शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)
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Read in contextएकोनविंश पटल ] [ ४७३ दों नेत्रों से देखते हुए भी अतृप्ति वाले की भाँति वृषकेतन शिव ने भाल में तीसरा नेत्र उत्पन्न करके हे भवानी ! मान्द्र अनुराग से तरल भाव द्वारा निरीक्षमाण दोनों जंघाओं को देखने वाले हैं ऐसी आपको मैं प्रणाम करता हूँ ।१०१। स्थूलता से हस्ती के कर (सूँड) के गर्व को जीत लेने वाले तथा पाण्डुरता से रम्भा (कदली) की तिरस्कृत कर देने वाले ऊरुओं का मै स्मरण करता हूँ । हे अम्ब ! आपकी अवस्था ने मध्यम भाग श्रोणियों के भार को सहन करने वाले परिकल्पित करके स्तम्भों की भांति दिये हैं ।१०२। हे माता ! बाल्य काल से आगे श्रोणी और स्तनों को एक साथ प्रथित करता हुआ आपका मध्य भाग रोमा- वली से विलसित विभाव्य मूर्त्ति वाला मेरे हृदय के मध्य में स्फुरण करे ।१०३। सख्युः स्मरस्य हरनेत्रहुताशमी- रोलावण्यवारिभरितं मवयौवनेन । आपाद्य दत्तमिव पल्वलमप्रधृष्यं नाभिं कदापि तव देवि ! न विस्मरेयम् ।१०४ ईशोपगृह्यसमुनं भसित दधाने काश्मीरकर्द्दममनुस्तनपङ्कजेते । स्नानोत्थितस्य करिणः क्षणलब्धफेनौ सिन्दूरितौ स्मरयतःसमदस्य कुम्भौ ।१०५ कण्ठातिरिक्तगलदुज्ज्वलकान्ति- धाराशोभौ भुजौ निजरिपोर्मकरध्वजे न । कण्ठग्रहाय रचितौ किल दीर्घपाशौ मातर्मम स्मृतिपथं नविंलघयेताम् ।१०६ नात्यायतं रुचिरकम्बुविलासचौर्यं भूषाभरेण विविधेन विराजमानम् । कण्ठं मनोहरगुणं गिरिराजकन्ये! संचिन्त्य तृप्तिमुपयामि कदापि नाहम् ।१०७