भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 279

सप्तमोऽध्यायः ] उत्तरवस्तिविधिः 243


बालकों में वस्ति-प्रयोग-विधि

मूत्रकृच्छ्रविकारेषु बालानां त्वेकमङ्गुलम् । शनैर्निष्कम्पमाधेयं सूक्ष्मं नेत्रं विचक्षणैः ।। 8 ।।

मूत्रकृच्छ्र आदि मूत्ररोगों में बालिकाओं के मूत्रमार्ग में केवल एक अंगुल नेत्र (जो उक्त मालतीपुष्पवृन्त से भी पतला हो) धीरे-धीरे कम्पनरहित प्रविष्ट कराना चाहिये।


विशेष मात्रा-निर्देश

योनिमार्गेषु नारीणां स्नेहमात्रा द्विपलिकी। मूत्रमार्गे पलोन्माना बालानां च द्विकार्षिकी ।। 9 ।।

स्त्रियों के योनिमार्ग में दी जाने वाली वस्ति में स्नेह की मात्रा दो पल (8 तोला) और मूत्रमार्ग द्वारा दी जाने वाली वस्ति में एक पल (4 तोला) की मात्रा दी जाती है और वही बालिकाओं के मूत्रमार्ग में दो कर्ष (2 तोला) दी जाता है।

वक्तव्य—बालिकाओं का गर्भमार्ग योनिच्छद से अवरुद्ध रहता है और गर्भाशय अपुष्ट रहता है, अतः उसमें वस्ति प्रयोग की सम्भवतः आवश्यकता ही नहीं पड़ती, किन्तु देखा जाता है कि दैवदुर्विपाक से बालिकाओं के भी योनिमार्ग में रोग हो जाते हैं। जैसे—श्वेतद्रव का बहना, माता-पिता के दोष से आतशक के व्रणों का हो जाना तथा कण्डू आदि का उत्पन्न होना। इन दशाओं में प्रक्षालन आदि की आवश्यकता अवश्य पड़ सकती है।


स्त्रियों में वस्ति-प्रयोग-विधि

उत्तानायै स्त्रियै दद्यादूर्ध्वजान्वै विचक्षणः । अप्रत्यागच्छति भिषग्वस्तावुत्तरसंज्ञिते ।। 10 ।। भूयो बस्तिं निदध्याच्च संयुक्तैः शोधनैर्गणैः। फलवर्तिं निदध्याद् वा योनिमार्गे दृढां भिषक् ।। 11 ।। सूत्रैर्विनिर्मितां स्निग्धां शोधनद्रव्यसंयुताम्। दह्यमाने तथा बस्तौ दद्याद् वस्तिं विशारदः ।। 12 ।। क्षीरिवृक्षकषायेण पयसा शीतलेन वा। वस्तिः शुक्ररुजः पुंसां स्त्रीणामात्तर्वजां रुजम् ।। 13 ।। हन्यादुत्तरवस्तिस्तु नोचितो मेहिनां क्वचित्।

स्त्री को लेटाकर तथा उसके जानुओं (घुटनों) को संकुचित कराकर (मोड़कर) विद्वान् चिकित्सक उत्तरवस्ति का प्रयोग करें। यदि एक मुहूर्त (दो घड़ी) तक उत्तरवस्ति द्वारा दिया गया स्नेह न निकले तो फिर चिकित्सक शोधन-द्रव्यों द्वारा प्रस्तुत की हुई निरूहण-वस्ति का प्रयोग करे अथवा योनिमार्ग में फलवर्त्ति का प्रयोग करें। यह फलवर्त्ति (बत्ती) सूत से या कपड़े से बनी हुई, स्नेह से स्निग्ध विरेचनीय स्नेह द्रव्यों से सनी हुई तथा दृढ़ होनी चाहिये। यदि वस्ति के प्रयोग से दाह उत्पन्न हो जाये तो विद्वान् चिकित्सक क्षीरिवृक्षों (बरगद, गूलर आदि) की छाल के क्वाथ से अथवा शीतल जल से वस्ति दें। उत्तर-वस्ति मनुष्यों के शुक्र सम्बन्धी रोगों को तथा स्त्रियों के आर्तव सम्बन्धी रोगों को नष्ट करती है, किन्तु प्रमेह से पीड़ित पुरुषों तथा स्त्रियों को कभी भी उचित नहीं है।

वक्तव्य—स्त्रियों में उत्तरवस्ति का प्रयोग पुरुष-चिकित्सक को कभी भी नहीं करना चाहिये, यह कार्य नर्स, दाई या लेडी-डाक्टर द्वारा ही कराना चाहिये। ग्रन्थकार ने जो यहाँ 'विचक्षणः' शब्द का प्रयोग किया है, वह केवल चिकित्सा-व्यवस्था देने तक के लिये ही है। परिचारक तथा परिचारिका के अपने-अपने स्वतन्त्र विभाग होते हैं, तदनुसार वे अपने विभागों का कार्य स्वयं किया करते हैं।


फलवर्त्ति-प्रयोग-विधि

'फलवर्त्तिं निदध्याद्वा शोधनद्रव्यसम्भृताम् । प्रवेशयेद् वा मतिमान् वस्तिद्वारमथैषणीम् ।। पीडयेद् वाप्यधोनाभेर्बलेनोत्तरमुष्टिना । आरग्वधस्य पत्रेषु निर्गुण्ड्याः स्वरसेषु च ।। कुर्याद् गोमूत्रपिष्टेषु वर्त्तीर्वापि ससैन्धवाः । मुद्गैलाः सर्षपसमाः प्रविभज्य वयांसि तु ।। वस्तेरागमनार्थाय ता निदध्याच्छलाकया। आगारधूमबृहतीपिप्पलीफलसैन्धवैः ।। कृता वा शुक्तगोमूत्रसुरापिष्टैः सनागरैः । अनुवासनसिद्धिं च वीक्ष्य कर्म प्रयोजयेत् ।।'

अर्थात् यदि मूत्रमार्ग में दी गयी वस्ति समय पर स्वयं न लौटे, तो वस्तिद्वार में या मूत्रमार्ग में शोधन-द्रव्यों (आरग्वधादि) द्वारा बनायी हुई 'फलवर्त्ति' का प्रयोग करें, अथवा एषणी (शलाका) का प्रयोग करें अथवा मुट्ठी से बलपूर्वक नाभि के नीचे (पेडू को) दबायें।

फलवर्त्ति-निर्माण-विधि—अमलतास के पत्तों को थोड़ा सेंधा नमक मिलाकर निर्गुण्डी के स्वरस तथा गोमूत्र में पीसकर मूँग, इलायची, सरसों जैसी बत्तियाँ बनाकर रोगी या रोगिणी के वयस् (बाल्य, यौवन तथा वार्द्धक्य) का विचार करके वस्ति-द्रव्य के लौटने के लिए सलाई की सहायता से मूत्रमार्ग में प्रवेश कराये अथवा गृहधूम, बनभण्टा के फल, पीपल, मैनफल, सेंधा नमक तथा सोंठ का सिरका, गोमूत्र तथा मद्य में पीसकर उक्त प्रकार की बत्तियाँ बनाकर उक्त प्रकार से मूत्रमार्ग में चढ़ाये। यह सब चिकित्सा-क्रम अनुवासन-वस्ति की सिद्धि (सफलता) को ध्यान में रखकर प्रयोग करना चाहिये।