शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)
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Read in contextविंश पटल ] । ४७६ भ्रू मध्ये मस्तके मूर्द्धिघ्न द्वादशान्ते यथाविधि । धारणं प्राणमरुतो धारणेति निगद्यते ।२५ समाहितेव मनसा चैतन्यान्तरवर्तिना । आत्मन्यभीष्टदेवानां ध्यान ध्यानमिहोच्यते ।२६ प्राणायाम सगर्भ ओर अगर्भ दो प्रकार का होता है । जप और ध्यान आदि से युक्त जो होता है उसको बुधगण सगर्भ प्राणायाम कहा करते हैं । इससे विमुक्त जो होता है उसको अगर्भ प्राणायाम कहा जाता है। क्रम से अभ्यास करने वाले पुरुष की देह स्वेद का उद्गम होता है जो अधम है ।२०-२१। मध्यम जो होता है वह कम्प से युक्त होता है। जो भूमि के त्याग करने वाला होता है वह उत्तम कहा गयाहै। उत्तमसे गुणों की अवाप्ति होतीहै जब तक इसका शीलन अभीष्ट होता है ।२२। विषयों में विना अर्गला के जो इन्द्रियों का विचरण होता है । उनका विषयों से बल पूर्वकजो आहरण किया जाता है उसे ही प्रत्याहार कहा जाता है ।२३। अंगुष्ठ - गुल्फ—जानु— ऊरु—सीवनी--लिङ्ग--नाभि—हृदय--ग्रीवा और कण्ठ देशों में-- तालुमूल--मस्तक भ्रूमध्य--मूर्धा द्वादशान्त में विधि पूर्वक प्राण वायु को धारण करना ही धारणा कही गई है ।२५। चैतन्यान्तर- वर्ती समाहित मन से आत्मा में अभीष्ट देवों का जो ध्यान किया जाता है उसी का नाम ध्यान है ।२६। समस्तभावना नित्यं जीवात्मगरमात्मनौः । समाधिमाहुर्मुनयः प्रोक्तमष्टाङ्गलक्षणम् ।२७ षण्णवत्यगलायाम शरीरमुभयात्मकम् । गुदध्वजान्तरे कन्दमुत्सेधाद्व्यंगुलं विदुः ।२८ तत्माद् द्विगुणविस्तारं वृत्त रूपेण शोभितम् ! नाड्यस्तत्र समुद्भूता मुख्यास्तिस्रः प्रकीर्तिताः ।२६ इडा वामें स्थिता नाडी पिङ्गला दक्षिणे मता । तयोर्मध्यगता नाडी सुषुम्णा वंशमाश्रिता ।३०