संतति शास्त्र

संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
Devanagarihipublished302 pages
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सन्तति-शास्त्र ।
अनेक प्रकारकी असावधानियोंने दूषित हो जाना है और माताओंको जरा भी पता नहीं चलता। बच्चोंके रोगी होनेपर चिकित्सकोंकी जरा भी दृष्टि दूषपर नहीं जाती। अनेक विद्वानोंकी राय है कि दूषके विगड़नेसे ही बच्चोंमें अधिकांग रोग उत्पन्न होते हैं, जिसके अनेक कारण हैं।
१. वैयक्तिका मत।
- १. माता श्रववा धावके भारी आहार और दूषित व्यवहार से शरीरमें दोष उत्पन्न होकर दूष विगाड़ देते हैं। ( श० क० )
- २. अनिर्भयुत, शोक, चिन्ता, भय और क्रोधसे । ( श० क० )
- ३. माताके अनेक प्रकारके रोगोंसे । ( श० क० )
- ४. दूधमें, घी, खाड़, मांस और नमकका अंश कम हो जानेसे। ऐसा उस समयमें होता है जब कि स्त्री की दूध इत्यादि पौष्टिक पदार्थ न खावे। ( रतिशास्त्र )
- ५. पैंतीस वर्षकी श्रवस्थाके ऊपरवाली माताका दूष हलका पड़ जाता है। गर्भवती स्त्रीका दूष तीन मानके बाद विगड़ जाता है। ( श० क० )
- ६. अधिक मेहनत करनेसे दूधमें मांसका अंश कम हो जाता है। ( रतिशास्त्र )
- ८. बुरी शौपधियोंके बानेसे दूषके सारे अंश दूषित हो जाने हैं।
- ९. आहार और विहारसे वात, पित्त और कफ अलग अलग या एक साथ विगड़ कर दोष उत्पन्न कर देते हैं। ( श० क० )
इस प्रकारसे विगड़े हुए दूधमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं।