शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)
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Read in context५०२ ] [ श्रीशारदा तिलक अर्चन करे ।४७। सुधी पुरुष छ अङ्गों का केसरों में जैसा कि पूर्व में बताया जा चुका है अर्चन करे। अग्नि आदि पादाष्टक से समुत्पन्न मूर्त्तियां फिर बारह पूजनी चाहिये ।४८। अब उन मूर्तियों को बताया जाता है-जातवेदा, सप्तजिह्वा हव्यवाहन, अश्वोदरज, वैश्वानर, कौमार तेजा, विश्वमुख, देवमुख ये उनके नाम कहे गये हैं। फिर भू सलिल अग्नि रानात्मा के लिये जो अन्त में नमः—इस पद से समन्वित होवें ।४६-५०। चतुर्दिक्षु समभ्यर्चेत्कोणेषु तत्कलाः पुनः । पूर्वादिदिक्षु सम्पूज्या जार्णाद्या वर्णशक्तयः ।५१ जाग्रता तपनी वेदगर्भा दहनरूपिणी । सेन्दुखण्डा शुम्भहन्त्री नभश्चारिण्यनन्तरम् ।५२ वागीश्वरी मद्वहा सोमरूपा मनोजवा । मरुद्वेगा रात्रिसंख्या तोन्नकोया यशोवती ५३ तोयात्मिका पुनर्गन्तव्या दयावत्यपि हारिणी । तिरस्क्रिया वेदमाता तत्परा मदनप्रिया ।५४ समाराध्या नन्दिनी च परा रिपुविमर्दिनी । षष्ठी च दण्डिनी तिग्मा दुर्गा गायत्र्यनन्तरम् ।५५ निरवद्या विशालाक्षी श्वापोद्वाहा वनादिनी । वंदना वह्निगर्भाख्या सिंहवाहाह्वया तथा ।५६ धुर्या दुर्विषहा पश्चाद्गिरिसा तापहारिणी । त्यक्तदोषा निस्सरन्ता चत्वारिंशच्चतुर्युता ।५७ फिर चारों दिशाओंमें समभ्यर्चन करे और फिर उनके कोणोंमें उनकी कलाओं का यजन करना चाहिये । पूर्वं आदि दिशाओंमें जार्णाद्य वर्ण शक्तियों का पूजन करे ।५१। ये संख्या में चौवालीस हैं—उनके नामों को अब बताया जाता है—जाग्रता, तपनी, वेदगर्भा, दहन रूपिणी, सेन्दुखण्डा, शुम्भहन्त्री, नभच्चारिणी, वागीश्वरी, मद्वहा, सोम