संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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सन्तति-शास्त्र ।
जिसके बालक जीते रहते हों, दग्धवाली, नीच कर्म न करनेवाली, अच्छे कुलकी, बहुतेर गुणोंसे युक्त श्यामा अथवा सुन्दर रूपवती होनी चाहिये। ऐसी धाय बालकको निरोग रखती हुई बलको बढ़ाती है।
(सु० श० अ० ५० श्ल० ३८ व ३९)
३ जवान, सुन्दर, सुगौल, मधुरभाषिणी, निरोग जिसमें सुहृदयताका प्राकृतिक गुण हो, चतुर, श्रद्धाप्रिय, सुडौल गरीरवाली और उत्तम विचारकी पढी लिखी धाय होनी चाहिये। (श० क०)
ऐसे गुणोंसे युक्त धाय के होनेका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार मानाके दग्धका अस्तर बालकोंपर होता है इसी प्रकार धायके दूधका भी होता है। क्रोध करने, बुरे कामोंमें फँसिरहने और निन्दनीय बातोंके विचार करनेसे दूध भ्रष्ट हो जाता है। अन्नपत्र मूत्र परीक्षा करके धाय रखनी चाहिये।
( ६३ ) वच्चा उत्पन्न होनेके कितने दिन बाद संयोग करना चाहिये ?
यह बड़े महत्वका पक्ष है। लोग इसपर बहुत कम ध्यान देते हैं। जिनको स्त्री और वस्त्रके जीवनका विचार है वे तो कुछ ध्यान भी देते हैं। परन्तु जो विषय-वासनाके प्रेमी हैं, उन्हें कुछ विचार नहीं। इसमें कई मत हैं।
१. वैधकका मत।
१ वच्चा होनेके ऐसे समयतक जब तक कि वह दूध पीता रहे, संयोग न करना चाहिये। (श० क०)