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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished511 pages

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एकविंश पटल ] { ५०३ रूपा, मनोजवा, मरुद्वेगा, रात्रिसंख्या, तीव्रकोपा, यशोवती ।५२-५३। तोयात्मिका, नित्या, दयावती, हारिणी, तिरस्कृता, वेदमाता, तत्परा, मदनप्रिया, समाराध्या, नन्दिनी, परा, रिपुविमर्दिनी, षष्ठी, दण्डिनी, तिग्मा, दुर्गा, गायत्री ।५४-५५। निरवद्या, विशालाक्षी, श्वासोद्ग्राहा, वनादिनी, वेदना, वह्निगर्भा, सिंहवाहा, धुर्या, दुर्विपहा, अङ्गिरसा, तापहारिणी, त्यक्तदोषा, निस्सपत्ना ये चोआलीस नाम वाली हूँ ।५६-५७। लोकपालांस्ततोऽभ्यर्चेद्वज्रराद्यायुधसंयुतान्। इत्थं जपादिभिः सिद्धे मन्त्रेऽस्मिन्साधकोत्तमः ।५८ आग्नेयास्त्राधिकारी स्यात्तद्विधानमुदीर्यते । आग्नेयास्त्रमिति प्रोक्त विलोमपठितो मनुः ।५६ पूर्वोक्ता एवमुत्पाद्या मन्त्रस्यास्य प्रकीर्तिताः । प्रतिलोमक्रम। दस्य षडङ्गानि प्रकल्पयेत् ।६० वर्णन्यासपदन्यासौ विदध्यात्प्रतिलोमतः । ध्यानभेदान्विजानीयाद् गूर्वादेशान्नचान्यथा ।६१ पूर्ववज्जपक्लृप्तिः स्याज्जहुयात्पूसंख्यया । पञ्चगव्यसुपक्वेन चरुणा तस्य सिद्धये ।६२ इसके अनन्तर वज्रादि आयुधों के सहित लोक पालों का अर्चन करना चाहिये । इस प्रकार से जप-अर्चन-हवन और न्यास आदि के द्वारा इस मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर साधना करने वालों में परम श्रेष्ठ पुरुष आग्नेय अस्त्र का अधिकारी हो जाया करता है । अब उसका विधान भी कहा जाता है। विलोम से पढ़ा हुआ मन्त्र ही आग्नेयास्त्र है—यह कहा गया है ।५८-५९। पूर्वमें कहे हुये ही इस प्रकारसे उत्पादन करने के योग्य हैं जो इस मन्त्र के विषयमें कहे गये हैं। इसके प्रतिलोम के क्रम से ही अङ्गों की कल्पना कर लेनी चाहिये ।३०। प्रतिलोम से ही वर्णों का न्यास और पदोंका न्यास करे । ध्यानके भेदों को गुरुदेव आदि