शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
by भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished44 pages
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मेंढकको ले जाता है ॥५५॥ सम्पूर्ण मर्मस्थानोंके टूटने और शरीरके अवयवोंकी संधियां भग्न होनेसे जो दुःख मरनेवाले को होता है वह मुमुक्षुओंको स्मरण करना चाहिये, इसके स्मरण करने से संसारसे वैराग्य होकर आवागमनसे छूटनेके निमित्त नारायणके चरणोंमें ध्यान लगेगा ॥५६॥ यमदूतोंके दृष्टि आकर्षण करने और चेतना लुप्त हो जाने से कालपाशमें बन्धेका कोई रक्षक नही होता ॥५७॥ तब यह अज्ञानसे युक्त हो महत् चित्तमे प्रवेश होने से नही बोलता और जब भार्या पुत्रादि जातिके लोग पुकारते है तो उत्तर न देकर दीन नेत्रोंसे देखने लगता है ॥५८॥ तब इस जीवको लोहनिर्मित कालपाशसे यमदूत खैंचते है एक ओरसे बंधुओंका स्नेह खेचता है तब यह कुछ नही कर सकता, तटस्थरूपसे देखता है ॥५९॥ हिचकी बढने और श्वास रुकने तथा तालुके सूखने से उस मृत्युके पकड़े हुएका कोई आश्रय नही होता ॥६०॥ संसाररूपी चक्रमें आरूढ हुआ यमदूतोंसे घिरा कालफांसीमें बंधा महादुःखी हो मै कहा जाऊँ इस प्रकारसे वह जीव विचार करता है ॥६१॥ क्या करूं, कहां जाऊ, क्या ग्रहण करूं, क्या त्याग दूँ इस प्रकार चिन्तन करता कर्तव्यतासे मूढ हो शीघ्रही प्राणोंको त्यागता है ॥६२॥ मार्ग में यमदूतोंसे घसीटा हुआ यातनाकी देहमें प्राप्त होकर यहांसे जाकर जिन जिन यमयातनाओंका दुःख भोगता है उन्हे कहने को कौन समर्थ है ॥६३॥ जिस शरीरको केशर कस्तूरी चन्दन कपूर आदि लगाकर सदा भूषित किया था जिसे अनेक गहनोंसे शोभित और वस्त्रोंसे आच्छादित किया था ॥६४॥ वह शरीर प्राणवायुके निर्गत होतेही छूनेके अयोग्य और देखनेको भी अयोग्य हो जाता है फिर कोई इसको क्षणमात्र न रखकर घरसे निकौलने लगते है ॥६५॥ तब यह शरीर काष्ठसे जलाकर क्षणमात्रमें भस्म कर दिया जाता है (फूलबोझा जिन शिर न संभारे, तिनके अंग काठ बह डारे ! शिरपीडा जिनकी नहिं हेरी, करत कपाल क्रिया तिनकेरी) अथवा शृगाल गृध्र कुत्ते कौए इसको खाजाते है फिर यह करोडों जन्मतकभी दृष्टिगोचर नही होता है ॥६६॥ जादूगरके समान उत्पन्न जादूंसरीके इस जगतमे मेरी माता मेरा पिता मेरे गुरुजन मेरे स्वजन ऐसी कौन प्रतिज्ञा करता है? जीव केवल कर्मोको ही लेकर परलोक में जाता है, जैसे मार्गमें पथिकोंके विश्रामके लिये छायाका कोई वृक्ष आ जाता है, ऐसा ही यह मृत्युलोक है ॥६७॥ जिस प्रकारसे पक्षी संध्याकालमें वृक्षपर आकर बसेरा लेते है और प्रातःकाल उठकर एक दूसरे को त्याग अपने अभिलषित देशों मे चले जाते है इसी प्रकारसे जाति अजातिके पुरुषोंका समागम है, कर्मानुसार अपने कुटुम्बादिमें जन्म लेकर स्थित होते है, कर्म समाप्त होते ही अपनी गति को प्राप्त होते है । इससे मनुष्योंकौ उचित है किं, प्राणियोंके समागमको पथिक समाजके समान जाने, यथा (या दुनियामें आयके, छांड देइ तू ऐंठ । लेना है सो लेइले, उठी जात है पैठ ) ॥६८॥ मृत्युके बीजसे जन्म और जन्मके बीजसे मृत्यु होती है अर्थात जो उत्पन्न हुआ है उसका अवश्य नाश होगा और नाश हुआ अवश्य जन्म लेगा, यह प्राणी इसी प्रकार घटीयन्त्रकी समान निरंतर भ्रमण करता रहता है ॥६९॥ हे रामचन्द्र! गर्भके वीर्यके प्राप्त होनेसे इस प्रकारसे प्राणीका जन्म और मृत्यु होती है यह महाव्याधि है, जीवन मरण दोनों मेंही महादुःख होता है, इस व्याधि को दूर करनेके निमित्त मेरे सिवाय दूसरी औषधि नही (नान्यपंथाः विद्यते अयनायेति श्रुतेः) इस कारण मेरा भजन करना योग्य है ॥७०॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु० शिवराघवसंवादे पिण्डोत्पत्तिकथनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥८॥
अध्याय ९ श्रीभगवान बोले - हे राजन! तुम सावधान होकर सुनो, मै तुमसे देहका स्वरूप कहता हूँ, यह संसार मुझहीसे उत्पन्न होता है मुझही से धारण किया जाता है ॥१॥