संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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Read in contextधाय कैसी होनी चाहिये ?
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वैयक्तिक मत ।
१. धाय अपने जातिकी जवान हो, उदंड रोगी न हो, सब अंगोंसे युक्त हो, कुरूप न हो, किसी प्रकारका न्यसन न रखती हुई खोटी न हो, अपने देशकी हो, तुच्छ स्वभाववाली न हो, नीच कामोंके करनेवाली नीच जातिकी न हो, जिसके सन्तान हो और निरोग रहती हो, गोदमें पुत्र हो, बहुत दूधवाली बिना समयके न सोनेवाली, जो जातिके बाहर न हो, अच्छे कामोंकी करनेवाली, पवित्र हो अपवित्रतासे घृणा करनेवाली, जिसके स्तन अच्छे और उत्तम हो, स्तन न बहुत ऊँचे न बहुत लम्बे, न बहुत छोटे हों न पीपलके पत्तेके समान, स्तनोंका अगला हिस्सा पतला हो और बिना परिश्रमके पीनेमें दूध आ जावे । ऐसे स्तनोंकी गुणयुक्त धाय होनी चाहिये । (च० श० अ० ८ श्ल० १०५ व १०६)
२. धाय अपने वर्णके अनुसार जैसे ब्राह्मणको ब्राह्मणी क्षत्रियको क्षत्रिया, वैश्यको वैश्या और शुद्रको शुद्धी होनी चाहिये । वर्ण शब्दसे यह बात भी कही जा सकती है कि धाय माताके रंगके अनुसार हो, ओसत दर्जेके डील-डौल की, न बहुत लम्बी न तिनगी, मध्यम अवस्थावाली अर्थात् सोलह वर्षसे ३५ वर्षतककी निरोग, शीलस्वभाववाली चपल और लोलुप अर्थात् जिसका चित्त रुक न सके, अत्यन्त डुबली या अत्यन्त मोटी न हो, जिसका शुद्ध दूध हो, जिसके हाँठ, लम्बे न हों, स्तन ऊँचे और लम्बे न हों, जिसका शरीर कम बेसी न हो, जैसे ऊ अंगुली होना या एक ही आँख इत्यादि, जिसमें कोई दुर्ब्यसन (दिव) न हो, बालकपर प्रेम रखनेवाली,