शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
by शार्ङ्गधराचार्य
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextषष्ठोऽध्यायः] निरूहणवस्तिविधिः 239 [वाम स्तम्भ / Left Column] भी अनुवासन वस्तियाँ दी जाती हैं, उसी प्रकार निरूहण वस्तियाँ भी एक से अधिक दी जा सकती हैं। सम्यक् निरूढ में 'विविक्तता, मनुस्तुष्टि' आदि लक्षण दिखलायी पड़ने पर वस्ति-विधान रोक देना चाहिये। वस्ति का हीनक्रम, हीनयोग भले ही करें, किन्तु अतियोग न हो। विशेषता सुकुमारों के लिये तो हीनक्रम ही हितकर होता है। दोषभेद से भोजन-व्यवस्था पित्तश्लेष्मानिलाविष्टं क्षीरयूषरसैः क्रमात् ।। 14 ।। निरूढं भोजयित्वा च ततस्तमनुवासयेत् । पित्त, कफ तथा वायु से पीड़ित, निरूढ़ (जिसे निरूहवस्ति दी गयी है) मनुष्य को क्रमशः दूध, यूष तथा मांसरस (शोरवा) के साथ भोजन कराकर फिर अनुवासनवस्ति देनी चाहिये। सुकुमारादि के लिए वस्ति सुकुमारस्य वृद्धस्य बालस्य च मृदुहिंतः ।। 15 ।। वस्तिस्तीक्ष्णः प्रयुक्तस्तु तेषां हन्याद् बलायुषी । सुकुमार, वृद्ध तथा बालक को मृदुवस्ति लाभदायक होती है। तीक्ष्णवस्ति का प्रयोग उनके बल तथा आयु को नष्ट कर देता है। वस्तियों का क्रम दद्यादुत्क्लेशनं पूर्वं मध्ये दोषहरं ततः ।। 16 ।। पश्चात् संशमनीयं च दद्याद् वस्तिं विचक्षणः। कुशल चिकित्सक पहले 'उत्क्लेशन' (दोषों को उभारने वाली) वस्ति का बीच में 'दोषहर' (शोधनकारक) वस्ति का और अन्त में 'संशमनीय' वस्ति का प्रयोग करें। उत्क्लेशन-वस्ति एरण्डबीजं मधुकं पिप्पली सैन्धवं वचा ।। 17 ।। हपुषा फलकल्कञ्च वस्तिरुत्क्लेशनः स्मृतः । एरण्ड के बीज, मुलेठी, पीपल, सेंधा नमक, वच तथा हाऊबेर-इन द्रव्यों का कल्क मिलाकर जो वस्ति दी जाती है, उसे 'उत्क्लेशन' कहा जाता है। दोषहर-वस्ति शताह्वा मधुकं बिल्वं कौटजं फलमेव च ।। 18 ।। सकाञ्जिकः सगोमूत्रो वस्तिर्दोषहरः स्मृतः। सौंफ, मुलेठी, बेलगिरी, इन्द्रजौ, काँजी तथा गोमूत्र के मिश्रण से जो वस्ति दी जाती है, उसे 'दोषहर' कहा जाता है। [दक्षिण स्तम्भ / Right Column] शोधन-वस्ति शोधनद्रव्यनिष्क्वाथैस्तत्कल्कैः स्नेहसैन्धवैः ।। 19 ।। युक्त्या खजेन मथिता बस्तयः शोधनाः स्मृताः । शोधन द्रव्यों के क्वाथ तथा कल्क, स्नेह (तेल) तथा सेंधा नमक इन सबको एक साथ मिलाकर और मथानी से मथकर 'शोधन' वस्तियाँ तैयार कर ली जाती हैं। वक्तव्य-शोधन द्रव्य इस प्रकार हैं-दन्ती, त्रिफला, पठानीलोध, जवाखार, सेहुण्ड (थूहर), शंखिनी, अमलतास, कबीला, चोक तथा दूध आदि। शमन-वस्ति प्रियङ्गु मधुकं मुस्ता तथैव च रसाञ्जनम् ।। 20 ।। सक्षीरः शस्यते वस्तिर्दोषणां शमनः स्मृतः। प्रियंगु, मुलेठी, नागरमोथा, रसवंत तथा दूध का घोल बनाकर जो वस्ति दी जाती है, उसे 'शमन' (दोषों को शान्त करने वाली) कहा जाता है। लेखन-वस्ति त्रिफलाक्वाथगोमूत्रक्षौद्रक्षारसमायुताः ।। 21 ।। ऊषकादिप्रतीवापैर्बस्तयो लेखनाः स्मृताः। त्रिफला का क्वाथ, गोमूत्र, मधु तथा क्षार का घोल तैयार करके और उसमें ऊषकादिगण (देखें-शा० सं० म० खं० अ० 2) का प्रक्षेप मिलाकर जो वस्तियाँ दी जातीं हैं, उनको 'लेखन' कहा जाता है। बृंहण-वस्ति बृंहणद्रव्यनिष्क्वाथाः कल्कैर्मधुरकैर्युताः ।। 22 ।। सर्पिर्मांसरसोपेता बस्तयो बृंहणाः स्मृताः। बृंहण द्रव्यों (जीवनीयगण तथा अश्वगन्धा, शतावरी आदि) के क्वाथ में मधुर द्रव्यों (द्राक्षा, खजूर तथा इस प्रकार के मधुर द्रव्य) का कल्क तथा घृत और मांसरस मिलाकर जो बस्तियाँ दी जाती हैं, उनको 'बृंहण' (शरीर को पुष्ट करने वाला) कहा जाता है। पिच्छिल-वस्ति बदर्यैरावतीशेलुशाल्मलीधन्वनागराः ।। 23 ।। क्षीरसिद्धाः क्षौद्रयुक्ता नाम्ना पिच्छिलसंज्ञिताः । अजोरभ्रैणरुधिरैर्युक्ता देया विचक्षणैः ।। 24 ।। मात्रा पिच्छिलबस्तीनां पलैर्द्वादशभिर्मता । बेरी के पत्ते, नागबला (गंगेरन) के पत्ते, लिसोड़ा के पत्ते या फल, सेमल के फूल, धामिन के पत्ते तथा नागरमोथा- इन सब द्रव्यों को क्षीरपाक-विधि (देखें-शा०सं०, म०खं०