शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 277, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः ] निरूहणवस्तिविधिः 241 वक्तव्य-बल, पुष्टि तथा वर्ण की सिद्धि (प्राप्ति) तथा सैकड़ों रोगों की सिद्धि (विनाश) करने के कारण इसे 'सिद्धवस्ति' कहा जाता है। देखें-सु० चि० अ० 38। मुस्तादि-वस्ति-नागरमोथा, पाठा, गिलोय, कुटकी, बला, रास्ना, पुनर्नवा, मजीठ, अमलतास, खस, त्रायमाणा और गोखरू 1-1 पल, लघुपञ्चमूल 1-1 पल, मैनफल 8 नग सबको 4 सेर जल में पकायें, चतुर्थांश शेष रहने पर 1 सेर दूध डालकर पकायें। जब केवल दूध मात्र शेष रह जाये तो उसमें 1 पाव मांसरस, मधु और घृत 1-1 पल, सौंफ, प्रियंगु, मुलेठी, कुरैया की छाल, रसवत तथा सैन्धवलवण 1-1 तोला कल्क बनाकर और सबको मिलाकर वस्ति दें। यह वातरक्त, मोह, सूजन, अर्श, गुल्म, मूत्राघात, विसर्प, ज्वर, मलभेद और रक्तपित्त को नष्ट करती है, यह बलवर्द्धक, सञ्जीवन, वीर्यवर्द्धक, नेत्ररक्षक और शूलनाशक है। यह 'मुस्तादि-वस्ति' सभी वस्तियों का राजा है। वस्ति-कल्पना-बुद्धिमान् चिकित्सक अपनी बुद्धि द्वारा औषधों के प्रभाव को तथा रोग की स्थिति को विचार कर इस निम्नलिखित 'बीज' अर्थात् निर्देश से सैकड़ों वस्तियों की रचना कर सकता है। त्रिदोषहर-वस्तियाँ-वातनाशक औषधों के क्वाथ, सैन्धव लवण, निसोत, काँजी आदि अम्ल द्रव्यों से युक्त कुछ गर्म-गर्म वस्तियों का प्रयोग वायु-विकारों में करना चाहिये। न्यग्रोधादिगण के क्वाथ काकोल्यादिगण से युक्त घी तथा मिश्री मिलाकर वस्तियों का प्रयोग पित्त-विकारों में करना चाहिये। वक्तव्य-उक्त गण क्रमशः शा०सं०म०खं०अ० 2 तथा अ० 6 में देखें। आरग्वधादि-गण के क्वाथ पिप्पल्यादिगण से युक्त मधु तथा गोमूत्र पिलाकर वस्तियों का प्रयोग कफ- विकारों में करना चाहिये। रक्तविकार-वस्ति-बरगद आदि क्षीरीवृक्षों के क्वाथ, मिश्री, ईख का रस, दूध और घी मिलाकर ठण्डी-ठण्डी वस्तियों का प्रयोग रक्तजनित विकारों में करना चाहिये। निरूहण-वस्ति में पथ्यापथ्य स्नान मुष्णोदकैः कुर्याद् दिवास्वप्नमजीर्णताम्। वर्जयेदपरं सर्वमाचरेत् स्नेहवस्तिवत् ।। 35 ।। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां उत्तरखण्डे निरूहणवस्तिविधिः नाम षष्ठोऽध्यायः ।। 6 ।। निरूहणवस्ति के सेवन-कर्ता को उष्ण जल से स्नान करना चाहिये और दिन में सोना, अजीर्ण का परित्याग तथा शेष सभी स्नेहवस्ति के समान आचार रखना चाहिये। वक्तव्य-इस विषय को समझने के लिए सु० चि० अ० 38 अवश्य देखें। इस विषय से सम्बन्धित अधिकांश पाठ इस प्रकरण में वहीं से उद्धृत किये गये हैं। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का छठा अध्याय समाप्त ।। 6 ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA