शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)
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Read in context४७६ ] [ श्रीशारदा तिलक इसके अनन्तर संवित् के प्रदान करने वाले योग का साङ्ग वर्णन करता हूँ। योग के विशारद गण जीवात्मा के ऐक्य वाले योग को कहते हैं ।१। दूसरे विद्वान् जीवात्मा के अभेद द्वारा प्रतिपत्ति को जानते हैं। आगमके ज्ञाता गण शिवभक्ति स्वरूप ज्ञानको योग कहते।२। अन्यविशा- रद पुराण पुरुषके ज्ञान को बतलाते हैं। आदिमें आत्माके शत्रु कामादि को जीतकर फिर योग का अभ्यास करना चाहिए ।३। काम—क्रोध- लोभ-मोह और इनके पश्चात् मद तथा मात्सर्य ये षट् वर्ग आत्मा को दुःख देने वाले होते हैं ।४। योगी गण योग के यम नियमादि आठ अङ्गों के द्वारा इन विजय प्राप्त करके योग को प्राप्त किया करते हैं। यम-नियम-आसन-प्राणायाम इसके अनन्तर हैं । प्रत्याहार- धारणा-ध्यान और समाधि के अङ्ग होते हैं। योगीगण योग के साधन में इन्हीं आठ अङ्गों को बतलाते हैं ।५-६। अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं कृपाऽऽर्जवम् । क्षमाधृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश ।७ तपः सन्तोष आस्तिक्यं दान देवस्य पूजनम् । सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीर्मतिश्च जपो हुतम् ।८ दशैते नियमाः प्रोक्ताः योगशास्त्र विशारदैः । पद्मासन स्वस्तिकाख्यं वज्रं भद्रासनं तथा ।६ वीरासनमिति प्रोक्तं क्र मदासनपञ्चकम् । ऊर्वोरुपरि विन्यस्त सम्यक्पादतले उभे ।१० अगुष्ठौ च निबध्नीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमात्ततः । पद्मासनमिति प्रोक्तं योगिनां हृदयङ्गमम् ।११. जानुर्वोरन्तरे सम्यक्कृत्वा पादतले उभे । ऋजुकायो विशेद्योगी स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ।१२ सीवन्याः पार्श्वयोर्न्यस्येद्गुल्फयुग्मं सुनिश्चलम् । वृषणाद्यः पादपार्ष्णी पाणिभ्यां परिवन्धयेत् ।१३