भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 356 में से

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पृष्ठ 278

सप्तमोऽध्यायः उत्तरवस्तिविधिः


[स्तम्भ १ / Column 1]

उत्तरवस्ति-विधान अतः परं प्रवक्ष्यामि वस्तिमुत्तरसंज्ञितम्। द्वादशाङ्गुलकं नेत्रं मध्ये च कृतकर्णिकम् ।। १ ।। मालतीपुष्पवृन्ताभं छिद्रं सर्षपसन्निभम्। अनुवासन तथा निरूहणवस्ति के पश्चात् 'उत्तरवस्ति' का विधि लिखी जायेगी। इसका नेत्र (नली) बारह अंगुल लम्बा होता है और इस (नेत्र) के मध्य में (अर्थात् छः अंगुल पर) कर्णिका बनायी जाती है। इसी कर्णिका पर वस्ति (थैली) बाँधी जाती है। यह नेत्र मालती के फूल के वृन्त (मूलभाग) के सदृश मोटा होना चाहिये और उसमें सरसों के बीज के आने-जाने योग्य छिद्र होना चाहिये। वक्तव्य- जो वस्ति पुरुषों के मूत्रमार्ग में तथा स्त्रियों के भग (गर्भ) मार्ग में दी जाती है, उसका नाम 'उत्तरवस्ति' है। इसमें वस्ति या औषध भरने की थैली वही प्रयुक्त होती है, जो पूर्वोक्त वस्तियों में कही गयी है। देखें—सु० चि० अ० ३८। १००-१०१।

वस्ति-मात्रा-निर्धारण पञ्चविंशतिवर्षाणामधो मात्रा द्विकार्षिका ।। २ ।। तदूर्ध्वं पलमात्रा च स्नेहस्योक्ता भिषग्वरैः। विद्वान् चिकित्सक उत्तरवस्ति में स्नेह की मात्रा २५ वर्ष के नीचे दो कर्ष (२ तोला) तथा उसके ऊपर एक पल (४ तोला) मानते हैं।

पुरुषों में वस्ति-प्रयोग-विधि अथास्थापनशुद्धस्य तृप्तस्य स्नानभोजनैः ।। ३ ।। स्थितस्य जानुमात्रे च पीठेऽन्विष्यशलाकया। स्निग्धया मेढ्रमार्गे च ततो नेत्रं नियोजयेत् ।। ४ ।। शनैः शनैर्घृताभ्यक्तं मेढ्ररन्ध्रेऽङ्गुलानि षट्। ततोऽवपीडयेद् बस्तिं शनैर्नेत्रं च निर्हरेत् ।। ५ ।। ततः प्रत्यागते स्नेहे स्नेहवस्तिक्रमों हितः।


[स्तम्भ २ / Column 2]

आस्थापन (निरूहण) द्वारा शुद्ध होने के पश्चात् और उचित स्नान तथा भोजनों के सेवन से बलवान् हो जाने पर रोगी को जानुभर ऊँचे पीठ (पीढ़े या कुर्सी) पर बैठा दें और मूत्रमार्ग में स्निग्ध (स्नेहलिप्त) तथा श्लक्ष्ण सलाई द्वारा अन्वेषण कर अर्थात् उसमें इसे प्रविष्ट करने के पश्चात् नेत्र का प्रयोग करें। इस नेत्र को घी लगाकर चिकना कर लेना चाहिये और मूत्रमार्ग में बहुत धीरे-धीरे छः अंगुल (कर्णिका) तक चढ़ा दें, इसके पश्चात् वस्ति का पीड़न करें (औषध को मूत्राशय में पहुँचा दें), फिर धीरे-धीरे नेत्र को निकाल लें। इसके थोड़ी देर बाद स्नेह के लौट आने पर स्नेहवस्ति का क्रम उत्तम माना जाता है। वक्तव्य- उक्त पाठ के नीचे इस श्लोक को भी जोड़ना चाहिये—'भोजयेत् पयसा मात्रां यूषेणाथ रसेन वा। अनेन विधिना दद्यात् वस्तींस्त्रींश्चतुरोऽपि वा।।' (सु०चि०अ० ३७.११३)।

स्त्रियों में वस्ति-प्रयोग-विधि स्त्रीणां कनिष्ठिकास्थूलं नेत्रं कुर्याद् दशाङ्गुलम् ।। ६ ।। मुद्गप्रवेशयोग्यं च योन्यन्तश्चतुरङ्गुलम्। द्व्यङ्गुलं मूत्रमार्गे च सूक्ष्मं नेत्रं नियोजयेत् ।। ७ ।। स्त्रियों के लिए नेत्र दस अंगुल लम्बा तथा कनिष्ठिका अंगुली के समान मोटा होना चाहिये और इसका छिद्र मूँग के आने-जाने योग्य होना चाहिये। यह नेत्र योनि (भग) में चार अंगुल प्रविष्ट कराया जाता है और स्त्रियों के मूत्रमार्ग में सूक्ष्म नेत्र (जो प्रथम श्लोक द्वारा कहा गया है) केवल दो अंगुल प्रविष्ट कराया जाता है। वक्तव्य- मूत्रमार्ग में प्रयुक्त किये जाने वाले नेत्र में मूल से चार अंगुल पर कर्णिका बनानी चाहिये।