शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)
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Read in context४७२ ] { श्रीशारदा तिलक पद्माविवोर्ध्वमुखरूढसुजातनालौ श्रीकण्ठपत्नि ! शिरसैव दधे तवाङ्घ्री ।१०० द्वाभ्यां समीक्षितुमतृप्तिमतेव। दृग्भ्यामुत्पाट्य भालनयनं वृषकेतनेन । सान्द्रानुरागतरालेन निरीक्षमाणे जङ्घे उभे अपि भवानि ! तवानतोऽस्मि ।१०१ ऊरू स्मरामि जितहस्तिकरावलेपौ स्थौल्येन पाण्डुरतया परिभूतरम्भौ । श्रोणीभरस्य सहनौ परिकल्प्य दत्तौ स्तम्भाविवाम्ब ! वयसातव मध्यमेन ।१०२ श्रोण्यौ स्तनौ च युगपत्प्रथयिष्यतो- च्चैर्बाल्यात्परेण वयसा परिकृष्णसारः । रोमावलिविलसितेन विभाव्यमूर्ति- र्मध्यस्तव स्फुरतु मे हृदयस्य मध्ये ।१०३ तपे हुए सुवर्ण के सदृश चार हाथियोंके द्वारा आवर्जित अमृतके कलशों से अभिषिक्त होते हुए दोनों हाथों से सुन्दर कमलों को वहन करती हुई पद्मा ! अभयदान और वरदान वाली होती है ।६७। आठों भुजाओं से अत्यन्त उग्र और अनेक आयुधों को वहन करती हुई वल्लरियों के द्वारा मृगाधिराज पर अधिरोहण करके दूर्वादल की द्युति के समान द्युति वाली देवों के विपक्ष में रहने वाले असुरों को करती हुई हे भवानी ! आप ही दुर्गा देवी है ।६८। आवी निदाघ जल के कणों से शोभायुक्त मुख वाली, गुञ्जा गुण से परिकल्पित हार यष्ठि वाली, पत्रांशु काम से-सित कान्ति युक्त, अनङ्ग तन्त्रा पुलिन्द तरुओंकी आद्या आपका मैं वारम्बार स्मरण करता हूँ ।६६। गति अर्थात् गमन से क्वणित नूपुरों द्वारा दूर समाकृष्ट मूर्तों की भाँति हंसों से अर्थ वचनों के द्वारा अनुगम्यमान, ऊर्ध्वमुख सुजात नाल वाले पद्मों के समान हे श्री कण्ठ पत्नि ! मैं शिर से आपके चरणों को धारण करता हूँ ।१००।