शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)
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Read in context४८० ] [ श्रीशारदा तिलक पादांगुष्ठद्वये ।ता शिफाभ्यां शिरसा पुनः । ब्रह्मस्थानं समापन्ना सोमसूर्याग्निरूपिणी ।३१ तस्या मध्यगता नाडी चित्राख्या योगिवल्लभा । ब्रह्मरन्ध्रं विदुस्तस्यां पद्मसूत्रनिभि परम् ।३२ जीवात्मा और परमात्मा की नित्य समस्त भावना को ही मुनिगण अष्टांग लक्षण से युक्त समाधि कहा करते हैं ।२९। छियानवे अंगुलि के आयाम वाला उभयात्मक शरीर है । गुदा और ध्वज के अन्तर में कन्द है जो दो अंगुल होता है । उससे दुगुने विस्तार वाला वृत्त रूप से शोभित है । वहाँ पर उत्पन्न हुई नाड़ियाँ मुख्य तीन कही गई हैं ।२८। वाम भाग में स्थित नाड़ी इड़ा होती है और दक्षिण भाग में स्थित पिंगला गाड़ी है । उन दोनों के मध्य में रहने वाली नाड़ी वश के आश्रित सुषुम्ना होती है ।३०। दोनों शदों के अंगुष्ठों के साथ गई हुई पुनः शिर के साथ शिफाओं से ब्रह्म स्थान को समापन्न हुई है । यह सोम—सूर्य और अग्नि का रूप वाली है ।३१। उसके मध्य में गई हुई नाड़ी का नाम चित्रा है जो योगियों की परम प्रिया होती है । उसमें कमल के सूत्र के सदृश ब्रह्म रन्ध्र कहा जाता है ।३२। आधारांशचविदुस्तत्र मतभेदादनेकधा । दिव्यमार्गमिमं प्राहुरमृतानन्दकारणम् ।३३ इडायां सञ्चरेच्चन्द्रः पिङ्गलायां दिवाकरः । ज्ञातौ योगनिदानज्ञैः सुषुम्णायां तु तावुभौ ।३४ आधारकन्दमध्यस्थ त्रिकोणमतिसुन्दरम् । ज्योतिषां निलयं दिव्यं प्राहुरगमवेदिनः ।३५ तत्र विद्युल्लताकारा कुण्डली परदेवता । परस्फुरति सर्वात्मा सुप्ताहिसदृशाकृतिः ।३६ बभर्ति कुण्डलीशक्तिरात्मान हंसमाश्रिता । हंस प्राणाश्रयोनित्य प्राणो नाडीसमाश्रयः ।३७