शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
प्रस्तावना एवं रावण-वधार्थ राम-तपस्या
अध्याय १ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीसरस्वत्यै नमः ॥ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ ॐ अस्य श्रीशिवगीतामालामन्त्रस्य श्रीवेदव्यासरूप्यगस्त्यऋषिः ॥ जगतीच्छन्दः ॥ श्रीसदाशिवः परमात्मा देवता ॥ प्रणवे बीजम् ॥ सर्वव्यापक इति शक्तिः ॥ हीं कीलकम् ॥ ब्रह्मात्मसाक्षात्कारार्थे जपे विनियोगः ॥ अथ न्यासः ॥ ॐ श्रीवेदव्यासरूप्यगस्त्यऋषिः शिरसि ॥ ॐ जगतीच्छन्द मुखे ॥ ॐ श्रीसदाशिवः परमात्मादेवता हृदये ॥ ॐ प्रणवे बीजं नाभौ ॥ ॐ सर्वव्यापक इति शक्तिः गुह्ये ॥ ॐ हीं कीलकं पादयोः ॥ ॐ ह्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ॥ ॐ हीं तर्जनीभ्यां नमः ॥ ॐ हूं मध्यमाभ्यां नमः ॥ ॐ ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः ॥ ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥ ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ एवं हृदयादि ॥ दोहा-गौरि गिरीश गणेश रवि, शशि सहसानन राम । सबको वंदन करत हूं, सिद्ध होहि सब काम ॥१॥ सूतजी बोले हे शौनकादिको ! इसके उपरान्त अब मै शुद्ध और कैवल्यमुक्तिदायक संसारके दुःख छुड़ाने में औषधीरुप शिवगीतारत्नको शिवजीके अनुग्रहसे वर्णन करता हूँ ॥१॥ न कर्मो के अनुष्ठान न दान न तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है किन्तु ज्ञान से ही प्राप्त होता है ॥२॥ आगे शिवजी ने दण्डकवनमें रामचन्द्रको जो शिवगीता उपदेश की है वह गुप्तसे भी गुप्त है ॥३॥ जिसके श्रवण मात्र से ही मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है जो पूर्वकाल में स्कन्दजीने सनत्कुमार से वर्णन की थी ॥४॥ वह मुनिश्रेष्ठ सनत्कुमार व्यासजीसे कहते हुए व्यासजीने कृपाकरके वह हमसे वर्णन की ॥५॥ और कहा भी था कि, यह तुम गीता किसी को नही देना, हे सूतपुत्र! ऐसा वचन पालन न करने से देव क्षुभित हो शाप देते है ॥६॥ हे ब्राह्मणो! तब मैने भगवान् व्यासजी से पूछा हे भगवन् ! सब देवता क्यो क्षोभ करते और शाप देते है ॥७॥ उनकी इसमें क्या हानि है, जो वे देवता क्रोध करते है । यह सुनकर व्यासजी मुझसे बोले हे वत्स! तू अपने प्रश्न का उत्तर सुन ॥८॥ जो ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र करते और गृहस्थाश्रममें रहते है वही सब फलों के देनेहार देवताओं को कामधेनु है ॥९॥ भक्ष्य, भोज्य, पान करने योग्य, जो कुछ पर्वोमे यज्ञ किया गया है, सो हविद्वारा अग्निमें आहुती दी गई है, वह सब स्वर्ग में मिलती है ॥१०॥ देवताओंको स्वर्गमें इष्टसिद्धि देनेवाला और कुछ नही है जैसे गृहस्थी पुरुषों को दुही गई गाय ले जाने से केवल दुःखी होता है ॥११॥ इसी प्रकार ज्ञानवान ब्राह्मण देवताओंको दुःखदाता ही है कारण कि, वह कर्म नही करता इस कारण इसके विषय भार्या पुत्रादि में प्रवेश करके देवता विघ्न करते हैं ॥१२॥ इससे किसी देहधारीकी शिवमें भक्ति नही होती इस कारण मूर्खोंको शिवका प्रसाद नही मिलता ॥१३॥ और जो यथाकथञ्चित जानता भी है वह किसी कारण मध्यें ही खंडित हो जाता है और जो किसीको ज्ञान हुआ भी तो वह विश्वास नही भजता ॥१४॥ ऋषय ऊचुः । ऋषि बोले जब इस प्रकारसे देवता शरीरधारियों को विघ्न करते है तो फिर इसमें किसका पराक्रम है जो मुक्तिको प्राप्त होता है ॥१५॥ हे सूतपुत्र ! आप सत्य कहिये कि, उनका उपाय है या नही है ॥सूतजी बोले करोड जन्मके पुण्यसंचय होने से शिवमें भक्ति उत्पन्न होती है ॥१६॥ उस भक्ति के होनेसे इष्टपूर्तादि कर्मोकी कामना छोड़कर मनुष्य शिवजीमे अर्पण बुद्धिसे यथाविधि कर्म करता है ॥१७॥ उन शिवजीकी कृपा से जब यह प्राणी दृढ भक्तिमान होता है, तब विघ्न छोड़कर भयभीत हो देवता चले जाते है ॥१८॥
उस भक्तिके करनेसे शिवजीके चरित्र श्रवण करनेकी अभिलाषा उत्पन्न होती है, सुननेसे ज्ञान और ज्ञानसे मुक्ति हो जाती है ॥१९॥ बहुत कहनेसे क्या है, जिसकी शिवजी में दृढ भक्ति है वह करोड़ो पापोसे ग्रसा हो तो भी मुक्त हो जाता है ॥२०॥ अनादरसे, मूर्खतासे, परिहाससे, कपटतासे भी जो मनुष्य शिवभक्तिमें तत्पर है वह अन्त्यज (चांडाल) भी मुक्त हो जाता है ॥२१॥ इस प्रकारसे भक्ति सदा सबके करने योग्य है, इस भक्ति के होतेभी जो मनुष्य संसार से न छूटै ॥२२॥ उस संसारबंधनसे न छूटनेवाले की समान दूसरा कोई भी मूर्ख नही और कुछ शिवजी भक्तिसे ही प्रसन्न नही होते जो नियमसे केवल भक्ति या द्रोहही करते है ॥२३॥ उनपरभी प्रसन्न हो शिव मनवांछित फलप्रदान करते है बडे मोलकी वस्तु कुछ लेकर वा अल्प मोलकी वस्तु अथवा केवल जलही लेकर ॥२४॥ जो नियमसे शिवार्पण करते है, शिवजी प्रसन्न हो उसे त्रैलोक्य देते है, और जो यह न हो सके तो नियम से नमस्कार वा प्रदक्षिणाः ॥२५॥ जो नित्यप्रति शिवजी की करता है, उसके ऊपर भी शिवजी प्रसन्न होते है, और जो प्रदक्षिणा में असमर्थ हो केवल मन में ही शिवजी का ध्यान करे ॥२६॥ चलते बैठते में जो उनका स्मरण करे उसकी भी अभीष्ट पदार्थ प्रदान करते है, चन्दन बेलकाष्ठ तथा वनमें उत्पन्न हुए ॥२७॥ फल जिसके अधिक प्रीति करनेवाले है उस शिवजी की सेवा करनेमें त्रिलोकी में कौन वस्तु दुर्लभ है ? ॥२८॥ वनके उत्पन्न हुए फल मूलादिमें शिवजीकी जैसी प्रीति है वैसी ग्राम नगरके उत्पन्न हुए उत्तम उत्तम फल मूलोंमें नही ॥२९॥ जो ऐसे देवताको छोड़कर अन्य देवताका भजन सेवन करता है, वह मानो गंगा का त्याग करके मृगतृष्णाकी इच्छा करता है ३०॥ परन्तु जिनको करोड़ो जन्मों के पाप चिपट रहे है, उनका चित्त अज्ञान अंधकार से आच्छादित हो रहा है, उनको शिवजी की भक्ति प्रकाशित नही होती ॥३१॥ काल देश स्थल का कुछ नियम नही है जहाँ इसका चित्त रमें वही ध्यान करे ॥३२॥ शिवरूपसे अपने आत्मामें ध्यान करनेसे शिवकी ही मुक्ति को प्राप्त हो जाती है, जिसकी आयु बहुत थोड़ी लक्ष्मी से भी हीन हो और शिवजीकी एक अंशरूपि सार्वभौमपदयुक्त ॥३३॥ 'मैं राजा हूं' ऐसे अभिमान से कहनेवाले को वंशसहित संहार करते है । जो सम्पूर्ण लोकका कर्ता तथा अक्षय ऐश्वर्यवान पुरुषभी ॥३४॥ अभिमारहित हो जो 'शिवः शिवोहं' इस प्रकार से कथन करता है उसको शिव आत्मस्वरूपके तादात्म्यभोगी अर्थात् शिवरूपही कर देते है ॥३५॥ हे ऋषियो! जिस व्रतके करने से प्राणीके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह चारों पदार्थों हस्तगत होते है मै वह पाशुपत व्रत तुमसे वर्णन करता हूँ ॥३६॥ विरजानामक दीक्षाको करके विभूति और रुद्राक्षको धारण कर वेदसारनामक शिवसहस्त्रनामको जप करते हुए ॥३७॥ इस मानव शरीरको त्यागकर शैवशरीर को प्राप्त होने पर लोकको कल्याण करनेहारे शंकर प्रसन्न होकर ॥३८॥ तुमको दर्शन देकर कैवल्य मुक्ति देंगे जब रामचन्द्र दण्डकारण्यमें वास करते थे, तब अगस्त्यजीने उन्हे वह उपदेश दिया था ॥३९॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे शिवभक्त्युत्कर्षनिरूपणं नाम प्रथमोऽध्यायैः ॥१॥ वह मैं सब तुमासे कहता हूँ, तुम भक्तियुक्त हो श्रवण करो ॥४०॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे अगस्त्यराघवसंवादोपक्रमे भाषाटीकायां
प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
अध्याय २ ऋषि बोले। अगस्त्यजी रामचन्द्रके निकट क्यों आये थे उर किस प्रकार से रामचन्द्रसे विरजा दीक्षा कराई थी इससे रामचंद्रको किस फलकी प्राप्ति हुई सो आप हमसे कहिये ॥१॥ सूत उवाच । सूतजी बोले जिस समय जनककुमारी सीताको रावणने हरण किया था तब रामचन्द्रने वियोगके कारण बहुत विलाप किया ॥२॥ निद्रा देहाभिमान और भोजन त्यागकर रातदिन शोक करते भाईसहित रामचन्द्रने प्राण त्याग करनेकी इच्छा की ॥३॥ अगस्त्यजी यह बात जानकर रामचंद्रजी के समीप आये और मुनिने रामचन्द्रको संसारकी असारता समझाई ॥४॥ अगस्त्य उवाच । अगस्त्यजी बोले- हे राजेन्द्र! यह क्या विषाद करते हो, स्त्री किसकी इसका विचार तो करो पृथ्वी, आप, तेज, वायु और आकाश इन पांच महाभूतों का बना हुआ यह देह जड है इसको ज्ञान नही होता ॥५॥ और आत्मा तो निर्लेप सर्वत्र परिपूर्ण सच्चिदानन्दस्वरूप है आत्मा न कभी उत्पन्न होता न मरता दुःख भोगता है ॥६॥ जिस प्रकार यह सूर्य संपूर्ण संसारके चक्षुरूप से स्थित है और चक्षुओंके दोषसे कभी लिप्त नही होता ॥७॥ इसी प्रकार सम्पूर्ण भूतों का आत्माभी दुःखमें लिप्त नही होता और यह देहभी मलका पिंड तथा जड है यह जीव कलारहित होने से जडै है ॥८॥ यह काष्ठ अग्निके संयोगसे भस्म हो जाता है, सियार आदि इसको खाजाते है, तौ भी नही जानता कि उसके वियोग में क्या दुःख होता है ॥९॥ जिसका सुवर्णके समान गौरवर्ण, अथवा दूर्वादलके समान श्याम स्वरूप है, कुचकलश जिसके उन्नत है, मध्यभाग सूक्ष्म है ॥१०॥ बडे नितम्ब और जांघोवाली चरणतल जिसका कमलके सदृश रक्तवर्ण है जिसका मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान है और पके बिम्बा फलके समान जिसके अधरोष्ठ है ॥११॥ नील कमलकी समान जिसके विशाल नेत्र है, मत्त कोकिलाकी समान जिसके वचन और मत्त हाथीकी समान जिसकी चाल है ॥१२॥ ऐसी स्त्री कामदेवकि बाणकी समान कटाक्षोंस मेरे ऊपर कृपा करती है इस प्रकारसे जो मूर्ख मानता है वही कामका शिष्य है ॥१३॥ हे राजन! सावधान होकर सुनो मैं इसका विवेक कथन करता हुं यह जीव स्त्री पुरुष या नपुंसक नही है ॥१४॥ यह देही मूर्तिरहित सब देहों में स्थित रूपरहित सर्वव्यापी सबका साक्षी देहमें स्थित हो प्राणीको सजीव करनेवाला है जिसको सूक्ष्मांगी सुकुमार बाला कहते है वह एक मलका पिंड और जडस्वरूप है ॥१५॥ वह न कुछ देखती न सुनती न सूंघती है जिसका शरीर चर्ममात्रका है हे रामचंद्र ! बुद्धिसे विचारो और छोडो ॥१६॥ जो प्राणोंसे भी अधिक प्यारी है वही सीता तुम्हारे दुःखका कारण होगी । पंच महाभूतोंसे उत्पन्न होनेके कारण पांचभौतिक देह उत्पन्न होते है ॥१७॥ परन्तु उन सबमें आत्मा एक परिपूर्ण सनातन है इस विचार से कौन स्त्री कौन पुरुष सब ही सहोदर है ॥१८॥ जिस प्रकार अनेक गृह निर्माण करनेमें आकाश अबच्छिन्नताको प्राप्त होता है अर्थात उन सबमें मिल जाता है पश्चात
उन घरों के जल जानेपर कुछ हानि को भी प्राप्त नही होता ॥१९॥ इसी प्रकार देहोंमें आत्मा परिपूर्ण और सनातन है देहसम्बन्धसे अनेक प्रकारका प्रतीत होता है परन्तु उनके नाश होने पर आत्मा नष्ट नही होता, वह एकरूप है ॥२०॥ जो मारनेवाला जानता है मैने मारा जो मरनेवाला जानता है मै मरा यह दोनों न जानने से मूर्ख है, कारण कि न यह मारता है और न वह मारा जाता है ॥२१॥ हे राम! इस कारण अतिदुःख करनेसे खेदका कारण क्या है अपना स्वरूप इस प्रकार जानकर दुःखको त्याग कर सुखी हो ॥२२॥ श्रीरामचंद्र बोले हे मुने! जब देहको भी दुःख नही होता और परमात्मा को भी दुःख नही होता है, तो सीताके वियोग की अग्नि मुझे कैसे भस्म करती है ॥२३॥ जो वस्तु सदा अनुभव करी जाती है तुम कहते हो कि वह नही है । हे मुनिश्रेष्ठ! फिर इस बातमें मुझे कैसा विश्वास हो ॥२४॥ जब सुख दुःखको भोक्ता जीव नही है, तौ कौन है? जिसके द्वारा प्राणी दुःखी होता है, सुखदुःख को भोक्ता कौन है हे मुनिश्रेष्ठ! कहिये ॥२५॥ अगस्त्य उवाच । अगस्त्यजी बोले शिवजी की माया कठिनतासे जानने योग्य है । जिसने जगत को मोह लिया है उस मायाको तो प्रकृति जानो और मायावाला महेश्वरको जानो ॥२६॥ उसीके अवयवरूप जीवोंसे सम्पूर्ण जगत व्याप्त है, वह महेश्वर सत्यस्वरूप ज्ञानस्वरूप अनन्त और सर्वव्यापी है ॥२७॥ उसीका वंश जीवलोकमें सब प्राणियों के हृदयमें स्थित हुआ है जिस प्रकार से काष्ठ के योगसे अग्निमें स्फुलिंग उठते है इसी प्रकार जीवभी ऐसा परमात्मासे होता है ॥२८॥ यह ईश्वरांश जीव अनादिकालके कर्मबंधनपाशमें बंधे है यह अनादि वासनाओंसे युक्त है और क्षेत्रज्ञ कहलाते है ॥२९॥ मन बुद्धि चित अहंकार यह चारों अन्तःकरण के ही भेद है । इस अन्तःकरण चतुष्टयमें क्षेत्रज्ञों का प्रतिबिम्ब पडता है ॥३०॥ वही जीवपनको प्राप्त होकर कर्मफलके भोक्ता हुए है, वही जीव कर्म भोगने के स्थान देहों को प्राप्त होकर विषय सेवन करने से सुख वा दुःख भोग करते है ॥३१॥ स्थावर जंगमके भेद से दो प्रकार का शरीर कहा जाता है ॥३२॥ वृक्ष, लता, गुल्म, यह स्थावर सूक्ष्म देह कहलाते है, और अण्डज, पक्षी, सर्प इत्यादि, स्वेदज, कृमि, मँशकादि, जरायुज, मनुष्य गौ ओदि, यह जंगम शरीर कहलाते है ॥३३॥ कितने एक प्राणी शरीर धार के निमित्त कर्मानुसार योनियों में प्रवेश करते है और दूसरे वृक्षों का आश्रय करते है ॥३४॥ जब यह जीव विषयोंमें लिप्त होता है तब मैं सुखी हूं दुःखी हूं ऐसा मानता है, यद्यपि यह निर्लेप ज्योतिःस्वरूप है परन्तु शिवजीकी माया से मोहित सुख दुःखका अभिमानी होती है ॥३५॥ काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य और मोह यह छः महाशत्रु अहंकार से उत्पन्न होते है ॥३६॥ यही अहंकार स्वप्न और जाग्रत अवस्था में जीवको दुःख देता है और सुषुप्तिमें सूक्ष्मरूप के होने और अहंकार के अभाव से यह जीव शंकरता (आनन्दरूप) को प्राप्त होता है ॥३७॥ इस प्रकार यह माया में मिलने से सुख दुःखका कारण उत्पन्न करता है जिस प्रकार सूर्य की किरणों के पडने से सीपी में चांदी भासती है इसी प्रकार शिवस्वरूप में माया से विश्व दीखता है ॥३८॥ इस कारण तत्त्वज्ञानसे तो कोई भी दुःखभागी नही है । इससे हे राम! तुम दुःखको त्याग वृथा क्यो दुःखी होते हो? ॥ ३९॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचंद्र बोले, हे मुनिराज! जो तुमने मेरे सन्मुख कहा है, यह सब सत्य है तथापि भयंकर प्रारब्धदैवका दुःख मुझे नही छोड़ता है ॥४०॥
जिस प्रकार मद्य प्राणीको मत्त कर देता है इसी प्रकार अज्ञानहीन तत्त्वज्ञानयुक्त ब्राह्मणको भी प्रारब्धकर्म नही छोड़ता ॥४१॥ बहुत कहने से क्या है यह काम प्रारब्ध का मन्त्री है, यह मुझको दिनरात पीड़ा देता है और इसी प्रकारसे अहंकार भी दुःख देता है ॥४२॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे अगस्त्यराघवसंवादे वैराग्योपदेशोनाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ जीव अत्यन्त पीडित होकर स्थूल देह को त्याग करता है । इस कारण हे ब्राह्मण! मेरे जीवन के निमित्त उपाय करो ॥४३॥ इति श्रीप० शिवगीतासू० ब्रह्मवि० यो० अगस्त्यराघवसंवादे भाषाटीकायां वैराग्योपदेशो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
अध्याय ३ अगस्त्यजी बोले कामक्रोधादिसे पीडित हो मनुष्य हितकारी वचन नही सुनता, उसको हितकारी वचन ऐसे अच्छे नही लगते जैसे मरणशीलको औषधि अच्छी नही लगती ॥१॥ जिस सीता को मायावी दैत्य सागरके बीचमें ले गया है, हे राम! वह तुम्हारे निकट अब किस प्रकारसे आ सकती है ॥ २॥ जिसके द्वारपर वानरोंके यूथोंके समान सब देवता बांध लिये गये है । देवताओंकी स्त्री जिसके यहां चमर ढोरती है ॥३॥ जो शिवजी के वर से गर्वित हो सम्पूर्ण त्रिलोकी को भोगता है और भय से रहित है उसे तुम कैसे जीतोगे ॥४॥ इन्द्रजित भी उसका पुत्र शिव के वरदान से गर्वित है उसके आगे से देवता संग्राम में बहुतबार भाग गये है ॥५॥ देवताओं को भय देनेवाला जिसका भाई कुम्भकर्ण बड़ा भयंकर है और अनेक प्रकार दिव्यास्त्र धारण करनेवाला चिरंजीवी विभीषण है ॥६॥ देव और दानवोंको दुर्गम जिसका लंकानाम दुर्ग है, और करोड़ो जिसके यहां चतुरंगिणी सेना है ॥७॥ हे राजन! फिर अकेले तुम उसे कैसे जीतोगे, तुम्हारी यह बात ऐसी है, कि जैसे कोई बालक चन्द्रमाको हाथसे लेना चाहे इसी प्रकार तुम काम से मोहित होकर उसके जीतने की इच्छा करते हो ॥८॥ श्रीरामचन्द्रजी बोले हे मुनिश्रेष्ठ! मै क्षत्रिय हूं और मेरी भार्या राक्षसने हरण कर ली है, जो मै उसे न मारूंगा तौ मेरे जीने से क्या फल है ॥९॥ इस कारण तुम्हारे तत्वबोधसे मुझे कुछभी प्रयोजन नही है, यह कामक्रोधादिक मेरे शरीरको भस्म किये डालते है ॥१०॥ और अपनी प्रियाके हरण होने और शत्रुसे पराभव होनेसे अहंकारभी नित्य और मेरे जीवनको हरण करनेको उद्यत है ॥ ११॥ हे मुनिश्रेष्ठ! जिसको तत्त्वज्ञान की इच्छा हो वह लोकके पुरुषों में नीच है । इस कारण सागर लंघकर युद्धमे उसके मारने के उपायको आप कहिये आपसे श्रेष्ठ और कोई मेरा गुरु नही ॥१२॥ अगस्त्य उवाच ॥ अगस्त्यजी बोले । जो ऐसी इच्छा है, तो पार्वतीके पति शिव अविनाशी की शरण में जाओ, वह भगवान प्रसन्न होकर तुमको मन वांछित फल देंगे ॥१३॥ इन्द्रादि देवता हरि और ब्रह्माभी जिसको नही जीतसके वह शिवजीके अनुग्रह बिना तुमसे कैसा मारा जायगा ॥१४॥ इस कारण विरजामार्गसे मै तुमको दीक्षा देता हूँ इस मार्ग से तुम मनुष्यपन छोड़कर तेजोमय हो जाओगे ॥१५॥ जिसके प्रतापसे युद्धमे शत्रुओंको मारकर सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त हो जाओगे और सम्पूर्ण धरामंडलको भोगकर अन्तमें शिवलोकको जाओगे ॥१६॥
सूत उवाच । सूतजी बोले, तब रामचन्द्रजी मुनिश्रेष्ठको दंडवत प्रणाम करके दुःख त्याग प्रसन्नमन हो बोले ॥१७॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचन्द्रजी बोले - हे मुने ! मै कृतार्थ हो गया, मेरे कार्य सिद्ध होगये जब समुद्र पीनेवाले आप मेरे ऊपर प्रसन्न हो तो मुझे क्या दुर्लभ है । इस कारण हे मुनिश्रेष्ठ! आप मुझसे विरजादीक्षाकी विधि कहिये ॥१८॥ अगस्त्य उवाच । अगस्त्यजी बोले, शुक्लपक्षकी चौदस अष्टमी वा एकादशी सोमवार अथवा आर्द्रा नक्षत्रमें यह कार्य आरंभ करना ॥१९॥ जिनको वायुश्रेष्ठ, रुद्र, अग्नि, परमेश्वर, निरंतर जगत के नियंता सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मादिकोंसे भी परे शिव कहते है ॥ २०॥ जो ब्रह्मा, विष्णु, अग्नि, वायु इनके भी उत्पन्न करनेवाले है इस प्रकार सदाशिवका ध्यान करके, अग्निबीजसे गार्हाग्निका ध्यान कर देह उत्पत्तिके कारणभूत, जो पंचमहाभूत है, वह वायुबीजसे पृथक है, इस प्रकार भावना करके ॥२१॥ उन महाभूतों के गुणका क्रमसे ध्यान करे कि, गार्हाग्निसे दग्ध होनेवाली भावना करावै, उसका प्रकार-मात्रा अर्थात पंच महाभूतोंके गुण- रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, और शब्द यह पांच है पृथ्वीमेम पांचही गुण रहते है, जलमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस यह चार तेज में शब्द, स्पर्श, रूप यह तीन, वायु मे शब्द और स्पर्श यह दो और आकाश मे शब्द यह एक ही गुण है । इसकी उत्पत्तिका क्रम आकाशसे वायु, वायुसे तेज, तेजसे जल, जलसे पृथ्वी उत्पन्न होती है और इससे विपरीत अर्थात् पृथ्वी जलमे, जल तेजमें, तेज वायुमें, वायु आकाशमें लय हो जाता है अधिक अधिक गुण के भूत न्यून न्यून गुणवाले भूतों मे लय हो जाते है, और इन सबकी अमात्रा जिसका गुण नही, उन अहंकारादिकोंको लय करे अर्थात् पंचमहाभूतोंको अहंकारमें, अहंकारका महत्तत्वमें, महत्तत्वका मायामें, मायाका सबके आधारभूत, परमात्मामें लय करे फिर अमृतबीजसे लयके विपरीत क्रम करके यह देहोत्पत्ति विषयमें प्रवृत्त है ऐसी भावना करके मै दिव्यदेह हूं और पूर्वदेहके उत्पन्न करने हारे सब गुण और द्रव्यका अग्निबीजसे दाह करके उसका परमात्मा मे लयकरके अमृतबीजसे पुनरुज्जीवन करके यह देह अमृत और दिव्य है, ऐसी भावना करै । इस प्रकार भूतशुद्धि करके पाशुपतव्रतका आरंभ करै ॥२२॥२३॥ फिर प्रातःकालही मै पाशुपतव्रतको करूंगा ऐसा संक्षेपसे संकल्प करके अपनी शाखा तथा गृह्यसूत्र से अग्नि स्थापन करे ॥२४॥ उसी दिन व्रत रखकर पवित्र हो श्वेतवस्त्र धारण करे शुक्ल यज्ञोपवीत और शुक्लमाला पहरे ॥२५॥ अन्तःकरण एकाग्र कर (प्राणापानव्यानोदानसमाना मे शुद्ध्यन्ताम् तथा (ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा) इत्यादि विराजामंत्रके अनुवाकपर्यरन्त समिधा आज्य और चरुसे हवन करै ॥२६॥ हवनके अनन्तर (यातेअग्नियज्ञियातनूः) इस मंत्रसे अग्नि कोआत्मामें आरोपण करके अग्निके भस्मको (अग्निरिति भस्म इत्यादि) मंत्रोसे अभिमंत्रित कर ललाटादि अंगोंमें धारण करे ॥२७॥ जिस ब्राह्मणके शरीरमें भस्म लगी होती है । वह महापातकोसे भी छूट जाता है इसमें संदेह नही ॥२८॥ जिस कारणसे कि, भस्म अग्नि का वीर्य है, मै भी अग्नीवीर्यके धारण करनेसे बलवान हो जाऊंगा ॥ इस प्रकार जो नित्य भस्म स्नान करता तथा जितेन्द्रिय हो, भस्मपर शयन करता है ॥२९॥ वह सब पाप से मुक्त होकर शिवलोकको प्राप्त होता है, हे राजन ! तुम इस प्रकार करो और शिवसहस्त्रनाम मै तुमको देता हूं इससे तुम्हारे सब मनोरथ पूर्ण होंगे ॥३०॥ सूत उवाच । सूतजी बोले, ऐसा कहकर अगस्त्यजीने रामचन्द्रका शिवसहस्त्रनामका उपदेश किया ॥३१॥ जो कि सब वेदोंको सार है, जो शिवजीका प्रत्यक्ष करनेवाला है उसको देकर अगस्त्यजी ने कहा हे राम! तुम इसे दिनरात जपो ॥३२॥ तब भगवान शिवजी प्रसन्न होकर पाशुपत अस्त्र तुमको देंगे, जिससे तुम शत्रुओं को मारकर प्रियाको प्राप्त होगे ॥३३॥ उसी अस्त्र के प्रभावसे सागर को शोष सकोगे संहार कालमें शिवजी इसी ही अस्त्र से जगतको संहार करते है ॥३४॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे अगस्त्यराघवसंवादे विरजादीक्षा निरुपणं नाम
तृतीयाऽध्यायः ॥३॥ उसके बिना पाये दानवोंसे जय पाना बडा दुर्लभ है । इस कारण इस अस्त्रके पानेके निमित्त शिवजीकी शरण जाओ ॥ ३५॥ इति श्रीपद्मपुराणे० अगस्त्यराघवसंवादे शिवगीताभाषाटीकायां तृतीयोध्यायः ॥३॥
अध्याय ४ सूतजी बोले – अगस्त्यजी जब ऐसा कहकर आश्रम को चले गये तब रामगिरिके ऊपर गोदावरीके पवित्र आश्रममें रामचन्द्र ॥१॥ शिवलिंग का स्थापन कर अगस्त्यजीके उपदेशानुसार विरजादीक्षा ले सर्वांग में विभूति लगाय रुद्राक्ष के आभरण पहर ॥ २॥ शिवलिंगको गोदावरीके पवित्र जलोंसे अभिषेकित कर वन के उत्पन्न हुए फूलों और फूलों से उनका पूजन कर ॥३॥ भस्म लगाये भस्मपरही शयन करते व्याघ्रचर्म के आसनपर बैठे रातदिन अनन्य बुद्धिकर शिवसहस्त्रनाम जपने लगे ॥ ४॥ एक महीने तक फलाहार, एक महीने तक पात्तों का भोजन, एक महीना जलपान और एक महीना पवन को आहार करे ॥५॥ शान्त अन्तःकरण, इन्द्रियोंको जीते, प्रसन्न मन, महेश्वर का ध्यान किये, हृदयकमलमें विराजमान, अर्द्धांग में पार्वतीको धारण किये ॥६॥ चार भुजा तीन नेत्र बिजली के समान पीली जटा धारे करोड़ो सूर्यके समान प्रकाशमान कोटि चन्द्रमाके समान शीतल ॥ ७॥ सम्पूर्ण गहने पहरे सर्पोंका यज्ञोपवीत व्याघ्रचर्म ओढे भक्तों के अभयदाता वरदायक मुद्रा धारे ॥८॥ व्याघ्रचर्मका ही उत्तरीय (दुपट्टा) ओढे, देवता और असुरोंसे नमस्कार पाये, पंचमुख चन्द्रमा मस्तकपर धारे, त्रिशूल और डमरू लिये ॥९॥ नित्य अविनाशी शुद्ध अक्षय निर्विकार एकरूप, शिवजीका इस प्रकार नित्य ध्यान करते चार महीने बीत गये ॥१०॥ तब प्रलयकालिक समुद्रके समान भयंकर शब्द प्रगट हुआ, जिस प्रकारसे समुद्र मंथनके समय मंदराचलके बिलोनेसे ध्वनि उठी थी ॥११॥ त्रिपुरासुरके जलानेके समय शिवजीके बाणकि अग्निके समान भयंकर महाशब्द सुनकर रामचंद्र चकित हो जबतक गोदावरीके तटोंकी ओर दृष्टि करते हैं ॥१२॥ तबतक भयंकर महातेजःपुञ्ज विप्र रामचन्द्रके आगे उपस्थित हुआ, उसी तेजसे चकित हो रामचंद्रको दशोंदिशा न सूझी ॥१३॥ हे द्विजश्रेष्ठ! आँखे मिच जानेसे राजकुमार मोहको प्राप्त हो गये और विचार करके जाना कि यह दैत्योंकी माया है ॥ १४॥ फिर वह महावीर उठकर और अपने बडे धनुष्यको चढाकर तथा दिव्य मन्त्रोंसे अभिमन्त्रितकर तीक्ष्ण बाणोंपर दृष्टि करने लगे ॥१५॥ आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, सोमास्त्र, मोहनास्त्र, सूर्यास्त्र, पर्वतास्त्र, सुदर्शनास्त्र, महाचक्र, कालचक्र, वैष्णवास्त्र ॥ १६॥ रुद्रास्त्र, पाशुपतास्त्र, ब्रह्मास्त्र, कुबेरास्त्र, वज्रास्त्र, वायवास्त्र और परशुरामास्त्र इत्यादि अनेक मन्त्रोंका रामने प्रयोग किया ॥१७॥ परन्तु उस महातेजमें वे रामचन्द्रके अस्त्र और शस्त्र इस प्रकार लीन हो गये जैसे समुद्रमें पत्थर और ओले मग्न हो
जाते है ॥१८॥ तब एक क्षणमात्रमें धनुष जलकर रामचन्द्रके हाथसे गिरा फिर तरकस अंगुलित्राण (जो अंगुलियोंमें पहनते है) गोधा जो प्रत्यञ्चाके आघातसे रक्षा करता है (यह चर्मके बने होते है) जलकर गिर पडे ॥१९॥ यह देखकर लक्ष्मण भयभीत और मूर्छित हो पृथ्वीमें गिरे और रामचन्द्र भी निस्तब्ध हो केवल घुटनेसे पृथ्वी में बैठ गये ॥२०॥ और आँखे मीचे भयभीत हो शंकरकी शरण को प्राप्त हुए और ऊँचे स्वरसे शिवसहस्त्रनामका जप करने लगे ॥२१॥ और शिवजीको पृथ्वीमें दण्डप्रणाम बारम्बार किया, फिरभी प्रथमकी समान दिङ्मण्डलको शब्दायमान करनेवाला शब्द हुआ ॥२२॥ उस घोर शब्दसे पृथ्वी चलायमान और पर्वत कंपित हुए तब फिर क्षणमात्रमें वह तेज चंद्रमाके समान शीतल हुआ ॥२३॥ जितनेमें रामचंद्र नेत्र खोलकर देखते है तब तक ही उन्होने संपूर्ण भूषण धारण किये वृषभ का दर्शन किया ॥२४॥ जिसका रंग अमृतके मंथनेसे उत्पन्न हुए मक्खनके पिंडकी नाई श्वेत है, जिसके श्रृंगाग्रमें सुवर्णमें बंधी मरकत मणि शोभित होती है ॥२५॥ नीलमणिके समान नेत्र ह्रस्वकण्ठसामासे भूषित रत्नोंकी खोगीर से शोभित जो कि श्वेत चामरों से युक्त है ॥२६॥ घरघर शब्दवाली घंटिकाओंसे दशों दिशाओंको पूर्ण करते हुए वृषभपर चढे स्फटिक मणि के समान शुभ्रकांति महादेवजी ॥२७॥ जो कि, करोड़ों सूर्यकी समान प्रकाशमान, करोड़ों चन्द्रमाओंके समान शीतल, व्याघ्र चर्मका वस्त्रधारे, नागोंका यज्ञोपवीत पहरे ॥२८॥ सम्पूर्ण अलंकारोंसे युक्त, बिजलीकी समान पीली जटा धारे, नीलकण्ठ, व्याघ्रका चर्म ओढे, चन्द्रमा मस्तकपर विराजमान ॥२९॥ अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे युक्त, दश बाहु, तीन नेत्र, युवावस्था पुरुषोंमें श्रेष्ठ, सच्चिदानन्दस्वरूप ॥३०॥ तथा निकट बैठी हुई पूर्ण चन्द्रमुखी, नीलकमल के समान अथवा मरकत मणिके समान सुन्दर शरीरवाली ॥३१॥ मोतियोंके आभरणोंसे युक्त, तारोंसे युक्त रात्रिकी, समान शोभित तथा विन्ध्यपर्वतकी समान ऊँचे स्तनभार से नम्र ॥ ३२॥ है वा नहीं ऐसे संदिग्ध मध्यभाग में सुन्दर है वस्त्र जिसका और दिव्य आभूषणोंसे युक्त कस्तूरी आदि दिव्य सुगन्ध लगाये ॥३३॥ दिव्य माला धारे, नील कमलके समान नेत्र, टेढे केशोंसे शोभित मुखमें ताम्बूल खाने से शोभित अधरोष्ठवाली ॥३४॥ शिवजीके आलिंगनसे उत्पन्न हुए रोमांच शरीरवाली सच्चिदानन्द रूप त्रिलोकीकी माता ॥३५॥ सब सुन्दर पदार्थोंके सारकी मूर्तिमान पात्र पार्वतीको रामचन्द्रने देखा । इसी प्रकार अपने २ वाहनपर चढ़े आयुध हाथमें लिये ॥३६॥ बृहद्रथन्तरादि सामगायन करते अपनी २ स्त्रियोंसे युक्त इन्द्रादि दिक्पालोंसे सेवित ॥३७॥ और सबसे आगे गरुडपर चढे, शंख, चक्र, गदा और पद्म धारे, नील मेघके समान शरीरधारी, बिजलीके समान कान्तिमान, लक्ष्मीसे युक्त ॥३८॥ एकाग्र चित्तसे रुद्राध्यायका पाठ करते हुए जनार्दन और पीछे हंसपर चढे हुए चतुर्मुख ब्रह्माजी ॥३९॥ चारो मुखों से ऋक यजुः साम और अथर्व इन चारो वेद तथा रुद्रसूक्तका जप करते बड़ी दाढी और जटा धारण किये सरस्वती सहित महेश्वरकी स्तुति करते ॥४०॥ इसी प्रकार अथर्वशीर्ष के मंत्रो से स्तुति करते हुए मुनिमन्डल और गंगादि नदियोंसे युक्त नीलवर्ण सागर ॥४१॥ श्वेताश्वतर के मंत्रोसे शिवजीको स्तुति करते कैलास पर्वतके समान अनन्तादि महानाग ॥४२॥ रत्नोंसे विभूषित कैवल्य उपनिषद् पाठ करनेहारे स्तुति कर रहे है और सुवर्णकी छड़ी हाथमें लिये नंदीके आगे स्थित हुए ॥४३॥
१. अध्याय १-४: पाशुपत व्रत, राम-शिव संवाद व आत्म-विद्या
दक्षिणकी ओर पर्वतके समान मुषकपर चढ़े गणेशजी और उत्तरकी ओर मयूर पर चढ़े कार्तिकेय ॥४४॥ महाकाल और चण्डेश्वर पार्षदगण सेनानायक भयंकर मूर्ति धारे इधर उधर स्थित दावाग्नि की समान दीप्तिमान दुर स्थित कालाग्नि रुद्र ॥४५॥ तीन चरण है जिसके और कुटिल मूर्तिवाले प्रमथ गण तथा उनके अग्रभागमें नृत्य करनेवाले भृंगिरिटि ऐसे अनेक मूर्तिवाले करोड़ों प्रमथगण ॥४६॥ और अनेक प्रकारके वाहनोंपर स्थित चारो ओर मातृमण्डल और पञ्चाक्षरी विद्या जपनेमें तत्पर सिद्ध विद्याधरादिक ॥ ४७॥ और दिव्य रुद्रके गीत गाते हुए किन्नरोंके समूह और (त्र्यम्बक यजामहे) इस मंत्र को जपनेहारे ब्राह्मणोंके समूह ॥ ४८॥ आकाशमें वीणा बजाकर गाते और नाचते हुए नारद और नाट्यकी विधिसे नृत्य करते हुए रम्भादिक अप्सराओंके झुण्ड ॥४९॥ और गानेमें तत्पर चित्ररथदि गन्धर्वोंके समूह तथा शिवजीके कानोंमें कुण्डलताको प्राप्त हुए कम्बल और अश्वतर नाग ॥५०॥ तथा गीत गानेमें तत्पर कम्बल और अश्वतरनागोंसे शोभित सब देवसभाको देखकर रामचन्द्र कृतार्थ हुए ॥५१॥ और हर्षसे गद्गदकण्ठ हो शिवजी की स्तुति और दिव्य सहस्रनामके उच्चारणसे बारंबार प्रणाम करने लगे ॥५२॥ इति श्रीपद्मपुराणान्तर्गतशिवगीतायां भाषाटीकायां शिवप्रादुर्भावो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ अध्याय ५ श्रीसूतजी बोले-इसके उपरान्त उस स्थानमें एक सुवर्णका बड़ा रथ प्रादुर्भूत हुआ जिसकी अनेक रत्नोंकी कान्तिसे सब दिशो चित्र विचित्र हो गई थी ॥१॥ नदी के किनारेकी पंकमें जिसके चारो चक्र स्थित थे, मोतियोंकी झालर और सैकड़ो श्वेत छत्रसे युक्त ॥२॥ सुवर्णके खुरमढे हुए चार घोडोंसे शोभित मोतियोंकी झालर और चंदोवेसे शोभायमान जिसकी ध्वजामें वृषभका चिह्न था ॥३॥ जिसके निकट एक मत्त हस्तिनी चलती थी, जिसपर रेशमकी गद्दियाँ बिछाई थी, पांच भूतोंके अधिष्ठातृ देवताओंसे शोभित पारिजात कल्पवृक्षके फूलोंकी मालाओंसे सज्ज्त ॥४॥ मृगनाभिसे उत्पन्न हुई कस्तूरीके मदवाला कपूर और अगर धूप की उठी हुई गन्धसे भौंरों को आकर्षण करनेवाला ॥५॥ प्रलयकालके समान शब्दायमान अनेक प्रकार के बाजोंसे युक्त वीणावेणु मधुर बाजे और किन्नरो गणों से युक्त ॥६॥ इस प्रकारके श्रेष्ठरथको देखकर वृषभसे उतर शिवजी पार्वती सहित वस्त्रकी शय्यावाले उस रथके स्थानमें प्रविष्टित हुए ॥७॥ उसमें देवांगना श्वेत चमर और व्यजनके चलानेसे शिवजीको प्रसन्न करने लगी ॥८॥ शब्दायमान कंकणोकी ध्वनि और निर्मल मंजीरीके शब्द वीणावेणु के गीतसे मानों त्रिलोक पूर्ण हो गया ॥९॥ तोतोंके वाक्यकी मधुरता और श्वेत कबूतरोंके शब्दसे जगत शब्दायमान हो गया, प्रसन्नतासे अपने फण उठाये हुए शिवजीके भूषणरूप शरीरमें लिपटे सर्पोंको देखकर करोड़ो मयूर प्रसन्न हो अपनी चन्द्रका दिखाते हुए नृत्य करने लेगे ॥ १०॥ तब शिवजी प्रणाम करते हुए रामको उठाकर प्रसन्न मनसे दिव्य रथमें ले आये ॥११॥ और अपने दिव्य कमण्डलुके जलसे सावधान हो आचमनकर रामचन्द्रको आचमन कराय अपनी गोदमें बैठाया ॥१२॥
इसके उपरान्त रामचन्द्रको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस और महापाशुपतास्त्र प्रदान किया ॥१३॥ और रामचन्द्रसे बोले, हे राम! यह मेरा उग्र अस्त्र जगत्का नाश करनेवाला है ॥१४॥ इस कारण सामान्य युद्धमें इसका प्रयोग नही करना । इसका निवारण करनेवाला त्रिलोकीमें दूसरा नही है ॥१५॥ इस कारण हे राम! प्राणसंकट उपस्थित होनेपर इसका प्रयोग करना उचित है, दूसरे समयमें इसका प्रयोग करनेसे जगतका नाश हो जाता है ॥१६॥ फिर शिवजी देवताओंमें श्रेष्ठ लोकपालों को बुला प्रसन्न मन हो बोले, रामचन्द्रको सब कोई अपने २ अस्त्रप्रदान करो ॥ १७॥ यह रामचन्द्र उन अस्त्रोंसे रावणको मारेंगे कारण कि, उसको मैने वर दिया है कि, तू देवताओं से न मरेगा ॥१८॥ इस कारण तुम सब युद्धमें भयंकर कर्म करनेवाले वानरों का शरीर धारण करके इनकी सहायता करो इससे तुम सुखी होगे ॥१९॥ शिवजीकी आज्ञा को शिरपर धर प्रणामकर हाथ जोड देवताओंने शिवजीके चरणों में प्रणाम कर अपने २ अस्त्र दिये ॥ २०॥ विष्णुने नारायणास्त्र, इन्द्रने ऐन्द्रास्त्र, ब्रह्माने ब्रह्मदण्डास्त्र, अग्निने आग्नेयास्त्र दिया ॥२१॥ यमराजने याम्यास्त्र, निऋतिने मोहनास्त्र, वरुणने वरुनास्त्र, वायुने वायव्यास्त्र ॥२२॥ कुबेरने सौम्यास्त्र, ईशानने रुद्रास्त्र, सूर्यने सौरास्त्र, चन्द्रमाने सौम्यास्त्र, विश्वेदेवाने पार्वतास्त्र, आठों, वसुओंने वॉसवास्त्र प्रदान किया ॥२३॥ तब दशरथकुमार रामचन्द्र प्रसन्न हो शिवजीको प्रणाम कर हाथ जोड़ खडे हो भक्तिपूर्वक बोले ॥२४॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचन्द्र बोले, हे भगवन् ! मनुष्यों से तो क्षारसमुद्र उल्लंघन नही किया जायेगा और लंकादुर्ग देवता तथा दानवों को भी दुर्गम है ॥२५॥ और वहां करोड़ो बली राक्षस रहते है वे सब जितेन्द्रिय वेदपाठ करने में तत्पर और आपके भक्त है ॥२६॥ अनेक प्रकारकी मायाके जानने हारे बुद्धिमान अग्निहोत्री है । केवल मै और भ्राता लक्ष्मण युद्धमें उनको कैसे जीतसकेंगे ॥२७॥ श्रीमहादेव उवाच । शिवजी बोले - हे रामचन्द्र ! रावण और राक्षसोंके मारनेमें विचार करने की कुछ आवश्यकता नही, कारण कि उसका काल आगया है ॥२८॥ वे देवता और ब्राह्मणका दुःख देनेरूपी अधर्ममें प्रवृत्त हुए है सुव्रत! इस कारण उनकी आयु और लक्ष्मीका भी क्षय हो गया है ॥२९॥ उसने राजस्त्री जानकीजी की अवमानना की है । इस कारण तुम उसे सहज में मार सकोगे, कारण कि वह इस समय मद्यपानमें आसक्त रहता है ॥३०॥ अधर्ममें प्रीति करनेवाला शत्रु भाग्यसे ही प्राप्त होता है । जिसने वेदशास्त्र पढा हो और सदा धर्ममें प्रीति करता हो वह विनाशकाल आने पर धर्मकाँ त्याग कर देता है ॥३१॥ जो पापी सदा देवता, ब्राह्मण और ऋषियों को दुःख देता है, उसका नाश स्वयं होता है ॥३२॥ हे राम ! किष्किंधा नामक नगरमें देवताओंके अंशसे बहुतसे महाबली और दुर्जय वानर उत्पन्न हुए है ॥३३॥ वे सब तुम्हारी सहायता करेंगे । उनके द्वारा तुम सागरपर सेतु बंधवाना अनेक पर्वत पर लाकर वे वानर पुल बांधेगे उसपर सँब वानर उतर जायेंगे । इस प्रकार रावणको उसके साँथियों सहित मारकर वहां से अपनी प्रियाको लाओ ॥३४॥ जहां संग्राममें शस्त्रसे ही जय प्राप्त होनेकी संभावना हो वहां अस्त्रोंका प्रयोग न करना और जिनके पास अस्त्र नही है अथवा थोडे शस्त्र है तथा जो भाग रहे ऐसे पुरुषोके ऊपर दिव्यास्त्रका प्रयोग करनेवाला स्वयं नष्ट हो जाता है ॥३५॥ बहुत कहने से क्या है यह संसार जो मेरा ही उत्पन्न किया है, मै ही इसका पालन और मै ही इसका संहार करता हूँ
॥३६॥ मै ही एक जगत् की मृत्यु का भी मृत्युस्वरूप हूँ, हे राजन्! मै ही इस चराचर जगत् का भक्षण करनेवाला हूँ ॥३७॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे रामाय वरप्रदानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ वे युद्धदुर्मद सब राक्षस तो मेरे मुखमें प्राप्त हो चुके है तुम निमित्तमात्र होकर संग्राममें कीर्ति पाओगे ॥३८॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे रामाय वरप्रदानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥
अध्याय ६ श्रीरामचन्द्र बोले, हे भगवन् ! आप कहते हो कि मै ही जगत्की उत्पत्ति और पालन करता हूँ इसमें मुझे बड़ा आश्चर्य है । स्वच्छ स्फटिक मणिकी समान जिनका शरीर और तीन नेत्र तथा मस्तकपर चन्द्रमा है ॥१॥ ऐसे आप परिच्छिन्न और पुरुषाकृति मूर्ति धारण किये हो और पार्वती सहित प्रमथ आदि गणों के साथ यही विहार करते हो ॥२॥ फिर तुमने पंचभूतादि यह चराचर जगत् कैसे उत्पन्न किया है । हे गिरिजापते! जो आपकी मुझपर कृपा है तो आप कहिये ॥३॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान बोले- हे महाभाग रामचंद्र! सुनो, जो देवताओंकी भी बुद्धिमें नही आता वह से यत्नपूर्वक तुमसे कहता हूँ, जिससे तुम अनायास ही संसार के पार हौ जाओगे ॥४॥ जो कुछ यह पाँच महाभूत, चौदह भुवन, समुद्र, पर्वत, देवता, राक्षस और ऋषि दीखते है ॥५॥ १ चौदहभुवन भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यं यह सात ऊपरके लोक, अतल, वितल, सुतल, रसातल,तलातल, महातल और पाताल यह सात अधोलोक मिलकर चौदह लोक हुए । तथा और स्थावर जंगम, गन्धर्व, प्रमथ और नाग दीखते है यह सब मेरी विभूति है ॥६॥ प्रथम ब्रह्मादि देवता मेरा रूप देखनेके निमित्त मेरे प्रिय मंदराचल पर गये ॥७॥ देवता हाथ जोड मेरे आगे स्थित हुए तब मैने देवताओं को लीलासे व्याकुलचित्त जानकर उन ब्रह्मादि देवताओका ज्ञान हरलिया ॥८॥ वे तत्काल ही ज्ञानरहित हो हमसे बोले तुम कौन हो? तब मैने देवताओँसे कहा मै ही पुरातन हूँ ॥९॥ हे देवताओं! सृष्टिसे पहिले मै ही था, वर्तमानमें भी मै ही हूँ और अन्तमें भी मै ही रहूँगा । इस लोकमें मेरे सिवाय और कुछ नही ॥१०॥ हे सुरेश्वरो! मुझसे व्यतिरिक्त और कुछ वस्तु नही है ॥ नित्य अनित्य भी मै ही हूँ तथा मै ही पापरहित वेद और ब्रह्मौका भी पति हूँ ॥११॥ मै ही दक्षिण उत्तर पूर्व पश्चिम हूँ । हे सुरेश्वरो! ऊपर नीचे दिशा विदिशा सब मै ही हूँ ॥१२॥ सावित्री, गायत्री, स्त्री, पुरुष, नपुंसक, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप् और पंक्ति छन्दभी मै ही हूँ, तथा मै ही तीनो वेदोंमे वर्णन किया गया हूँ ॥१३॥ मै ही सत्यस्वरूप मायाके विकास से रहित हूँ, सब प्रकार शांत दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य, आहवनीय तीन अग्निस্বরূপ हूँ, गौ, गुरुमें गुरुता, वाणीका रहस्य, स्वर्गे और जगत् का पति मै ही हूँ ॥१४॥ मै ही सबसे ज्येष्ठ सब देवताओं से श्रेष्ठ ज्ञानियोंमें पूज्य सब जलोंका पति सागर मै ही हूँ । मै ही अर्चा के योग्य षड्गुण ऐश्वर्यसम्पन्न तेजः स्वप्न और उसकी आदिवायु भी मै ही हूँ ॥१५॥ मै ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और श्रेष्ठ अंगिरस अथर्ववेद हूँ मै ही स्वयम्भू हूँ ॥१६॥
भारतादि इतिहास, ब्राह्मपुराणादि पुराण, कल्पसूत्र, उनका प्रवर्तक बोधायनादि ऋषि, नाराशंसी नामक रुद्रतत्त्वके प्रतिपादक मुख्य तत्त्व कीं प्रतिपादनै करनेवाली गोथा, उपासनाकाण्ड, उपनिषद् यह सब मै ही हूँ ॥१७॥ 'तदप्येश श्लोको भवति' इत्यादि श्लोक सांख्ययोगादि सूत्र व्याख्यान अनुव्याख्यान गान्धर्वगान विद्यादि यज्ञहोम आहुति ॥१८॥ गाय आदि दानके पदार्थ दान देना, यह लोक, अविनाशि पर लोक, क्षर-प्राणीमात्रों के हृदयमें वास करनेहारा, इन्द्रियनिग्रह, मनोनियह और खग-जीवनभी मै ही हूँ, सब वेदोंमें गूढ भी ही हूँ, निर्जनस्थानवासी भी मैं हूँ, जन्मरहितभी मैं ही हूँ ॥१९॥ पुष्कर, पवित्र, सबके मध्य और बाहर भीतर आहे अविनाशी मै ही हूँ ॥२०॥ तेज, अन्धकार, इन्द्रिय, इन्द्रियके गुण, बुद्धि, अहंकार और शब्दादि विषय मै ही हूँ ॥२१॥ ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, उमा, स्कन्द, गणपति, इंद्र, अग्नि, यम, निरृति, वरुण, वायु ॥२२॥ कुबेर, ईशान, भूःभुव, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यं, यह सात लोक, पृथ्वी, जल, वायु ॥२३॥ आकाश, सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, ग्रह, प्राण, काल, मृत्यु, अमृत, भूत, प्राणी यह सब मै ही हूँ ॥२४॥ वर्तमान और भविष्य मै ही हूँ, सम्पूर्ण विश्व सर्वरूपभी मै ही हूँ ओंकारके आदि और मध्यमें भूर्भुवः स्वः मै ही हं और गायत्री शीर्ष जपनेवालोंका विराट् स्वरूप भी मै ही हूँ ॥२५॥ भक्षण, पान, कृत, अकृत, (नही किया) तथा पर, अपर, मै ही हूँ और सबका आश्रय मै ही हूँ ॥२६॥ मै ही जगत का हित, अक्षर, सूक्ष्म, दिव्य, प्रजापति, पवित्र, सोम, देवता, अग्राह्यं (जो ग्रहण करने में न आवै) और सबका आदि मे ही हूँ ॥२७॥ मै ही सबका उपसंहार करनेवाला, मै ही पर्वत, सागर इत्यादि गुरुवस्तु और प्रलयकालिक अग्नि सूर्यादितेज इन सब पदार्थों में विद्यमान हूँ, मै ही सब प्राणियों के हृदयमें देवता और प्राणरूप से स्थित हूँ ॥२८॥ जिसका शिर (स्पर्श संज्ञकवर्ण) उत्तरको, और जिसके पाद (उष्म संज्ञक वर्ण) दक्षिणको और जिसके अन्तर अन्तस्थसंज्ञक वर्ण) मध्यमें है ऐसा त्रिमासिक साक्षात ओंकार मैं हूँ ॥२९॥ जिस कारणसे कि मैं जप करनेवालों को स्वर्गादि लोकको ले जाता हूँ पुण्यक्षीण पुरुषोंको नीचे ले ता हौं, इस कारण मै एक निरन्तर नित्य सनातन ओंकार हूँ ॥३०॥ यज्ञकर्म में ब्रह्मा नामक ऋत्विक होकर ऋग्यजु और सामके मन्त्र ऋत्विजो को देता हूँ, इस कारण मैं ही प्रणवस्वरूप हूँ, तात्पर्य यह कि सब मै ही हूँ ॥३१॥ जैसे घृत तैलादि स्नेह द्रव्य मांसपिंडमें व्यापत होकर भक्षण करनेवाले की सब देह को व्याप्त करते है, इसी प्रकार सब लोकोंमें अधिष्ठानरूप से व्याप्त होकर मै सर्वव्यापी हूँ ॥३२॥ ब्रह्मा हरि भगवान् व और दूसरे देवभी मेरा आदि और अन्त नही ऐसा जानते इस कारणसे मैं अनन्त हूँ ॥३३॥ गर्भवास जन्म जरा मृत्युसे भरे संसारसागर से मै भक्तोंको तारता हूँ इस कारण मेरा नाम तारक है ॥३४॥ जरायुजु, स्वेदज, अंडज, अद्भि्ज इन चार प्रकारके देहो में मै जीवरूपसे वास करता हूँ, और इनके हृदयाकाशमें सूक्ष्मरूप होकर वास करता हूँ, इससे मै सूक्ष्म कहता हूँ ॥३५॥ महान्धकारमें मग्न हुए भक्तों को उद्धार करनेके निमित्त बिजलीकी समान दीप्तिमान् निरुपम तेजरूप प्रगट करता हुं इस कारण मै विद्युत्स्वरूप हूँ ॥३६॥ जिस कारणसे कि मै एकही लोकोंको उत्पन्न अरु संसार करके लोकान्तरमें पहुँचाता हूँ अरु ग्रहण करता हूँ इस कारणसे मुझे स्वतंत्र और एक ईश्वर कहते है ॥३७॥ प्रलयकालमें कोई दूसरा स्थित नही रहता केवल मै ही तीन गुणोंसे परे स्वयं ब्रह्मरुद्रस्वरूप सब प्राणियों को अपने में लय करके स्थित होता हूँ ॥३८॥ जो कि मै सब लोकोंकी ईशिनी अर्थात् सब लोकोंको स्वाधीन रखनेवाली शक्तियों से स्वाधीन रखता हूँ उन पर सत्ता चलाता हूँ इस कारण सर्वद्रष्टा सबका चक्षु मै ईशान कहाता हूँ ॥३९॥ मै स्थिर और चर सब प्राणियों का सदा ईश्वर हू तथा सब विद्याओंका अधिपति हूँ, अर्थात् सर्व ईश्वर शक्तिसम्पन्न हूँ, इससे मेरा ईशान नाम सार्थक है ॥४०॥
मैं सब अतीत और अनागत पदार्थोंको आत्मज्ञानसे देखता हूँ, इसी प्रकार साधनसम्पन्न पुरुष को आत्मज्ञानरूपयोग का उपदेश करता हूँ और सबमें व्यापने से मै भगवान ऐश्वर्यवाने हूँ ॥४१॥ मै निरन्तर सब लोकोंकी उत्पत्ति, पालन और संहार करता हूँ, इस कारण मुझे महेश कहते है ॥४२॥ महत् पुरुषों में आत्मज्ञान और अष्टांग योगसे जो महिमा विद्यमान है और जो सब पदार्थों को उत्पन्न करके रक्षा करता है वह महादेव मै ही हूँ ॥४३॥ मै ही श्रुतिप्रतिपादित एक देव सम्पूर्ण दिशाओंमें वर्तमान हूँ मै ही सबसे प्रथम गर्भमें वास करनेहारा, गर्भसे निकलनैहारा और पीछे उत्पन्न होनेहारा हू मै ही सम्पूर्ण लौक हूँ और सब दिशाओं में मेरा ही मुख है ॥४४॥ सर्वत्र मेरे नेत्र सर्वत्र मेरा मुख सर्वत्र मेरी भुजा और सर्वत्र मेरे चरण है मै ही भुजा और चरणोंसे स्वर्ग और भूमिको उत्पन्न करता हुआ एक देवस्वरूप हूँ ॥४५॥ केशके अग्रभागकी समान सूक्ष्मरूप हृदयमें रहनेवाला, विश्वव्यापक, स्वप्रकाश, श्रेष्ठ आत्मस्वरूप मै हूँ मुझे जो चतुर पुरुष तत्त्वमस्यादि वाक्यों के ज्ञानसे (वह तू है) ऐसी उपाधि त्यागकर जीव और ब्रह्म को एकता से देखतै है अर्थात ऐकस्वरूप जानते है वही निरन्तर मोक्ष को प्राप्त होते है दूसरे नही ॥४६॥ सीपी में जो रजतबुद्धि है यह भ्रम ही है परन्तु रजतके भ्रमका आधार शुक्ति यथार्थ है उसी प्रकार मेरे स्वरूपमें भासनेहारा जगत् मिथ्या है परन्तु उसका आधार मै सत्य तथा एकरूप हूँ मै ही यह पंचभूतात्मक जगत् धारण किये हूँ ऐसे मुझे ईश्वरके स्वरूपमें जो विवेक करेगा उसको अनन्त शान्ति अर्थात् मुक्तिकी प्राप्ति होगी ॥४७॥ प्राणका ही अन्तर्गत मन है वहां क्षुधा पिपासा और तृष्णा रहती है इससे शुभाशुभ फल प्राप्तिका कारण जो धर्म अधर्म है उसके भी कारण विषयतृष्णा को छिन्नकर निश्चयात्मक बुद्धि मुझमें अन्तःकरण लगाकर जो मेरा ध्यान करते है उनको निरन्तर शांति और मोक्षसुख प्राप्त होता है दूसरोंको नही ॥४८॥ जहां वीणा की गति नही जहां मन नहीं पहुंच सकता इस प्रकार आनन्द ब्रह्मरूप मेरे जाननेवाले को कहीं से भय प्राप्त नही होता ॥४९॥ इस कारण देवता मेरे वचन जो कि आत्मस्वरूप जानके देनेवाले है सुनकर मेरा नामका जप करके मेरेही ध्यानपरायण हुए ॥५०॥ देहान्तमें वे सब मेरे सायुज्यको प्राप्त होगये । जो कुछ ये पदार्थ दीखते है यह सब मेरी ही विभूति है ॥५१॥ यह सब वस्तु मुझहीसे उत्पन्न है औरु मुझही में प्रतिष्ठित है और अन्तमें मुझमें ही लय हो जाती है मैं ही अद्वय ब्रह्म हूँ ॥५२॥ मै ही सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म महानसे भी महान मै ही विश्वरूप निर्लेप पुरातन पुरुष सर्वेश्वर तेजोमय और शिवरूप हूँ ॥५३॥ मेरे हस्त चरण नही और सब कुछ कर सकता हूँ मेरी शक्ति किसी के ध्यानमें नही आती मेरे भौतिक नेत्र नही तथापि सब कुछ देखता हूँ कान नही और सब कुछ सुनता हूँ मै सत् असत् सब विचारको जानता हूँ मेरा एकान्तस्वरूप हूँ मेरा जाननैवाला कोई नही मै सदा चैतन्यस्वरूप हूँ ॥५४॥ सम्पूर्ण वेदोंमें मै ही जानने योग्य हूँ वेदान्तका कर्ता और वेदका जाननेवाला भी मै ही हूँ । मुझमें पाप और पुण्य नही, मेरा नाश तथा जन्म नही मुझे देह इन्द्रिय और बुद्धिका संबंध नही है ॥५५॥ भूमि, जल, तेज, वायु आकाश इनसे मै लिप्त नही हूँ । इस प्रकारसे पंचकोशात्मक गुहामें निवासा करनेहारा निर्विकार संगरहित सर्वसाक्षी कार्यकारण भेदशून्य परमात्मा हूँ । जो मुझको इस प्रकार मै जानते है वह मेरे शुद्ध परमात्मस्वरूप को प्राप्त होते है ॥५६॥ हे महाबुद्धिमन्! रामचन्द्र! इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जानता है वही संसारमें मुक्त होता है दूसरा नही ॥५७॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु० विभूति योगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
अध्याय ७
श्रीरामचन्द्र बोले - हे भगवन् ! जो कुछ मैने प्रश्न किया है वह तो उस प्रकार स्थित है, हे महेश्वर! आपने इस विषयका कोई उत्तर नही दिया ॥१॥ हे महेश्वर ! आपका देह परिच्छिन्नपरिमाण अर्थात् इयत्ता करनेके योग्य है फिर सब संसारकी उत्पत्ति पालन नाश कैसे करते हो ॥२॥ इसी प्रकार अपने २ अधिकार के पालन करनेवाले इन्द्र वरुणादि सब देवता तुम्हारी देह में कैसे रहते है और वे सब देवता और चौदह भुवन यह मैं ही हूँ, ऐसा जो तुम कहते तो कैसे कहते हो अर्थात् जबतक उपाधि है तबतक जीव ईश्वरका अभेद संभौवित नही होता और जड प्रपंच महाभूतोंमें चेतनाका तादाम्य संभावति नही ॥३॥ हे देव! आपसे उत्तर सुना परन्तु संदेह नही जाता कारण कि चित्तका निश्चय नही उस सन्देहकी दूर करनेको आपही समर्थ हो ॥४॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान् बोले ! सूक्ष्म वटके बीजमें जिस प्रकार महान वटका वृक्ष सदा रहता है और उसीसे वह वृक्ष निकल भी आता है यदि ऐसा न हो तो बताओ वह वृक्ष कहां से आता है इसी प्रकार मेरे सूक्ष्म शरीरसे सब भूतोंका जन्म पालन और नाश होता है ॥५॥ जिस प्रकारसे जलके बीचमें बड़ा सैन्धैका खण्ड डालनेसे वह उसमें विलीन होजाता है और नही दीखता पीछे जलको अग्निमें औटाने से वह पूर्ववत् प्राप्त हो जाता है ॥६॥ अथवा जैसे प्रतिदिन सूर्यसे प्रकाश उत्पन्न होता और संध्या समय विलीन हो जाता है इसी प्रकार मुझसे जगत् उत्पन्न होकर विलीन हो जाता है और मुझमें हि स्थिर रहता है । हे सुव्रत राम! तुम ऐसा जानो ॥७॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचंद्र बोले- हे भगवन् ! आपने दृष्टान्तसे प्रतिपादन किया परन्तु जिस प्रकार दिशाओंके भ्रमवाले को उत्तरादि दिशाओंका भ्रम हो जाता है, इसी प्रकार मुझे भ्रम हो गया है । वह निवृत्त नही होता मै क्या करूं ॥८॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान बोले - हे राम ! जिस प्रकार यह चराचर जगत् मुझमें वर्तमान है, सो मैं तुमको दिखाता हूँ परन्तु तुम उसे देखनेको समर्थ नही ॥९॥ इस कारण उसके देखनेको मै तुम्हे दिव्यनेत्र देता हूँ, उन नेत्रोंसे भय त्यागकर तुम मेरा दिव्य स्वरूप देखो ॥१०॥ नरेन्द्र वा देवता इस मेरे तेज स्वरूपको मेरे अनुग्रह बिना चर्म चक्षुसे नही देखे सकते ॥११॥ सूत उवाच । सूतजी बोले ऐसा कहकर शिवजीने रामचन्द्रको दिव्यनेत्र दिये और पातालकी समान बडा विस्तृत मुख रामचन्द्रको दिखाया ॥१२॥ करोड़ो बिजलीकी समान प्रकाशमान अतिशय भयदायक भयंकर उस रूपको देखतेही रामचन्द्र जंघाओं के बलसे पृथ्वी में बैठ गये ॥१३॥ प्रणाम और दंडवत् करके शिवजीको बारंबार प्रसन्न करने लगे फिर महाबली रामचन्द्र उठकर जबतक देखते है ॥१४॥ जबतक त्रिपुरघाती शिवजीके मुखमें करोड़ो ब्रह्मान्ड प्रलय कालकी अग्निमें व्याप्त होकर चटका पक्षीके पंखो कि समान दीखे ॥१५॥ सुमेरु, मंदराचल, विंध्याचलादि पर्वत, सात समुद्र, चंद्र सूर्यादि सब ग्रह, पांच महाभूत और शिवजीके साथ आये हुए सब देवता ॥१६॥ वन, बड़े २ सर्प, चौदह भुवन इस प्रकार रामचन्द्रने प्रत्येक ब्रह्माण्डको देखकर ॥१७॥ उन्हींमें पूर्वकालमे हुआ देवता और असुरोंका संग्रामभी देखा विष्णुके दश अवतार और उनके र्कतव्य कंसवध रावणवध आदि ॥१८॥ युद्धमें देवताओंकी पराजय, शिवजीका त्रिपुरासूरको मारना इसी प्रकार उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जीवों का लय देखकर ॥१९॥ रामचंद्र भयभीत हो बारंबार प्रणाम करने लगे । यद्यपि रामचन्द्र को तत्त्वज्ञान भी हो गया था तथापि भयभीत हो गये ॥२०॥
तब उपनिषदोंका सार और अर्थरूप वाणीसे शिवजीकी स्तुति करने लगे ॥२१॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचन्द्र बोले । हे विश्वेश्वर ! हे शरणागतदुःखनाशक, हे चन्द्रशेखर ! प्रसन्न हूजिये और संसारके भयसे मुझ अनाथकी रक्षा कीजिये ॥२२॥ हे शंकर ! यह भूमि और इस पर उत्पन्न होनेवाले वृक्षादि सब आपसे ही उत्पन्न हुए है यह सब नित्य तुमही में स्थित रहते है । हे शिवे ! अन्तमें यह सब तुम्हीमें स्थित हो जाते है ॥२३॥ ब्रह्मा, इन्द्र, एकादश, रुद्र, मरुद्गण, गन्धर्व, यक्ष, असुर, सिद्ध, गंगादि नदी, सागर यह सब हे शूल धारणकरनेवाले ! तुम्हारे मुखमें दीखते हैं ॥२४॥ हे चन्द्रमौले ! तुम्हारी मायासे कल्पित हुआ यह विश्व तुम्हारे ही स्वरूपमें प्रतीत होता है, इसे भ्रांतियुक्त होकर पुरुष इस प्रकारसे देखते है जिसप्रकारसे शुक्तिमें रजतका और रस्सीमें सर्पका भ्रम उत्पन्न होता है, वह भाँति वैसी नहीं है यह जैसी भ्रांति होती है वह पदार्थ अन्यत्र सिद्ध होता है और नही भी होता, जैसे शुक्तिमें रजतकी भाँति हुई । परन्तु रूपा पदार्थ दूसरे स्थानमें विद्यमान है, तैसे यह जगत् तुम्हारे स्वरूपसे बचकर अन्यत्र नही दीखता इसीसे लोक इसको शुक्तिका रजतेवत् भ्रम मानते है ॥२५॥ आप अपने तेजसे सब जगत् व्याप्त और प्रकाश करते हो । हे देवदेव ! आपके प्रकाश के बिना तो हज जगत् क्षणमात्रमें अदृश्य हो जाय ॥२६॥ जो पदार्थ थोडे आश्रयवाला है वह बडे पदार्थको धारण करनेमे समर्थ नही होता, जिसप्रकार एक अणु विंध्याचलको धारण नही कर सकता और तुम्हारे मुखमात्रमें यह सब जगत् दीखता है । यह सब आपकी माया है, वास्तविक नही ऐसा मुझे निश्चय है ॥२७॥ जिस प्रकारसे रज्जमें सर्प की भ्रांति भयदायक होती है, यद्यपि वहां वास्तवमें सर्प उत्पन्न नही होता और भ्रमके नाश होनेपर सबका नाशभी नही होता (यथार्थ ही है कि जो उत्पन्न नही हुआ उसका नाश होनेवाला नही) परन्तु यह भय देनेवाला होता है इसी प्रकार तुम्हारी मायासे जिसको अस्तित्व प्राप्त हुआ है, ऐसा यह जगत् मिथ्या भ्रांतिकै कार्य को सत्य उत्पन्न करता है ॥२८॥ जो यह तुम्हारा शरीर जगतका आधारभूत दीखता है यदि विचार दृष्टिसे देखा जाय तो भी यह अज्ञान दृष्टि की कल्पना है कारण कि तुम सच्चिदानन्दरूप और सर्वत्र पूर्ण हो ॥२९॥ ऐसा है तो कर्मकाण्डप्रतिपादक सर्व श्रुति व्यर्थ हुई, पर ऐसा नही । यज्ञ इष्टापूर्त दान अध्ययनादि कर्मोंका फल तुम कर्त्ताको देते हो, यह कर्मकाण्डपर विश्वास रखनेका प्रमाण है, परन्तु महापुण्योंके उदयसे जब ब्रह्मका साक्षात्कार होता है और यह सब प्रपंच तुमसे अभिन्न दीखने लगता है, तब तुम क्यों कर्मों का फल देते हो? अर्थात् नही देते तब कर्मकांडप्रतिपादक कथा असिद्ध हो जाती है ॥३०॥ ज्ञानहीन अविचारी पुरुष ही पूजा यज्ञ आदि बाह्य कर्मोंसे शिव संतुष्ट होते है ऐसा कहते है परन्तु यह ठीक नही कारण कि जो अमूर्त परिमाणरहित और अनन्त है उसको भोगकी इच्छा नही होती ॥३१॥ इसी प्रकार किंचित बेलपत्रवा चुल्लभर जल से प्रीतिसे आपको देता है वह प्रीतिसे स्वीकार करके आप उसे स्वराज्यपद देते हो यह भी माया से कल्पित है ऐसा मेरा निश्चय है ॥३२॥ तुमही एक पुराण पुरुष सम्पूर्ण दिशा बिदिशा और विश्वमें व्याप्त हो, इस जगत् के नाश होनेमें भी तुम्हारी हानि नही हो सकती, जिस प्रकार घटके नाश होनेसे घटमे व्यापी आकाशकी हानि नही हो सकती, इसी प्रकार जगत् के नाशसे तुम्हारी कुछ हानि नही ॥३३॥ जिस प्रकार आकाशमें एकही सूर्यका बिंब जल भरेहुए छोटे पात्रोमें अनेक बिंबत्वको प्राप्त होता है अर्थात् अनेकरूप दीखते है इसी प्रकारसे आप एके होकर भी सबके अन्त:करणमें अनेकरूपसे विराजते हो ॥३४॥ संसारके उत्पत्ति पालन और नाश होनेमे भी तुम्हारा कुछ कर्तव्य नही है केवल अनादि सिद्ध देहधारियोंके कर्मानुसार स्वप्नवत् तुम सब कार्य करते हो, जीव ईश्वरमें केवल बिम्ब और प्रतिबिंबकी समान अन्तर है ॥३५॥ हे शंभो ! स्थूल और सूक्ष्म दोनों जड़ देहोंमे आत्मतत्वके सिवाय दूसरा चैतन्य अंश नही है, हे पुरमथन ! सुख दुःख जो दोनों देहको होते है उनकी कहनेवाली श्रुति केवल आपमें आरोप करती है, वास्तविक नही ॥३६॥ हे भगवन् ! सच्चिदानन्दरूप समुद्रमें हंसरूप नीलकण्ठ कालस्वरूप भक्तजनोंके सम्पूर्ण पातक दूर करनेवाले और सबके साक्षी आपके वास्ते नमस्कार है ॥३७॥ सूत उवाच ।
सूतजी बोले, इस प्रकार विश्वेश्वरको प्रणाम कर, हाथ जोड़ विस्मित हो रामचन्द्र परमेश शिवजीसे बोले ॥३८॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचन्द्र बोले, हे विश्वात्मन् ! यह अपना विश्वरूप आप उपसंहार करिये । हे शंकर ! आपके अनुग्रहसे आपमें एकत्र स्थित सब जगतको देखकर मुझे प्रतीति हुई ॥३९॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान बोले, हे महाभुज ! रामचन्द्र ! देखो मुझसे दूसरा कोई नही है । सूत उवाच । सूतजी बोले - ऐसा कहकर शिवजीने अपने देहमें से देवादिकों को गुप्त किया, अर्थात् विश्वरूप छिपा लिया ॥४०॥ आंख खोल फिर जो रामचन्द्र प्रसन्न होकर देखते है इतने ही समयमें पर्वत के श्रृंगपर व्याघ्रचर्मपर स्थित पंचमुख नीलकण्ठ त्रिलोचन शिवजीको देखा ॥४१॥ जो व्याघ्रचर्मका वस्त्र ओढे, शरीरमें विभूति लगाये है, सर्पके कंकण पहरे, नागका यज्ञोपवीत धारे ॥४२॥ व्याघ्रचर्मका ही वस्त्र ओढे बिजलीकी समान पीली जटा धारे इकले मस्तकपर चन्द्रमा धारे श्रेष्ठ भक्तोंके अभय देनेहारे ॥४३॥ चार भुजा शत्रुनाशक परशा धारण किये मृग हाथमें लिये सब जगत् के पति शिवजीको देख उनकी आज्ञामें मन लगाये प्रणाम करके रामचन्द्र स्थित हुए ॥४४॥ तब शिवजी रामचन्द्रसे बोले जो जो तुम्हारे पूछने की इच्छा है वह तुम सब पूछो । हे राम! मेरे सिवाय दूसरा कोई तुम्हारा गुरु नही है ॥४५॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्म० योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे विश्वरूपदर्शनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥
अध्याय ८ श्रीरामचन्द्र बोले, पंचभूतके देहकी उत्पत्ति स्थिति नाश किस प्रकारसे होता है और इसका स्वरूप क्या है, हे भगवन्! विस्तारपूर्वक आप मुझसे कहिये ॥१॥ श्रीभगवान बोले - पृथ्वी आदि पंचभूतसे बना हुआ यह शरीर देह है, इसमें पृथ्वी प्रधान है और दूसरे चार इसमें मिले हुए अर्थात् सहकारी है ॥२॥ जरायुज, अंडज, स्वेदज और उद्भिज्ज यह पांचभौतिक देहके चार भेद है ॥३॥ और मानसिक उत्पत्ति जो कहाती है वह पांचवी है उसे दैवसर्ग कहते है, उन चारोंमें जरायुज प्रधान है, सो प्रथम उसीका वर्णन करते है ॥४॥ स्त्रीके रज पुरुषके बीजसे जरायुजकी उत्पत्ति होती है जिस समय ऋतुकालमें स्त्रीके गर्भाशयमें पुरुषका वीर्यप्रवेश होता है ॥५॥ स्त्रीका रज मिलित होता है तभी जरायुज की उत्पत्ति होती है । स्त्रीका रज अधिक होनेसे कन्या और वीर्य अधिक होनेसे पुरुषकी उत्पत्ति होती है ॥६॥ और शुक्र शोणितकी समान होने से नपुंसक होता है, जब स्त्री ऋतुस्नान कर चुके तब चौथे दिनसे सोलह रात्रितक ऋतुकालकी अवधि कही है ॥७॥ उसमें विषम दिन पांचवे सातवे नववें दिनमें स्त्री और युग्म दिनमें पुरुषकी उत्पत्ति होती है ॥८॥ जो सोलहवी रात्रिमें स्त्रीके गर्भ रहता है, तो चक्रवर्ती राजा उत्पन्न होता है इसमें संदेह नही ॥९॥
ऋतुमें स्नान करके जो स्त्री कामातुर हो जिस पुरुष का मुख देखती है, उसी आकृति का गर्भ होता है, इसी कारणसे स्त्री उस दिन स्वामी का मुख देखेँ ॥१०॥ स्त्रीके उदरमें एक पेशी चमडा निर्मित होता है उसे जरायु कहते है, जिस कारणसे शुक्र और शोणितका योग उसी गर्भमें होता है इसी कारणसे उसे जरायुज कहते है ॥११॥ सर्प और पक्षी आदि जीव अंडज कहलाते है, मशकादि स्वेदज कहलाते है, वृक्षगुल्मादि उद्भिज्ज कहाते है, और देवर्षि आदि मानसिक कहाते है ॥१२॥ अपने पूर्वजन्मके कर्मवशसे यह प्राणी स्त्रीके गर्भाशयमें प्राप्त होकर शुक्र शोणितके मिलनेसे प्रथममासमें शिथिल रहता है ॥१३॥ कछ दिनोंमें उसकी बुदबुदकी आकृति होने लगती है, कछ दिनोंमें जेरसी होती है, इस कारण उसमें दहीकी समान कुछ गाढापन आता है फिर कुछ दिन में उसकी पेशी (मांसपिंड) बनती है । इस प्रकार शुक्र शोणित संयोग होते हुए एकमास हो जाता है, दूसरे मासमेंमासपिंड बनता है ॥१४॥ तृतीयमासमें शिर, हाथ आदि उत्पन्न होते है, और जीवका आश्रय लिंगदेह चौथे महीनेमें उत्पन्न होता है ॥१५॥ तब यह गर्भ माताके उदरमें चलायमान होने लगता है । पुत्र दक्षिणपार्श्व और कन्या वामपार्श्वमें स्थित होती है ॥१६॥ और नपुंसक उदरके मध्यभागके स्थित होता है । इस कारण दक्षिणापार्श्वमें जन्म लेनेके अनन्तर होनेवाले श्मश्रु तथा दन्तादिको छोड़कर सब अंग प्रत्यंग के भाग ॥१७॥१८॥ एक साथ चौथे मासमें हो जाते है, पुरुषोंके गंभीरता स्थिरादि धर्म और स्त्रियों के चञ्चलतादि धर्म चौथेमासमें उत्पन्न हो जाते है जो सूक्ष्मरूपसे रहते है ॥१९॥ और नपुंसक गर्भके स्त्री पुरुषोंके मिले हुए धर्म गर्भमें उत्पन्न होते है और माताके हृदयमें सन्निकटही इसका हृदय होकर जिस वस्तुकी माताँ इच्छा करतीँ है उसी वस्तुकी यह इच्छा करता है इस कारण गर्भकी वृद्धिके निमित्त माताकी इच्छा पूर्ण करनी चाहिये और इसीसे गर्भवती स्त्रीकों दोहदवती अर्थात दो हृदयवाली कहते है ॥२०॥२१॥ और उसकी इच्छा पूर्ण न होने से गर्भमें निर्बलता, बुद्धिहीनता व्यंगतादि दोष हो जाते है । और माताका जिन विषयोंमें चित्त होता है उन विषयोंमें ही आर्त वह पुरुष होता हैं, इसलिये गर्भिणीकी इच्छा पूर्ण करे ॥२२॥ पांचवे महीनेसे चित्त बढ़ता है तथा मांस और रक्तकी पुष्टि होती है, छठे महीनेमें, अस्थि स्नायु और नख मस्तकके केश तथा शरीरके लोभ प्रगट होते है ॥२३॥ सातवें मासमें बल शरीरका वर्ण तथा सब अवयवोंकी पूर्णता होती है और वह गर्भका बालक घुटनोंमें कोनी धर हाथोंसे कान ढक ॥२४॥ और गर्भवाससे व्याकुल होकर भयभीत हुआसा स्थित होता है ॥२५॥ उस समय इसको अनेक जन्मो की सुधि हो जाती है तब बड़ा दुःखी होता है और हा! कष्टकी बात है ऐसे कहता हुआ दुःखी होता है अपने आत्माको शोचता है ॥२६॥ वह असह्य और मर्मभेदी यातना को प्राप्त होकर बारंबार कष्ट पाता है जिस प्रकार से तपायें रेतमें उसीको डाल दो उसको जो वेदना होती है ऐसी वेदनाको वह प्राप्त होता है और दुःख भोगता है ॥२७॥ गर्भवासके दुःख यह है प्रथम गर्भवासकी अग्निसे (जो जठराग्नि कहाती है) सन्तप्त होकर कहता है कि यह ज्वाला मुझको अत्यन्त पीडित करती है ॥२८॥ इसी प्रकार उदरके कीए जब काटते है तो विदित होता है कि इनके मुख कूटशाल्मलिके काटेकी समान तीक्ष्ण है और यह मुझको अत्यन्त पीड़ित करते है ॥२९॥ गर्भकी बड़ी भारी दुर्गन्ध और जठराग्निकी ज्वालासे जो मुझको दुःख प्राप्त हुआ है, उससे कुम्भीपाक नरकका दुःख कम है ॥३०॥ मवाद, रक्त, कफ, अमंगल, पदार्थही पान करने और वांति भक्षण करने को मिलती है, अशुचि पदार्थ मल मूत्रादिमें रहनेसे गर्भमें स्थित प्राणी कीड़ाही हो जाता है ॥३१॥ जो दुःख गर्भशय्यामें सोकर मैने पाया है यह दुःख सम्पूर्ण नरकोंमें भी पडकर प्राप्त नही होता ॥३२॥ इस प्रकार से पूर्वकालमें प्राप्त हुई अनेक प्रकारकी यातनाओंको स्मरण करता हुआ मुक्त होनेका उपाय सोचता यही अभ्यास करता रहता है ॥३३॥
आठवे महीनेमे त्वचा और श्रुति प्राप्त होती है । इसी प्रकार ओज इन्द्रियशक्ति और तेज शरीरके आरम्भ करनेहारे तथा धातुपरिणामसे होनेहारे हृदयकै तेज जो जीवनके मुख्य कारण है वह प्राप्त होते है ॥३४॥ कुछ समयतक अतिशय चंचल होनेके कारण किसी समय माताके हृदयमें चंचलरूपसे रहता है, कभी गर्भाशयमें चपलता कौ प्राप्त हो जाता है । इसी कारण अष्टम मासमें उत्पन्न हुआ बालक बहुत नही जीता कारण कि वह ओज और तेजसे हीन होता है ॥३५॥ फिर नौवें मासमें प्रसूतिका समय होता है परन्तु शीघ्र प्रसव होनेका प्रतिबंधक यह है कि, जो कुछ गर्भके प्रारब्ध कर्म हुए तो उसे और कुछै कालतक गर्भमें रहना पड़ता है ॥३६॥ माताकी एक रक्तवाहिनी नाडी नाबिचक्रकी एक नाडीसे मिली हुई है, उसीके द्वारा माताका भक्षण किया अन्न गर्भमें पहुँचता है, इस प्रकार माताके आहारसे पुष्टिको प्राप्त हो यह गर्भ उसीके द्वारा जीवित रहता है ॥३७॥ योनिचक्रमैं इसके सम्पूर्ण अंग अस्थियोंसे पिचकर व्यथित होते है, तब यह प्रथम कुक्षिसे निकलकर योनिए बाहर आता है, उस समय उसका शरीर मेदा रुधिर से लिप्त और जरायुसे आच्छादित रहता है ॥३८॥ यह प्राणी अत्यन्त दुःख से पीड़ित हो नीचेको मुखकर जैसेही योनिचक्रसे निकलता है वैसेही ऊंचे स्वरसे रोता है, इस प्रकार गर्भवास के यन्त्रसे निकलकर दुःखी भोगता है, कही सुख नही मिलता ॥३९॥ जन्म लेकर यह कुछ भी नही कर सकता, केवल मांसके पिंडकी समान पड़ा रहता है, तब इसके मातापिता दंड हाथमे लिये कुत्ते बिलावें तथा डाढवाले जन्तुओंसे इसकी रक्षा करते है ॥४०॥ उस समय यह ज्ञानशून्यही पिताकी ही समान राक्षसोको भी जानता है, पीनेको दुग्ध जानकर पीनेकी अभिलाषा करता है, तात्पर्य यह है कि बाल अवस्थाभी महाकष्टकारक है ॥४१॥ जबतक सुषुम्ना नाडी कफसे आच्छादित रहती है तबतक स्फुट अक्षर और वचन बोलनेको वह समर्थ नही होता ॥४२॥ इसी कारणसे यह गर्भमेभी नही रो सकता ॥४३॥ पीछे युवा अवस्थाके आनेसे कामदेवके ज्वरसे विह्वलहो अकस्मात ही कभी कुछ गाता है कभी अपना पराक्रम कहने लगता है ॥४४॥ कभी अभिमानसे वृक्षों पर चढता, कभी शान्त प्राणियोंको उद्वेजित करता, कभी काम क्रोधके मदसे अन्धा हो किसीको भी नही देखता ॥४५॥ अस्थि मांस और नाडी इनके सिवाय स्त्रीके मन्मथ स्थानमें और क्या है जिसमें कि मेंढकके फाड़े हुए पेटकी समान दुर्गन्ध आती है परन्तु तथापि उसमें आसक्त हुआ कामबाण से पीड़ित हो अपने आत्मा को अत्यंत जलाता है ॥४६॥ अस्थि मांस शिरा और त्वचा इसके सिवाय स्त्री के शरीर में और क्या है जो यह पुरुष स्त्रियोंमें आसक्त होकर मायसे मूढ़ होनेके कारण जगत् में कुछ भी नही देखता ॥४७॥ एक समय प्राणपवन निर्गत हो जाने से भी मृगकेसे नेत्रवालीका यह देह व्यर्थता को प्राप्त होता है और पांच छः दिन बीतनेपर फिर वह देह दीखता भी नही ॥४८॥ इस प्रकार युवावस्थामैं दुःख भोगने उपरांत वृद्धावस्थाका दुःख प्रारंभ होता है तब यह महानिरादरके स्थान जराको प्राप्त होकर महादुःखी होता है, इसका हृदय कफसे व्याप्त हो जाता है और खाया हुआ अन्नभी जीर्ण नही होता ॥४९॥ दांत गिर पडते है, दृष्टि मंद हो जाती है, तथा अनेक प्रकारके रोग होनेके कारण कटु तिक्त कषाय औषधियोंका सेवन करता है वायुसे कमर टेढी हो जाती है, कटि गर्दन हाथ जंघा चरण यह निर्बल हो जाते है ॥५०॥ तब सहस्त्रों रोग इसके शरीरमें लिपट जाते है बंधु तिरस्कार करते है (दोहा-सींग झडे और खुर घिसे, पीठ बोझ नहि लेय । ऐसे बूढे बैलको, कौन बांध भुस देय) तबैं यह पवित्रतारहित ही मलसे व्याप्त शरीर हौनेके कारण नखशिखपर्यन्ते सब शरीरोंसे सन्तप्त होता है ॥५१॥ तथापि ईश्वरका ध्यान नही करता और शय्या श्रेष्ठ भोजन आदि दुर्लभ भोगोंका ध्यान करता हुआ स्थित होता है इसके हाथ पैर कांपने लगते है, सब इन्द्रियोंकी शक्ति कुंठित हो जाती है और कोई सामर्थ्य न रहनेके कारण बालक भी इसकी हँसी करते है ॥५२॥ फिर इसके आगे मरणकालके दुःखका तो कोई दृष्टान्त ही नही, दरिद्रादि पीड़ा रोगादि पीड़ा कितनी ही प्राप्त हो उसको कुछ न गिनकर एक मरणके भयसे सबही भयभीत होते है ॥५३॥ बंधुओंसे घिरे हुए प्राणी को मृत्यु ले जाती है जिस प्रकार समुद्रमें प्राप्त हुए सर्पको गरुड ले जाता है ॥५४॥ हा प्रिये! हा धन! हा पुत्रो! इस प्रकार दारुण विलाप करते हुए इस पुरुषको मृत्यु इस प्रकार ले जाता है जैसे सर्प
२. अध्याय ५-८: पिण्डोत्पत्ति, देह-स्वरूप व जीव-गति
मेंढकको ले जाता है ॥५५॥ सम्पूर्ण मर्मस्थानोंके टूटने और शरीरके अवयवोंकी संधियां भग्न होनेसे जो दुःख मरनेवाले को होता है वह मुमुक्षुओंको स्मरण करना चाहिये, इसके स्मरण करने से संसारसे वैराग्य होकर आवागमनसे छूटनेके निमित्त नारायणके चरणोंमें ध्यान लगेगा ॥५६॥ यमदूतोंके दृष्टि आकर्षण करने और चेतना लुप्त हो जाने से कालपाशमें बन्धेका कोई रक्षक नही होता ॥५७॥ तब यह अज्ञानसे युक्त हो महत् चित्तमे प्रवेश होने से नही बोलता और जब भार्या पुत्रादि जातिके लोग पुकारते है तो उत्तर न देकर दीन नेत्रोंसे देखने लगता है ॥५८॥ तब इस जीवको लोहनिर्मित कालपाशसे यमदूत खैंचते है एक ओरसे बंधुओंका स्नेह खेचता है तब यह कुछ नही कर सकता, तटस्थरूपसे देखता है ॥५९॥ हिचकी बढने और श्वास रुकने तथा तालुके सूखने से उस मृत्युके पकड़े हुएका कोई आश्रय नही होता ॥६०॥ संसाररूपी चक्रमें आरूढ हुआ यमदूतोंसे घिरा कालफांसीमें बंधा महादुःखी हो मै कहा जाऊँ इस प्रकारसे वह जीव विचार करता है ॥६१॥ क्या करूं, कहां जाऊ, क्या ग्रहण करूं, क्या त्याग दूँ इस प्रकार चिन्तन करता कर्तव्यतासे मूढ हो शीघ्रही प्राणोंको त्यागता है ॥६२॥ मार्ग में यमदूतोंसे घसीटा हुआ यातनाकी देहमें प्राप्त होकर यहांसे जाकर जिन जिन यमयातनाओंका दुःख भोगता है उन्हे कहने को कौन समर्थ है ॥६३॥ जिस शरीरको केशर कस्तूरी चन्दन कपूर आदि लगाकर सदा भूषित किया था जिसे अनेक गहनोंसे शोभित और वस्त्रोंसे आच्छादित किया था ॥६४॥ वह शरीर प्राणवायुके निर्गत होतेही छूनेके अयोग्य और देखनेको भी अयोग्य हो जाता है फिर कोई इसको क्षणमात्र न रखकर घरसे निकौलने लगते है ॥६५॥ तब यह शरीर काष्ठसे जलाकर क्षणमात्रमें भस्म कर दिया जाता है (फूलबोझा जिन शिर न संभारे, तिनके अंग काठ बह डारे ! शिरपीडा जिनकी नहिं हेरी, करत कपाल क्रिया तिनकेरी) अथवा शृगाल गृध्र कुत्ते कौए इसको खाजाते है फिर यह करोडों जन्मतकभी दृष्टिगोचर नही होता है ॥६६॥ जादूगरके समान उत्पन्न जादूंसरीके इस जगतमे मेरी माता मेरा पिता मेरे गुरुजन मेरे स्वजन ऐसी कौन प्रतिज्ञा करता है? जीव केवल कर्मोको ही लेकर परलोक में जाता है, जैसे मार्गमें पथिकोंके विश्रामके लिये छायाका कोई वृक्ष आ जाता है, ऐसा ही यह मृत्युलोक है ॥६७॥ जिस प्रकारसे पक्षी संध्याकालमें वृक्षपर आकर बसेरा लेते है और प्रातःकाल उठकर एक दूसरे को त्याग अपने अभिलषित देशों मे चले जाते है इसी प्रकारसे जाति अजातिके पुरुषोंका समागम है, कर्मानुसार अपने कुटुम्बादिमें जन्म लेकर स्थित होते है, कर्म समाप्त होते ही अपनी गति को प्राप्त होते है । इससे मनुष्योंकौ उचित है किं, प्राणियोंके समागमको पथिक समाजके समान जाने, यथा (या दुनियामें आयके, छांड देइ तू ऐंठ । लेना है सो लेइले, उठी जात है पैठ ) ॥६८॥ मृत्युके बीजसे जन्म और जन्मके बीजसे मृत्यु होती है अर्थात जो उत्पन्न हुआ है उसका अवश्य नाश होगा और नाश हुआ अवश्य जन्म लेगा, यह प्राणी इसी प्रकार घटीयन्त्रकी समान निरंतर भ्रमण करता रहता है ॥६९॥ हे रामचन्द्र! गर्भके वीर्यके प्राप्त होनेसे इस प्रकारसे प्राणीका जन्म और मृत्यु होती है यह महाव्याधि है, जीवन मरण दोनों मेंही महादुःख होता है, इस व्याधि को दूर करनेके निमित्त मेरे सिवाय दूसरी औषधि नही (नान्यपंथाः विद्यते अयनायेति श्रुतेः) इस कारण मेरा भजन करना योग्य है ॥७०॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु० शिवराघवसंवादे पिण्डोत्पत्तिकथनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥८॥
अध्याय ९ श्रीभगवान बोले - हे राजन! तुम सावधान होकर सुनो, मै तुमसे देहका स्वरूप कहता हूँ, यह संसार मुझहीसे उत्पन्न होता है मुझही से धारण किया जाता है ॥१॥
और जिस प्रकार भ्रम निवृत होने से रजत सीपमें लय हो जाती है इसी प्रकार यह जगत् ज्ञानसे मुझमें लय हो जाता है, मै निर्मल पूर्ण सच्चिदानंदस्वरूप हूँ ॥२॥ मै संगरहित शुद्ध सनातन ब्रह्म हूँ, मै अनादिसिद्धि मायासे युक्त होकर जगतका अकारण होता हूँ ॥३॥ मेरी माया का वर्णन नही हो सकता, उसमे सत्त्व, रज, तम यह तीन गुण रहते है ॥४॥ सत्त्वगुण शुक्लवर्ण मनुष्योंको सुख और ज्ञानक देनेवाला है और रजोगुण का रक्तवर्ण है, यह चंचल और मनुष्यों को दुःख देनेवाला है ॥५॥ तम का कृष्ण वर्ण है, यह जड और सुख दुःखसे उदासीन रहता है, इसी कारण मेरे संयोग से वह त्रिगुणात्मिका माया ॥६॥ मेरे ही अधिष्ठानसे इस प्रकार जगत को रचना करके दिखाती है, जिस प्रकार अज्ञान शुक्ति में रजत और रस्सीमें सर्प दिखाइ देता है ॥७॥ मुझसे मायाके द्वारा आकाशादिकी उत्पत्ति होती है, मुझसे प्रथम आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल, जलसे पृथिवी उत्पन्न होती है, उन्ही पांचोसे उत्पन्न हुआ यह सब देह पंचभूतात्मक कहाता है ॥८॥ पितामाताके भक्षण किये अन्नसे यह षट्कोशात्मक शरीर उत्पन्न होता है, जिसमें स्नायु अस्थि और मज्जा पिता के कोशसे उत्पन्न होते है ॥९॥ त्वचा मांस और रुधिर यह माताके वीर्यसे उत्पन्न होते है इसी प्रकार मात और पिता सम्बन्धी षट्कोशात्मक देह में माता से उत्पन्न होने वाले, पिता से उत्पन्न होनेवाले, रजसे उत्पन्न होनेवाले तथा आत्मासे उत्पन्न होनेवाले, चार पदार्थ है ॥१०॥ उसमें रक्त, मेदा, मज्जा, प्लीहा, यकृत, गुदा, हृदय, नाभि इत्यादि मृदु पदार्थ मातासे उत्पन्न होते है ॥११॥ श्मश्रु, लोम, केश, स्नायु, शिरा, धमनी, नाड़ी, नख, दंत, वीर्य आदि स्थिर पदार्थ पिता के संबधसे होते है ॥१२॥ पुष्टता, वर्ण, तृप्ति, बल, अवयवोंकी दृढ़ता, अलोलुपता, उत्साह इत्यादि रजसे उत्पन्न होते है ॥१३॥ इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, धर्म, अधर्म, भावना, प्रयत्न, ज्ञान, आयुष्य, इन्द्रिय इत्यादि यह आत्मज अर्थात आत्मासे उत्पन्न हुए कहाते है ॥१४॥ श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, और घ्राण यह पांच ज्ञानेन्द्रिय कहाते है ॥१५॥ क्रमसे ही शब्द, स्पर्श, रूप रस गन्ध, यह पांच इनके विषय है, वाणी, हाथ, पैर गुदा और उपस्थ यह पांच कर्मेन्द्रिय है ॥१६॥ बोलना, लेना, देना, चलना, मलविसर्जन और रति यह क्रमसे पांचो इन्द्रियोंके पांच कार्य और मन उभयात्मक है, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त यह अन्तःकरणके चार भेद है ॥१७॥१८॥ सुख और दुःख यह मनका विषय है, स्मृति भय विकल्प इत्यादि मनके कर्म है और जो निश्चय करती है उसीको बुद्धि कँहते है और अहं, मम यह जो अहंकारात्मक मनकी वृत्ति है इसे ही चित्त कहते है ॥१९॥ यह अन्तःकरणभी सतोगुणादिके भेदसे तीन प्रकार का है, सत, रज, तम यह तीन गुण है, जब सतोगुण प्रधान होता है तब ॥२०॥ आस्तिक्य बुधि, स्वच्छता, धर्ममें रुचि इत्यादि सात्विक धर्म प्राप्त होते है और जब रजोगुण होता है तो काम क्रोध मद इत्यादि होते है ॥२१॥ तमोगुणकी प्रधानतामें निद्रा, आलस्य, प्रमाद, वंचना होती है, इन्द्रियों की प्रसन्नता, आरोग्य, आलस्य का न होना, यह गुण सत्त्वसे उत्पन्न होते है ॥२२॥ इन पांच महाभूतोंकी मात्रासे उत्पन्न हुआ यह देह उनके गुणों को धारण करता है, उनमें शब्द, श्रोत्र, इन्द्रिय, वाणी, कुशलतो, लघुता, धैर्य ॥२३॥ और यह बल सात गुण आकाशसे इस स्थूल देहमें प्राप्त होते है, स्पर्शगुण, त्वगिन्द्रिय, उत्क्षेपण (ऊपर को फेंकना) अवक्षेपण (नीचे को फेंकना) आकुंचक (संकोड़ना) प्रसारण (फैलना) गर्मन (चलना) यह पांच कर्म है ॥२४॥ प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान यह पांच प्राण है ॥२५॥ नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय यह पांच उपप्राण कहाते है, यह एकही वायुके विकारको प्राप्त होने पर दश