सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
by भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद
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Read in context३७८ सात्वतसंहिता यन्त्र को सफेद सूत्र से वेष्टित करे। उसे अर्घ्य वाले कुम्भ पर रखकर मण्डल के अग्रभाग में शालि के चूर्ण से निर्मित स्थण्डिल (वेदी) पर स्थापित करे। मण्डल पर अपने हृदय से मन्त्रनाथ का आवाहन कर, श्वेत उपचारों से उसकी पूजा कर, पूर्णेन्दुमण्डल में स्थित सुधा समुद्र का उद्गिररण करते हुए सैकड़ों चन्द्रमा के प्रकाश के समान सपरिवार मन्त्रनाथ का ध्यान करे। फिर पूजा करे और पूजा के अन्त में 'महाशान्तिं यच्छ यच्छ' ऐसी प्रार्थना करे। फिर उसके उत्तर दिग्भाग में पूर्णमासी के चन्द्रमा के समान निर्मित वृत्तकुण्ड में दूध, चावल, मधु, घृत, गुग्गुल, तिल और चन्दन इन सात पदार्थों से सात रात तक होम करे। केवल दूध पीकर रहे। परमेश्वर मन्त्रनाथ का प्रतिदिन आठों प्रहर अर्चन करे। होम के अन्त में प्रतिदिन कलश स्थित भगवान् को शीतलोदक से आठों प्रहर सेचन करे। प्रतिदिन स्नान के बाद साधक के ऊपर ब्रह्मरन्ध्र से अमृत की वर्षा करते हुए मन्त्र नाथ का स्मरण करे इस विधि से शान्ति हो जायेगी ॥ १५५-१७५ ॥ अब शान्ति का दूसरा विधान कहते हैं—मिट्टी का, अथवा पत्ते का, अथवा काष्ठ का पात्र लेकर केवल अन्न से अष्टपत्र कमल का निर्माण करे। उस अष्टपत्र पर पिष्ट निर्मित घृत पूर्ण प्रज्ज्वलित आठ दीपक स्थापित करे। फिर पुष्पादि से उसकी पूजा कर आर्द्र सप्तविध बीज उसके ऊपर विकीर्ण (फैलावे) करे। फिर एक जलपूर्ण कलश की पूजा कर उसके ऊपर धूप पात्र स्थापित कर अविच्छिन्न रूप से उस पर धूप जलाते रहे। इस प्रकार तीनों कालों तक देश के पालक भूतों को बलि देवे। बलि देने वाले के पीठ को सात पद पर्यन्त शान्ति के लिये अविच्छिन्न रूप से करकोदक (करवा के जल की) धारा द्वारा अस्त्र मन्त्रों के साथ बलि मन्त्रों से सींचते रहे ॥ १७६-१८१ ॥ पौष्टिकविधानम् कुङ्कुमक्षोदमिश्रेण कुसुम्भरजसा तु वै। पूर्ववन्मण्डलं कुर्याद् रक्तचन्दनभूषितम् ॥ १८२ ॥ नीवारतण्डुलैर्नैव ताम्रवर्णैस्तिलैः शुभैः। सम्पूर्य बदरोपेतैरुपकुम्भाष्टकं हि यत् ॥ १८३ ॥ सोपकुम्भानि कुम्भानि रक्तसूत्रेण वेष्ट्य च। शेषं यद्विहितं चात्र तत्तद् रक्तं प्रकल्पयेत् ॥ १८४ ॥ ततः स्नातः कृतन्यासो नाम रोचनया लिखेत्। अलक्ताम्बुयुक्तेन सान्द्रदर्भाङ्कुरेण तु ॥ १८५ ॥ पूर्ववत् पद्मगर्भस्थं ततः पत्रेष्वधोमुखम्। बीजं नियोजयेत् तन्मे गदतश्चावधारय ॥ १८६ ॥ नेभैरेकोनविंशाख्यवर्णस्याधोगतं न्यसेत्।