संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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सन्तति-शास्त्र ।
पर स्थित रहता है। यह भिल्ली जलोत्पादक भिल्लीके साथ मिली रहती है। इसके भीतर एक और भिल्ली होती है, वह अण्डाशयमें फैली रहती है। इसके भीतर अण्डोत्पादक कोष होते हैं। रजोधर्मके समयमें अण्डोंका आकार और वजन बढ़ जाता है। यहींसे रज डिम्ब-नालियों द्वारा गर्भगर्भमें पहुँचता है। औरवायुकी प्रेरणासे बाहर हो जाता है। रज बन्द हो जाने पर अण्डे पहलेकी भाँति धीरे धीरे सिकुड़ जाने हैं।
फलवाहिनी नली और अण्डोंका संबंध बहुत बड़ा है। अण्डोंसे रज उत्पन्न होकर फलवाहिनी नली द्वारा गर्भाशयमें पहुँचता है।
( ५ ) अण्डोंके रोग ।
अण्डे ही रज-जन्तुओंका उत्पत्तिके प्रधान स्थान हैं। जब इनसे नियमपूर्वक रज उत्पन्न नहीं होता, तब अनेक रोग पैदा हो जाते हैं। अण्डोंके रोग तीन प्रकारके होते हैं। ( १ ) वह कि जो जन्मसे ही हैं। ( २ ) वह कि जो वययनमें हैं और ( ३ ) वह कि जो जवानोंमें हैं। जो रोग जन्मसे ही होते हैं उनको असाध्य समझना चाहिये। वययन और जवानोंमें उत्पन्न हुए रोग अच्छे हो सकते हैं। जन्मसे होनेवाले रोग गर्भमें ही हो जाते हैं, इसका कारण गर्भाधानका दोष है। वययन और जवानोंमें उत्पन्न होनेवाले रोगोंका कारण नियमोंका न पालन करना और अनेक प्रकारकी असावधानियाँ हैं।
१. जन्मसे होनेवाले रोग ।
१ अण्डोंका न होना ।
३ यह रोग गर्भसे ही उत्पन्न होता है। कारण यह कि माता-पिताके मिले हुए रज-वीर्यसे बच्चेका शरीर बनता