संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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Read in contextरजो-धर्म और संयोग-शक्ति ।
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इस विषयमें माताओंका बहुत बड़ा दोष है। उनको इसका कुछ भी विचार नहीं है। कैसी शर्मकी बात है कि मूर्ख, निर्लज्ज और शौकके पंजेमें फँसी हुई स्त्रियाँ किसी बातका विचार न करती हुई बुरी संगत और बुरे कामोंसे कन्याओंको जल्दी सयानी बना लेती हैं। कन्याओंको सयानी बनानेके लिये ये बातें कारणभूत होती हैं—प्रेमकी बातें, मनमाना भोजन, दिल-चाहा शृंगार, हँसी-मजाककी बातें, वेहदे गाने, पेशाशीके वृत्तांत-से भरी हुई पुस्तकें, स्त्री और पुरुषोंकी परस्पर बात-चीतके रसभरे किस्से, शौकका सामान और निर्लज्ज स्त्रियोंका साथ। यही कारण है कि आजकल शहरोंमें कन्याएँ दस वर्षकी अवस्थामें रजवती होकर बारहवें वर्षमें पूर्ण युवतियाँ बन जाती हैं और उनके शरीरमें सारी बातें जवान स्त्रियोंकी सी देखनेमें आती हैं। यह तो भले घरानेकी अच्छे भले मानस और पद्वें रहनेवाली धनाढ्य स्त्रियोंकी दशा है, साधारण दशावाली स्त्रियाँ, जो पद्वीनशीन नहीं हैं, और भी बुरी दशामें होती हैं। बाजारू कन्याएँ (रिटियोंके यहाँ) तो इससे भी कहीं ज्यादा बुरी तरकीबोंसे जवान बनाई जाती हैं। उन दशाओंको याद करते हुए यही कहना पड़ता है कि हे भगवन् क्या होगा। यही कारण है कि देहातोंकी अपेक्षा शहरोंमें कन्याएँ बहुत जल्द रजवती हो जाती हैं, क्योंकि कन्याओंके कोमल चित्तको विगाड़कर जवानीकी गर्मी पैदा करनेके लिये शहरोंमें बहुत बड़े बड़े सामान प्रस्तुत रहते हैं।
जो लोग रजस्वला होनेका समय देशकी गरमी और सरदी पर निर्भर मानते हैं वे बङ्गाल देशका प्रमाण देते हैं। वहाँ गरमी विशेष होनेसे कन्याएँ जल्दी रजवती होती हैं। इस बातका हमने स्वयं अनुभव किया है कि बङ्गालमें कन्याएँ