भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 356 में से

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पृष्ठ 276

240 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे अ० २ श्लोक 161) से दूध में पकाकर और उसमें मधु मिलाकर जो वस्ति दी जाती है, उसे 'पिच्छिलवस्ति' कहा जाता है। इसमें बकरा, भेड़ा तथा हरिण का रक्त भी मिलाया जाता है। 'पिच्छिलवस्ति' की मात्रा 12 पल (48 तोला) की मानी जाती है। **वक्तव्य-**इसमें वे द्रव्य डाले जाते हैं, जो पिच्छिल या चिपचिपाहट वाले या लुआबदार हों। यह गुदा के दाह, क्षत तथा रक्तातिसार में बहुत अधिक लाभ करती है। प्रमाणानुसार द्रव्यमिश्रण-विधि दत्त्वादौ सैन्धवस्याक्षं मधुनः प्रसृतिद्वयम् ।। 25 ।। विनिर्मथ्य ततो दद्यात् स्नेहस्य प्रसृतित्रयम् । एकीभूते ततः स्नेहे कल्कस्य प्रसृतिं क्षिपेत् ।। 26 ।। सम्मूर्च्छिते कषायं तु चतुःप्रसृतिसम्मितम् । क्षिप्त्वा विमथ्य दद्याच्च निरूहं कुशलो भिषक् ।। 27 ।। किसी बड़े पात्र में पहले एक तोला सेंधा नमक (पीसा हुआ) डाले और फिर उसमें दो प्रसृति (4 पल) मधु डालकर भली-भाँति मथकर तीन प्रसृति स्नेह उसमें डाल दें। उसे मथकर मिला दें, तत्पश्चात् एक प्रसृति कल्क डालकर मिला दें, फिर चार प्रसूति कषाय मिला दें, अन्त में दो प्रसृति आवाप (दूध तथा काँजी आदि) मिलायें, इस प्रकार बनायी हुई वस्ति का कुशल चिकित्सक प्रयोग करे। यह 'द्वादश- प्रसृतवस्ति' कहलाती है। दोष-भेद से स्नेह, मधु का प्रमाण वाते चतुष्पलं क्षौद्रं दद्यात् स्नेहस्य षट्पलम् । पित्ते चतुष्पलं क्षौद्रं स्नेहं दद्यात् पलत्रयम् ।। 28 ।। कफे च षट्पलं क्षौद्रं क्षिपेत् स्नेहं चतुष्पलम् । उक्त द्वादशप्रसृतिवस्ति में वात की अधिकता में मधु चार पल और स्नेह 6 पल, पित्त की अधिकता में मधु चार पल और स्नेह 3 तथा कफ की अधिकता में मधु 6 पल और स्नेह 4 पल डालना चाहिये। माधुतैलिक-वस्ति एरण्डक्वाथतुल्यांशं मधु तैलं पलांशकम् ।। 29 ।। शतपुष्पापलार्धेन सैन्धवार्धेन संयुतम् । मधुतैलकसंज्ञोऽयं वस्तिः खजविलोडितः ।। 30 ।। मेदोगुल्मकृमिप्लीहमलोदावर्त्तनाशनः । बलवर्णकरश्चैव वृष्यो दीपनबृंहणः ।। 31 ।। एरण्ड क्वाथ 8 पल, मधु 4 पल, तैल 4 पल, सौंफ तीन कर्ष, सैन्धव-लवण 1 कर्ष और मैनफल 1 नग सबको मिलाकर मथानी से मथकर, कुछ गर्म करके वस्ति देनी चाहिये। इसका नाम 'माधुतैलिक' वस्ति है। यह मेदोदोष, गुल्म, कृमि, प्लीहा, मलजनित उदावर्त्त को नष्ट करती है, बल तथा वर्ण को बढ़ाती है। यह वृष्य और दीपन-पाचन है। **वक्तव्य-**राजाओं, राजाओं जैसे तथा बड़े लोगों, नारियों, सुकुमारों, बालकों तथा बूढ़ों के दोषों को निकालने के लिए बल-वर्ण की वृद्धि के लिए 'माधुतैलिक' वस्तियों का संक्षेप से उपदेश किया गया है। इनमें यात्रा, स्त्री-सेवा, भोजन और पान का कोई नियम नहीं है। इसका फल बहुत अधिक देखा जाता है। व्यापत्तियाँ भी नहीं होतीं, इसका प्रयोग इच्छानुसार किया जा सकता है। इस वस्ति की मात्रा 9 प्रसृत (18 पल) होनी चाहिये। देखें-सु०चि०अ० 3 श्लोक 100 की डल्हण- व्याख्या। दीपन-वस्ति क्षौद्राज्यक्षीरतैलानां प्रसृतिः प्रसृतं भवेत् । हपुषासैन्धवाक्षांशो वस्तिः स्याद् दीपनः परः ।। 32 ।। मधु, घृत, दुग्ध तथा तैल प्रत्येक एक-एक प्रसृत (2-2 पल) और हाऊबेर तथा सेंधा नमक एक-एक अक्ष (1-1 तोला) मिलाकर जो वस्ति दी जाती है, वह परम दीपन या अग्निवर्धक है। इसका नाम 'दीपन-वस्ति' है। युक्तरथ-वस्ति एरण्डमूलनिष्क्वाथो मधु तैलं ससैन्धवम् । एष युक्तरथो वस्तिः सवचापिप्पलीफलः ।। 33 ।। एरण्ड की जड़ का क्वाथ, मधु तैल तथा सेंधा नमक मिलाकर और वच, पीपल तथा मैनफल का प्रक्षेप डालकर जो वस्ति दी जाती है, उसका नाम 'युक्तरथ' है। **वक्तव्य-**रथ, हाथी तथा घोड़े की सवारी करते समय भी इस वस्ति का प्रयोग किया जा सकता है। अतः इसका नाम 'युक्तरथ' है। देखें-सु० चि० अ० 38। उक्त वस्तुओं का परिमाण का निश्चय शास्त्रानुसार करें। सिद्ध-वस्ति पञ्चमूलस्य निष्क्वाथस्तैलं मागधिका मधु । ससैन्धवः समधुकः सिद्धवस्तिरिति स्मृतः ।। 34 ।। बिल्वादि पञ्चमूल का क्वाथ, तैल, पीपल, मधु, सेंधा नमक तथा मुलेठी को मिलाकर जो वस्ति दी जाती है, उसे 'सिद्धवस्ति' कहा जाता है।

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