक तौलके भी उत्पन्न होते हैं। बच्चा जब पैदा होता है उसमें जितनी तौल उस समय होती है वह दो तीन दिन पीछे नहीं रह जाती। प्रायः ३ सेरकी कमी अवश्य हो जाती है। इसके दो कारण हैं—पक तो यह कि पैदा होनेके बाद बच्चा पाखाना पेशाब करता है, दूसरा यह कि दो तीन दिन ठीक ठीक दध नहीं मिलता। यहाँपर यह शंका होती है कि गर्भमें दध कहीं मिलता था कि जिससे उसका पालन होता? इस विषय में आचार्योंका मत है कि गर्भमें बच्चेका पालन माताके भोजन किये हुए रससे होता है और पैदा होनेके बाद दधसे पलता है। इसलिये तीसरे दिन बच्चेको तौलना चाहिये। जब बच्चेको दध मिलने लगता है तो उसको तौलव दूने लगती है। हमारे देश की अपेक्षा यूरोपमें बच्चोंकी तौल अधिक होती है।