संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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Read in contextअण्डाके रोग ।
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है। ऐसे रज-वीर्यके मिश्रणमें जिस अंगके बननेका अंग नहीं होता, वह अंग गर्भमें नहीं बनता। अतएव जिन माता पिताके मिले हुए रज-वीर्यमें अण्डे बननेका अंश नहीं होता, उससे उत्पन्न हुई कन्याके गर्भाशयमें अण्डे नहीं होते। (रतिशास्त्र)
२. पेसी स्त्रियोंके अनेक लक्षण होते हैं— (रतिशान्त्र)
१. गर्भाशय नहीं होता।
२. शरीर सदैव दुबला रहता है।
३. स्त्रीकी आकृति छोकरके समान होती है।
४. मुख सदैव सूखा और चिपटा हुआ रहता है।
५. पैर पंजमें पड़ी तक चिपटा और सूखा होता है।
६. कद छोटा होता है। कोई स्त्रियाँ कुछ लम्बी होती हैं।
७. अतुल्यस्मर्ग नहीं होना।
८. पुरुषसे मिलनेकी इच्छा नहीं होती।
९. मुखसे सदैव दुर्गन्ध निकला करती है।
२. अण्डोंका पूर्ण रीतिसे न विलना।
१. यह रोग गर्भहीसे उत्पन्न होता है। इसमें अण्डे जवानी पर पूरे तौरसे नहीं खिलते, कारण यह कि जब माता-पिताके मिले हुये रज-वीर्यमें अण्डे बनानेवाला अंश कम होता है, तो ऐसे रज-वीर्यके मिले हुये पदार्थसे उत्पन्न हुई कन्याओंके अण्डे निर्बल और छोटे रह जाते हैं। अतएव वे जवानोंमें अच्छी तरह नहीं खिलते।
(रतिशास्त्र)
२. पेसी स्त्रियोंके अनेक लक्षण होते हैं। (रतिशास्त्र)
१. गर्भाशयका छोटा और निर्बल होना।
२. शरीरका सदैव दुबला रहना।