शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)
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Read in contextविंश पटल ] [ ४७७ यह सब दश हुआ करते हैं । उनके नाम ये हैं-अहिंसा अर्थात् किसी भी प्राणी के मन तथा शरीर को चोट न पहुँचाना जो मन वाणी और कर्म के द्वारा होता है । सत्य, अस्तेय (चोरी न करना) ब्रह्मचर्य, कृपा अर्थात् दया आर्जव (सरलता)-क्षमा अर्थात् शक्ति होते हुए भी अपराध के लिये किसी भी प्रकार का दन्ड न देना, धृति अर्थात् धैर्य करना, मिताहार अर्थात् शरीर की रक्षा के लिये अल्प भोजन करना, शौच अर्थात् शुद्धि रखना, ये दश यम हुआ करते हैं ।७। सन्तोष, तप, आस्तिक्य अर्थात् ईश्वर की सत्ता में सत्य विश्वास रखना, दान—देव का पूजन—सिद्धान्तों का श्रवण करना—ह्रीं अर्थात् लज्जा—मत्ति अर्थात् सद्बुद्धि-जप अर्थात् मन्त्रों का जप करना— हुत अर्थात् होम-ये दश नियम होते हैं जो कि योग शास्त्र के विद्वानों द्वारा कहे गये हैं । पद्मासन-स्वास्तिक-वज्र— भद्रासन—वीरासन ये क्रम से पाँच आसन कहे गये हैं। ऊरुओं के ऊपर दोनों पाद तल क्रम से विन्यस्त किये जाते हैं और व्युत्क्रम से दोनों अनुष्ठों को हाथों से निवद्ध करे यही पद्मासन कहा गया है जो कि योगियों के लिये परम हृदयङ्गम होता है ।११। जानु और ऊरुओं के अन्तर में दोनों पाद तलों को भली भाँति करे । योगी ऋजु शरीर वाला होते हुये प्रविष्ट होवे-यह स्वास्तिक आसन कहा जाता है ।१२। सीवनी के पार्श्वों में दोनों गुल्फों को विन्यस्त करे । वृषणों के नीचे प द पाष्र्णियों को हाथों के द्वारा परिबद्ध करे ।१३। भद्रासनं समुद्दिष्टं योगिभिः पूजितं परम् । ऊर्वोः पादौ क्रमान्न्यस्येज्जान्वोः प्रत्यङ्मुखागुलीं ।१४ करौ निदध्यादाख्यातं वज्रासनमनुत्तमम् । एकपादमधः कृत्वा विन्यस्योरौ तथेतरम् ।१५ ऋजुकायो विशेद्योगी वीरासनमितीरितम् । इडयाऽऽकर्षयेद्वायुं बाह्यं षोडशमात्रया ।१६